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‘हंस’ के संपादक संजय सहाय का इंटरव्यू, कहा- क्रांति का औजार नहीं साहित्य

साहित्य और समाज के संबंध पर विमर्श सदियों पुराना है। इस बार बारादरी के मेहमान प्रतिष्ठत साहित्यिक पत्रिका ‘हंस’ के संपादक संजय सहाय से नवउदारवादी दौर की राजनीति और समाज में साहित्य की प्रासंगिकता पर सवाल-जवाब हुए। नाटक, सिनेमा और साहित्य के अंत:अनुशासनात्मक संबंधों के बरक्स युवा रचनाकर्म और नए मीडिया पर भी बात हुई। कार्यक्रम का संचालन किया कार्यकारी संपादक मुकेश भारद्वाज ने।

Author February 5, 2017 4:37 AM
‘हंस’ के संपादक संजय सहाय।

मृणाल वल्लरी: कुछ लोग कहते हैं कि साहित्य का काम दुनिया बदलना नहीं है। क्या आप इसे सही मानते हैं?
संजय सहाय: मैं मानता हूं कि साहित्य का काम उपदेश देना नहीं है। साहित्य का काम दुनिया बदलना नहीं है। साहित्य का काम एक कल्पनाशीलता के साथ अपने समय के सत्य को रिकॉर्ड करना है। आप जिस दृष्टि से अपनी दुनिया को देख रहे हैं, उसे संप्रेषित करना है। इसका असर कितना पड़ेगा, कहां पड़ेगा, वह आप नहीं जानते हैं। आप अगर यह सोच कर चलेंगे कि हम आंदोलन करने के लिए साहित्य लिख रहे हैं तो वह आंदोलन कभी नहीं होगा। लेकिन आपके साहित्य का कब आंदोलन में इस्तेमाल हो जाएगा, यह भी आप नहीं जानते। अगर आप आंदोलन करने के लिए साहित्य रचते हैं, तो उसका हश्र वही होता है जो कम्युनिस्ट पार्टी के नारों का होता है।

पारुल शर्मा: तो क्या यह समझा जाए कि साहित्य का समाज पर असर नहीं पड़ता?
संजय सहाय: साहित्य कोई रिपोर्टिंग तो है नहीं कि जो देखा वही लिख दिया। जब वह साहित्य में आएगा तो कई आयामों के साथ आएगा। कई रास्तों से आएगा और कई सारी चीजों को पकड़ेगा। वह जितने आयाम बटोरेगा, जितने रास्तों से आएगा, उतना ही साहित्य महत्त्वपूर्ण होगा। अगर वह सिर्फ दर्पण रहेगा, तो सिर्फ घटना का विवरण देकर अपना काम समाप्त समझ लेगा।

मुकेश भारद्वाज: साहित्य के माध्यम से कई बार हम एक सशक्त विचारधारा खड़ी करते हैं। दुनिया की कई क्रांतियों में साहित्य का योगदान रहा है। तो, क्या आपको लगता है कि आज का साहित्य ऐसा नहीं कर पा रहा या शुरू से आपको लगता है कि साहित्य की क्रांति में कोई प्रासंगिकता नहीं रही है।
संजय सहाय: शुरू से मुझे ऐसा लगता है कि साहित्य क्रांति के लिए नहीं लिखा जाता। साहित्य अपने से क्रांति नहीं करता, साहित्य का क्रांतियों में इस्तेमाल होता है। हालांकि ऐसा कई बार हो चुका है कि जब कोई आंदोलन खुदबुदा रहा होता है, उससे पहले वे बातें साहित्य में आ जाएं। लेकिन साहित्य आंदोलन को शुरू नहीं करता।
जहां तक कम्युनिस्ट आंदोलनों में पोस्टरों पर साहित्य छापने की बात है, पोस्टर छापना साहित्य का क्रांति पैदा करना नहीं है। साहित्य का आंदोलन में इस्तेमाल हो सकता है, पर वह स्पार्किंग प्वाइंट नहीं हो सकता। आज तक ऐसा एक भी उदाहरण नहीं है कि कोई किताब छप कर आई हो और उसके आधार पर कोई इंकलाब उठ खड़ा हुआ हो।

