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‘किताबें मिलीं’ कॉलम में : एक रात धूप में

उपभोक्ता संस्कृति के दबावों के कारण रचना-विरोधी माहौल में अगर कविता मानव-मूल्यों की बात करती है तो यह स्वागतयोग्य बात होनी चाहिए, पर प्रश्न तो समाज की दशा और दिशा को प्रभावित करने का है।

Author नई दिल्ली | July 24, 2016 5:48 AM
देश के पुस्तकालयों की दयनीय स्थिति को सुधारने में ‘पुस्तकालय अधिनियम’ महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। मगर यह अब भी देश के सभी राज्यों में पारित नहीं हुआ है।

ऐसे समय जब हिंदी की समकालीन कविता में वक्रोक्ति और अन्योक्ति की भरमार है, इस हद तक कि कई बार वह इनके बोझ से दबी मालूम पड़ती है, राजेंद्र जोशी इस भार से मुक्त दिखते हैं। उनकी कविताएं सीधे संबोधित करने में यकीन करती हैं, सीधी-सादी भाषा में। सादगी और सपाटबयानी उनकी सबसे बड़ी विशेषता है। दरअसल, उनकी कविता विषय के विस्तार में नहीं, बल्कि उसके मूल में है, परिधि में नहीं, केंद्र में है। शायद यही कारण है कि उनकी अधिकतर कविताएं आकार में छोटी हैं। जो अपेक्षया बड़ी दिखती हैं वे भी फैली-बिखरी हुई नहीं हैं।

राजेंद्र जोशी के यहां इंसानियत को लेकर सपना है, तो इंसानी दुनिया के कड़वे यथार्थ का बयान भी है- बहुत कुछ जगबीती, कहीं-कहीं आपबीती के हल्के संकेत भी हैं। कटु यथार्थ में कलम का सिपाही और इंसानियत का पुजारी होने के नाते ‘हिंसा के निशाने पर’ होने का अहसास है तो मुखौटे लगा कर किए जा रहे तमाशों का भी। इन तमाशों के बरक्स उन्हें कभी अपने शहर की चिंता सताती है, तो कभी ‘कीचड़-से हो गए तालाब’ की। नैतिक विचलनों और सामाजिक संबंधों में आ रही दरारों का भी वे संज्ञान लेते चलते हैं।

एक रात धूप में: राजेंद्र जोशी; सूर्य प्रकाशन मंदिर, दाऊजी रोड (नेहरू मार्ग), बीकानेर; 200 रुपए।


भाषीय औदात्य
साहित्य की प्रकृति और रचनाकार की ऊंचाई का मापन उसके यथायथ प्रयोगों के माध्यम से ही किया जा सकता है। ये प्रयोग कहीं अर्थविच्छित्ति के उद्भावक बनते हैं, तो कहीं संपूर्ण कथन का उपवृंहण भी करते चलते हैं। ऐसे प्रयोगों के अंतर्गत मात्र ‘शब्द’ नहीं, अपितु पद, पदांश, वाक्य, उपवाक्य, विराम चिह्न और अन्यान्य संदर्भ होते हैं। भाषिक अभिव्यक्ति के ये सभी कारक एक से नहीं होते, बल्कि युगसापेक्ष चिंतन के अनुसार अलग-अलग हुआ करते हैं। एक ही रूप में आज अभिव्यक्ति के स्तर पर जितनी सामर्थ्य है, हो सकता है कल वह सामर्थ्य न रहे या यों कहें कि संभव है, वह सामर्थ्य कल चुक जाए।

समर्थ रचनाकार इन्हीं संभावनाओं से सर्जनात्मक तत्त्वों का ससंजन करता है। इसके और भी आगे द्रष्टा की भूमिका में पहुंचा हुआ रचनाकार ससंजन भी नहीं करता, बल्कि सृजन अनायास होता रहता है। कबीर के अजपा जाप की तरह।

प्रस्तुत कृति में भाषिक प्रयोगों से संबंधित कुछ प्रक्रियाओं, सांचों और कुछ प्रयोगों के कुछ प्रतिनिधि रचनाकारों, समीक्षकों और साहित्य सेवियों के साक्ष्य पर रखने का यत्न किया गया है।

भाषीय औदात्य: त्रिभुवननाथ शुक्ल; वाणी प्रकाशन, 4695, 21-ए, दरियागंज, नई दिल्ली; 450 रुपए।


शब्द जब बोलेंगे
उपभोक्ता संस्कृति के दबावों के कारण रचना-विरोधी माहौल में अगर कविता मानव-मूल्यों की बात करती है तो यह स्वागतयोग्य बात होनी चाहिए, पर प्रश्न तो समाज की दशा और दिशा को प्रभावित करने का है। कविता उसके लिए अनुकूल माहौल बनाने में सहायक तो हो सकती है, पर अहम भूमिका राजनीतिक दलों की ही होगी। कविता अगर पाठक के मन-मस्तिष्क तक पहुंचने में सफल होती है तो परिवर्तन का माहौल बनाने में और अधिक सुगमता होगी, यह भी संभव हो सकता है, जब कवि के रचनात्मक अनुभवों और पाठक के जीवनानुभवों के मध्य अधिक दूरी न हो तभी पाठक रचना को सहजतापूर्वक आत्मसात करके उसके साथ स्वाभाविक संवाद स्थापित करे।

केवल गोस्वामी की इन कविताओं को पढ़ते हुए पाठक खुद को अधिक सहज धरातल पर महसूस करता है। वह इन कविताओं के माध्यम से कवि के साथ सहज और स्वाभाविक संवाद स्थापित करने में सफल होता है।

शब्द जब बोलेंगे: केवल गोस्वामी; यश पब्लिकेशंस, 1/11484 पंचशील गार्डन, नवीन शाहदरा, दिल्ली; 295 रुपए।

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