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असंतुलित भोजन से बिगड़ती सेहत

खानपान के मामले में ग्रामीण इलाकों में संतुलित भोजन के बारे में जागरूकता कम लोगों में है, इसलिए भी वे दाल, सब्जी, फलों का उपयोग कम करते हैं। दूध-दही-मांस का उपयोग वे उपलब्धता के मुताबिक करते हैं।

Author July 29, 2018 4:29 AM
आज लोगों में स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता निस्संदेह बढ़ रही है, पर हकीकत यह भी है कि भोजन में जरूरी चीजों का समावेश न हो पाने के कारण खासकर ग्रामीण इलाकों के लोगों में कई तरह की समस्याएं पैदा हो रही हैं।

राजकुमार भारद्वाज

आज लोगों में स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता निस्संदेह बढ़ रही है, पर हकीकत यह भी है कि भोजन में जरूरी चीजों का समावेश न हो पाने के कारण खासकर ग्रामीण इलाकों के लोगों में कई तरह की समस्याएं पैदा हो रही हैं। ग्रामीण इलाकों में महिलाओं के आहार को लेकर प्राय: उदासीनता बरती जाती है, इसलिए उनमें रक्ताल्पता यानी एनीमिया की शिकायत सदा बनी रहती है। आधुनिक जीवन-शैली और बाजार में उपलब्ध डिब्बाबंद तुरंता आहार के अधिक चलन की वजह से भी लोगों में संतुलित आहार का चक्र बिगड़ रहा है। जो गांव शहरों के करीब हैं, उनमें पारंपरिक खाद्य की जगह आधुनिक खाद्य ने ले लिया है। बच्चों की स्वादेंद्रियां पारंपरिक खाद्य को स्वीकार नहीं कर पा रहीं।

शायद सुन कर आश्चर्य हो कि दुनिया भर में दूध-दही के खाने के लिए मशहूर हरियाणा के लोग भी संतुलित भोजन के अभाव में कई गंभीर बीमारियों के शिकार हो रहे हैं। राज्य के लोग पर्याप्त दालों, फल और ताजा भोजन का कम तथा मोटापा बढ़ाने वाले पदार्थों का अधिक सेवन करते हैं। इस सबके चलते राज्य के लोगों में स्वास्थ्य संबंधी कई परेशानियां पैदा हो रही हैं। सबसे अधिक चिंताजनक बात यह है कि राज्य में बहुत कम ग्रामीण लोग ताजा भोजन करते हैं। शहर में भी ताजा भोजन का कम इस्तेमाल होने की रपट है। यह खुलासा केंद्र सरकार के महिला एवं बाल कल्याण विभाग द्वारा हरियाणा के लोगों के खानपान पर जारी की गई 2007-08 की एक सर्वेक्षण रिपोर्ट में हुआ है।

राष्ट्रीय स्वास्थ्य सर्वेक्षण की एक रिपोर्ट के मुताबिक असम के बाद हरियाणा में सर्वाधिक विवाहित महिलाएं एनीमिया की शिकार हैं। प्रदेश में 69.7 प्रतिशत विवाहित महिलाएं एनीमिया की शिकार रहती हैं। इसका प्रमुख कारण सामाजिक जीवन में उनकी उपेक्षा और रसोई में उनकी उपयोगिता सिर्फ खाना पकाने तक होना है। रसोई में क्या बनेगा, इसमें अधिकतर पसंद पुरुषों की ही चलती है। पुरुष इस बात का ध्यान ही नहीं रखते कि महिलाओं को भी संतुलित भोजन मिलना चाहिए। महिलाओं के भोजन में पर्याप्त पोषक तत्त्वों के अभाव के कारण उनके शिशुओं में कई शारीरिक और मानसिक विसंगतियां आ जाती हैं। पहले छह माह की आयु वाले तेरह प्रतिशत बच्चे स्वाभाविक विकास मानक के मुकाबले कम कद के पाए गए। छब्बीस प्रतिशत बच्चे अपनी आयु के मुकाबले कम वजन के और सैंतीस प्रतिशत बच्चे अपने कद के मुकाबले कम वजन के होते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में अड़तीस प्रतिशत बच्चे नियमित रूप से कुपोषण के शिकार हैं। अठारह वर्ष से ऊपर के इकतीस प्रतिशत लोग बेहद पतले हैं, जबकि सत्रह प्रतिशत महिलाएं और ग्यारह प्रतिशत लोग मोटापे के शिकार हैं।

राज्य के कई जिलों में लोग हरी पत्तेदार सब्जियों और दालों का इस्तेमाल भी पर्याप्त मात्रा में नहीं करते। एक अन्य अध्ययन के मुताबिक पिछले डेढ़ दशक में दालों और हरी पत्तेदार सब्जियों के इस्तेमाल में कमी आई है। सर्वेक्षण के मुताबिक राज्य में लोग दालों का पैंतीस प्रतिशत तक, जबकि हरी सब्जियों का 47.5 प्रतिशत तक कम उपयोग करते हैं। एक रोचक तथ्य यह है कि लड़कों के मुकाबले लड़कियां दालों का अधिक इस्तेमाल करती हैं। हालांकि सात से बारह साल की उम्र के लड़के और लड़कियों के भोजन में कोई अंतर नहीं है। दस से बारह साल के लड़कों के मुकाबले लड़कियां दूध और उससे बने पदार्थों का इस्तेमाल कम करती हैं। राज्य में औसतन कैलोरी खपत चार सौ तैंतीस ग्राम कैलोरिक यूनिट है।