अरविंद शेष: तो विचार को बदलने में साहित्य की कोई भूमिका होती है या नहीं?
संजय सहाय: विचार को बदलना एक अलग चीज है। वह इंकलाब नहीं है। वह एक क्रमिक विकास है।

मुकेश भारद्वाज: क्या आप नहीं मानते कि किसान समस्या की तरफ ध्यान दिलाने और फिर एक आंदोलन खड़ा करने में गोदान की कोई भूमिका रही?
संजय सहाय: नहीं रही। बिल्कुल नहीं रही। उपन्यास के रूप में गोदान निस्संदेह बड़ा उपन्यास है, पर किसान आंदोलन में- स्वामी सहजानंद से लेकर आज तक- उसका कोई बड़ा असर पड़ा हो, मैं नहीं मानता। उसे एक उपन्यास के रूप में ही देखा गया। अगर उसका प्रभाव होता, तो आज महाराष्ट्र से लेकर ओड़ीशा तक किसान आत्महत्या न कर रहे होते।

रामजन्म पाठक: आपके अनुसार फिर साहित्य का क्या भविष्य है?
संजय सहाय: साहित्य का भविष्य अच्छा है। किसी भी चीज को विकसित करने में साहित्य पूरक का काम कर सकता है।

सूर्यनाथ सिंह: अब तो राजनीति का रुख देख कर साहित्य भी अपना रुख बदलते देखा जाता है। इसका साहित्य पर क्या प्रभाव पड़ता है।
संजय सहाय: राजनीति से टुकड़े पाने को लालायित लोग बहुत पहले से देखे जाते रहे हैं। राजा-महाराजाओं के समय से। ऐसे लोग हमेशा से रहे हैं और आगे भी रहेंगे। लेकिन उसी में कुछ लोग लड़ते हैं, खड़े रहते हैं, उन पर आक्रमण भी होते हैं, पर वे खड़े रहते हैं। राजनीति से पारितोषित पाने वाले धकिया कर बाहर कर दिए जाते हैं।

पारुल शर्मा: आज जनसरोकार की दृष्टि से मीडिया की कितनी प्रासंगिकता रह गई है?
संजय सहाय: मुझे लगता है कि एक-दो प्रतिशत रह गई है। अब कम लोग इसमें रह गए हैं, जो नागरिक अधिकारों, जनसरोकारों के लिए सोचते हैं।

सूर्यनाथ सिंह: एक लेखक को क्या सिर्फ लिख कर अपना कर्तव्य समाप्त मान लेना चाहिए या उसे एक एक्टिविस्ट के रूप में भी भूमिका निभानी चाहिए?
संजय सहाय: यह लेखक की अपनी स्थितियों पर निर्भर करता है। हर लेखक अगर एक्टिविस्ट नहीं हो सकता, तो इसे उसके दोष की तरह नहीं देखा जाना चाहिए। बहुत सारे मसलों पर लोग सामने आते हैं और बहुत से लोग ऐसे होते हैं, जिनका मूक समर्थन होता है। इसके अलावा बहुत से ऐसे लोग भी होते हैं, जिनका उस पूरे आंदोलन से अलग विचार होता है, बावजूद कि उनमें आंदोलन का जज्बा होता है। हर कोई अरुंधति राय नहीं हो सकता। और अरुंधति राय की भी सारी बातें सही नहीं हो सकती हैं।

रामजन्म पाठक: देश में वामपंथी आंदोलन काफी कमजोर हो चुका है। इसमें किसी तरह के बदलाव की संभावना है?
संजय सहाय: युवा पीढ़ी से तो मुझे कोई उम्मीद नहीं है। आज की युवा पीढ़ी जो विश्वविद्यालयों, कॉलेजों में पढ़ रही है, और उसका एक ही ध्येय है कि अगर वह अपने साथी की गर्दन पर भी पैर रख कर नौकरी हासिल कर ले, तो बुरा नहीं, उससे इसकी उम्मीद नहीं है। उसका एक तरह से पोलिटिकल डिसओरिएंटेशन हो चुका है। इसकी कोई एक वजह नहीं है। इसमें परत-दर-परत है। इसमें बाजारवाद का बहुत योगदान है। मैं नहीं समझता कि चालीस साल पहले की पीढ़ी राजनीतिक रूप से जितनी जागरूक थी, आज की पीढ़ी उतनी है। इसलिए कि उसके सामने करिअर की एक नई दुनिया खुली है। अब जेपी आंदोलन जैसे आंदोलन की संभावना नहीं है। अण्णा आंदोलन के समय जो युवा दिखाई दिए, उसके पीछे दूसरे दलों की रणनीति काम कर रही थी। आखिर क्या हुआ? वह आंदोलन फेल हो गया।

मुकेश भारद्वाज: मगर उसी आंदोलन से एक राजनीतिक दल निकला और आज देश की राजधानी में उसकी सरकार है।
संजय सहाय: यह सही है, पर आप देखें कि जेपी आंदोलन में भी ठीक यही हुआ था और अंतत: समय के साथ-साथ उसका मकसद कहीं तिरोहित हो गया। तीन साल में वह आंदोलन फेल हो गया। जनता पार्टी खत्म हो गई। हालांकि आंदोलन का जज्बा गलत नहीं था।

सूर्यनाथ सिंह: इस समय साहित्य की केंद्रीय विधा किसे मानते हैं?
संजय सहाय: उपन्यास को यह स्थान पहले से हासिल है, मगर आज अच्छे उपन्यास नहीं लिखे जा रहे, इसलिए केंद्र में कहानी दिखाई देने लगी है। कविता दिखती जरूर ज्यादा है, पर उसमें ज्यादातर कविताएं बुरी होती हैं। हल्की होती हैं।

मुकेश भारद्वाज: प्रेमचंद और राजेंद्र यादव की विरासत को संभालना आपके लिए कितना मुश्किल है।
संजय सहाय: हिंदी साहित्य के दो महानतम लेखकों की जिम्मेदारी को ओढ़ना बहुत कठिन होता है। कई बार आपको लगता है कि आप वहां एक जोकर बन कर बैठे हैं। प्रेमचंद और राजेंद्र यादव से हम कोई तुलना कर ही नहीं सकते हैं। हमारा काम तो है कि जो चीज उन्होंने छोड़ी है, वह अपना स्तर बनाए रख कर चलती रहे। प्रेमचंद का जो हंस था, राजेंद्र यादव का हंस उससे भिन्न था। हम सीधे तौर पर राजेंद्र यादव की विरासत को लेकर चल रहे हैं। तो हमारे लिए राजेंद्र यादव ने जो छोड़ा है, वह ज्यादा महत्त्वपूर्ण है। अभी हम जिस हंस की बात कर रहे हैं, वह राजेंद्र यादव की विरासत है।

सूर्यनाथ सिंह: साहित्यिक पत्रकारिता में एकरसता-सी दिखती है, आप उसमें बदलाव की क्या गुंजाइश देखते हैं?
संजय सहाय: राजेंद्र यादव ने हंस में ऐसे तबकों को जगह दी, जो हाशिये पर पड़े हुए थे। मगर अच्छी कहानियों को भी वे तरजीह देते थे। इसलिए उन्होंने ऐसी कोई रेखा खींच कर नहीं रखी कि सिर्फ ऐसा ही होना चाहिए। जहां तक एकरसता की बात है, वह संपादकीय के जरिए राजेंद्र यादव भी तोड़ने का प्रयास करते थे, मैं भी करता हूं। राजनीतिक मसलों पर टिप्पणियां छपती हैं। हम समसामयिक मुद्दों को उठाने का प्रयास कर रहे हैं। इससे पठनीयता बढ़ रही है। मगर कहानियों के मामले में कोई विभाजक रेखा खींच कर नहीं चला जा सकता।

सूर्यनाथ सिंह: कहानियों में, चाहे शिल्प के स्तर पर हो या विषय-वस्तु के, बहुत कुछ चौंकाऊ किस्म का आने लगा है। यह कहां तक सही है?
संजय सहाय: यह सही नहीं है। ऐसी कहानियां लंबे समय तक टिक नहीं पाती हैं। साहित्य समय के हिसाब से अपना कूड़ा छांटता रहता है। जो बच जाता है, उसी को आप बाद में चल कर क्लासिक कहते हैं।