फलों का औसतन इस्तेमाल बहुत कम- तेरह ग्राम प्रति कैलोरिक यूनिट है। भोजन से दालों और हरी सब्जियों के गायब होने के दो प्रमुख कारण हैं- राज्य में फसल प्रक्रिया का बदलना और हाल के वर्षों में किसानों की आर्थिक स्थिति खराब होना। केवल इकतीस प्रतिशत लोग प्रतिदिन दालों का इस्तेमाल करते हैं, जबकि बासठ प्रतिशत सप्ताह में एक बार और छह प्रतिशत पंद्रह दिन में एक बार दालों का इस्तेमाल करते हैं। यह संकट शहरों में भी पिछले डेढ़ दशक में गहराया है। अब रोटी तो आम आदमी की थाली में है, लेकिन दाल पूरी तरह गायब हो गई है।

आज से पंद्रह-बीस साल पहले किसान गोचनी खेती करते थे। यानी अपने घर के खाने भर के गेहूं के साथ-साथ एक-दो एकड़ में चना दाल बीजते थे। साथ ही अपने परिवार के खाने भर के मसूर, अरहर, मटर, लोबिया और मूंग की बिजाई भी करते थे। 1995 तक बथुआ, पालक, मटर, गाजर और मूली जैसी चीजें अपने खाने भर की उगा लेते थे। गेहूं में रासायनिक खादों और कीटनाशकों का इस्तेमाल नहीं करते थे। पर अब ऐसा नहीं है। हरी सब्जियों का सेवन तीस प्रतिशत घरों में रोज होता है, जबकि अड़तीस प्रतिशत घरों में सप्ताह में एक बार होता है। डेढ़ दशक पहले तक गांवों और यहां तक कि कस्बों में पालक, बथुआ बिकता नहीं था। यह सहज उपलब्ध होता था, लेकिन आज यह बहुत महंगा बिकता है। पहले हरियाणा में हर घर में बथुए का रायता पूरी सर्दी भोजन का हिस्सा होता था। अब तो बाजरा और ज्वार जैसे पारंपरिक अनाजों का इस्तेमाल भी बहुत कम लोग करते हैं। राज्य के ग्यारह प्रतिशत लोग इनका प्रतिदिन, दस प्रतिशत सप्ताह में एक दिन और सत्रह प्रतिशत मौसम के दौरान करते हैं। 1980 तक ज्वार और बाजरा भोजन का महत्त्वपूर्ण हिस्सा होते थे। डेढ़ दशक पहले तक बाजरा भोजन का महत्त्वपूर्ण अंग होता था।

राज्य के बाईस प्रतिशत घरों में फलों का इस्तेमाल प्रतिदिन, तेईस प्रतिशत घरों में पंद्रह दिन में एक बार और बीस प्रतिशत घरों में सप्ताह में एक दिन और चौबीस प्रतिशत घरों में माह में एक बार होता है। पहले जामुन, बेर, पील, शहतूत और लसवा, यहां तक कि आम भी गांवों में लोगों को बिना खरीदे मिल जाता था। अब फलों के पेड़ गांवों से गायब हो गए हैं। परिणामस्वरूप सामाजिक भाई-चारे और शिष्टता पर भी इसका प्रभाव पड़ता है।

यह आंकड़ा सिर्फ हरियाणा का है, पर पूरे देश के परिप्रेक्ष्य में देखें तो यह स्थिति कमोबेश सब जगह मिलेगी। किसानों का ध्यान अब नगदी फसलें उगाने की तरफ ज्यादा है। इसलिए वे अपने भोजन के लिए जरूरी चीजें भी उगाने पर ध्यान नहीं दे पाते। खानपान के मामले में ग्रामीण इलाकों में संतुलित भोजन के बारे में जागरूकता कम लोगों में है, इसलिए भी वे दाल, सब्जी, फलों का उपयोग कम करते हैं। दूध-दही-मांस का उपयोग वे उपलब्धता के मुताबिक करते हैं। जिनके पास गाय-भैंसे हैं वे दूध-दही खा भी लेते हैं, पर जिनके पास नहीं हैं, वे खरीद कर नहीं खाते। वैसे भी गांवों में पशुधन पालन के मामले में उदासीनता दिखती है। खेती-किसानी मशीनों पर निर्भर होती गई है, इसलिए पशुओं को पालना, खिलाना-पिलाना-चराना लोगों के लिए श्रमसाध्य काम लगने लगा है।

इसी तरह फलदार वृक्षों के बाग लगाने का चलन काफी कम हो गया है। पहले कहावत थी कि आधी खेती आधी बारी। यानी खेती और फलों का उत्पादन बराबर मात्रा में होना चाहिए। मगर अब फलदार पेड़ लगाना महंगा सौदा हो गया है, फिर परिवारों के बंटने से लोगों के पास खेत का रकबा कम होने के कारण वे बगीचे लगाने में दिलचस्पी नहीं दिखाते। बगीचे वही लोग लगाते हैं, जो फलों की बिक्री से पैसा कमाना चाहते हैं। इस तरह फल सामान्य लोगों की पहुंच से दूर होते गए हैं। ग्रामीण लोगों में संतुलित भोजन की आदत विकसित करने के लिए जरूरी है कि खेती-किसानी में विविधता लाने के प्रति उनमें जागरूकता पैदा करने वाले व्यावहारिक कार्यक्रम चलाए जाएं।

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