सुमन केशव सिंह: इन दिनों थिएटर ओलंपिक की बात हो रही है। इसके पीछे क्या परिकल्पना है?
संजय सहाय: थिएटर के साथ ओलंपिक शब्द को जोड़ना उचित नहीं है। यह बहुत भद्दा लगता है। थिएटर का ओलंपिक नहीं हो सकता। ओलंपिक खेल-कूद का होता है। एक अलग क्षेत्र का शब्द उठा कर जब नाटक के साथ जोड़ते हैं तो बहुत अटपटा लगता है। मसलन, आप कहें कि सिनेमा का दंगल होने जा रहा है, तो कैसा लगेगा! थिएटर का ओलंपिक नहीं हो सकता, थिएटर का फेस्टिवल ही हो सकता है। ओलंपिक से एक प्रकार की स्पर्धा का बोध होता है। इसमें आप किसे चुनेंगे। कला का कोई भी काम स्पर्धा का नहीं होता है।

अरविंद शेष: यहां थिएटर के दर्शकों का विस्तार क्यों नहीं हो पा रहा है?
संजय सहाय: इसमें हमारे समाज की सांस्कृतिक बनावट की कमी है। हमें यह समझ में नहीं आता है कि नाटक एक लाइव शो है, इसलिए ज्यादा महत्त्वपूर्ण है। लोगों को लगता है कि इसे हमें मुफ्त में देखना चाहिए। जब तक यह स्थिति नहीं बदलेगी, तब तक बहुत सुधार की उम्मीद नहीं की जा सकती। नाटक के अभिनय की तुलना सिनेमा के अभिनय से नहीं की जा सकती। सिनेमा टुकड़ों में बना होता है, जबकि नाटक एक बार में होता है।

केशव सुमन सिंह: मगर थिएटर में आजीविका का सवाल महत्त्वपूर्ण होकर उभरा है।
संजय सहाय: सिर्फ थिएटर नहीं, पूरे हिंदी साहित्य में लगभग यही स्थिति है। यहां लोग सिनेमा तो टिकट खरीद कर देख लेते हैं, पर टिकट खरीद कर नाटक नहीं देखने जाते। दूसरे देशों में स्थिति इसके बिल्कुल उलट है। लंदन में मैंने कितने नाटक देखे हैं। कई नाटक ऐसे हैं, जो सालों चलते हैं। अगाथा क्रिस्टी के नाटक ‘माउस ट्रैप’ को साठ या सत्तर साल हो गए हैं सेंट मार्टिन थिएटर में चलते हुए। उसमें कितने कलाकारों की पीढ़ियां बदल गर्इं। मगर वहां लोग तीस-चालीस-पचास पाउंड का टिकट खरीद कर नाटक देखने जाते हैं। यह सिर्फ लंदन में नहीं, अमेरिका आदि में भी देखने को मिलता है। हमारे यहां दो-तीन-चार शो होते हैं। अभी हमारे यहां थिएटर उस तरह विकसित नहीं हो पाया है कि उसके कलाकार को सिनेमा से ज्यादा पैसे मिलते हों।

अरविंद शेष: पिछले कुछ दिनों में नाटकों के प्रदर्शन पर हमले हुए हैं, प्रतिबंध लगे हैं, उसे किस तरह देखते हैं।
संजय सहाय: जब तक शुद्धतावादी लोगों की सरकार रहेगी, इस तरह के हमले होते रहेंगे। क्योंकि वे उनकी राजनीति को, उनकी सोच को रास नहीं आते। जहां तक नाटकों की भाषा पर प्रतिबंध का सवाल है, अगर हमारे समाज में लोग सहज भाव से वैसी भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं, नाटक का पात्र कर रहा है, तो उस पर आपत्ति क्यों होनी चाहिए। फिल्मों में तो वैसी भाषा स्वीकार कर ली जाती है, पर नाटकों में, साहित्य में वही भाषा इस्तेमाल की जाए तो बहुत सारे शुचितावादी खड़े हो जाते हैं कि यह भाषा बदली जा सकती थी। मैं किसी भी तरह के सेंशरशिप के खिलाफ हूं।

 

 

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