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प्रसंग : वर्चस्व की व्यथा

संजीव चंदन पिछले दिनों आंबेडकर की विरासत पर कब्जे के लिए भारतीय जनता पार्टी कुछ उतावली दिखी। लोकसभा चुनावों के दौरान नरेंद्र मोदी ने अपना पूरा चुनावी भाषण आंबेडकर और उनके योगदान पर केंद्रित कर दिया था। जब वे प्रधानमंत्री बने तो उनकी पार्टी ने आंबेडकर के परिनिर्वाण दिवस (6 दिसंबर) पर कार्यक्रम आयोजित किए। […]
Author February 1, 2015 18:02 pm

संजीव चंदन

पिछले दिनों आंबेडकर की विरासत पर कब्जे के लिए भारतीय जनता पार्टी कुछ उतावली दिखी। लोकसभा चुनावों के दौरान नरेंद्र मोदी ने अपना पूरा चुनावी भाषण आंबेडकर और उनके योगदान पर केंद्रित कर दिया था। जब वे प्रधानमंत्री बने तो उनकी पार्टी ने आंबेडकर के परिनिर्वाण दिवस (6 दिसंबर) पर कार्यक्रम आयोजित किए। इसके पहले संघ परिवार ने छह दिसंबर को बाबरी मस्जिद तोड़ कर इस दिन के महत्त्व को हिंदू खाते में डालने की कोशिश की थी, जिसे संघ परिवार के अलग-अलग संगठन ‘शौर्य दिवस’ के रूप में मनाते हैं।

भाजपा और संघ परिवार का यह पहलू बदला है आंबेडकर की विरासत पर भगवा कब्जे के लिए, जो उनकी रणनीति का हिस्सा भर है, न कि ‘हृदय परिवर्तन’। पिछले चुनाव में उन्हें दलित-पिछड़ों के वोट अलग-अलग कारणों से मिले, जिसे वे अब अपने पाले में बनाए रखना चाहते हैं। इसी रणनीति का हिस्सा है संघ प्रमुख का वह बयान, जिसमें उन्होंने अपने आधार समर्थक द्विजों को कम से कम सौ साल तक आरक्षण बर्दाश्त करने की नसीहत दी।

जहां एक तरफ दक्षिणपंथी जमात रणनीतिक तौर पर दलितों-पिछड़ों को एक संकेत दे रही है, वहीं पिछले दिनों कुछ वामपंथी या उदार बुद्धिजीवियों के कुछ लेख सामने आए, जो ब्राह्मणेतर मनीषा, चेतना पर अपने ही अंदाज में सवाल खड़े करते दिखे। एक लेख भारत में जाति के प्रश्नों पर विचार करते हुए वामपंथी जमात के लेखकों/ विचारकों का है (‘जाति प्रश्न और उसका समाधान: एक मार्क्सवादी दृष्टिकोण’, दिशा संधान अंक-02)। उसकी कुल उपलब्धि चुनावी राजनीति से जुड़ी वामपंथी पार्टियों (भाकपा, माकपा, माले) की इस बात के लिए आलोचना करते हुए अपनी स्थापनाएं देना है कि वे जाति के सवाल को ठीक से नहीं संबोधित कर सकीं। वे उससे भी ज्यादा अपराधी हैं, दलित राजनीति के दबाव में आंबेडकर के प्रति अपने नरम रुख के लिए।

उनकी व्याख्या की हद यह है कि वे दलित चेतना के प्रतीक-पुरुषों के प्रति अपमानजनक भाषा में अपनी बात कहते हैं। वे साहूजी महाराज के सारे कामों को क्षत्रिय माने जाने की कवायद का हिस्सा मानते हैं, तो आंबेडकर को ‘कलमघिस्सू’ नासमझ बताते चलते हैं। अपनी स्थापनाओं में अंतर्विरोधों से घिरे ये चिंतक जाति उन्मूलन के अपने कार्यक्रम की धीरे-धीरे अनिश्चित काल में सफलता का कोई ख्वाब पेश करते हैं। वे जाति से परे ‘भोज-भात’ जैसे समाधान लेकर आते हैं, जिसे न सिर्फ दलित चेतना खारिज कर चुकी है, बल्कि इसके छद्म पर काफी कुछ लिखा जा चुका है। अपनी इस अनिश्चितकालीन जाति उन्मूलन योजना के साथ वे आंबेडकर को इसलिए विफल बताते हैं कि उनके जीवनकाल में और आजादी के बाद अब तक जाति-व्यवस्था का खात्मा नहीं हो सका है। यह लेख आंबेडकर, पेरियार सहित वर्तमान में सक्रिय दलित बुद्धिजीवियों को खारिज करने की योजनाबद्धता के साथ लिखा गया है।

एक दूसरा लेख मासिक ‘हंस’ में छपा (‘मिथक, संस्कृति और इतिहास: फारवर्ड प्रेस के बहाने’, अपूर्वानंद), जिसकी योजना जातीय दंभ और बौद्धिक चालाकी के साथ बनाई गई दिखती है। दिल्ली से प्रकाशित पत्रिका फॉरवर्ड प्रेस पर हुई पुलिस कार्रवाई और दुर्गा-महिषासुर मिथक के बहाने यह लेख प्रतिबद्धता की खोल से दलित-बहुजन बौद्धिकता पर हमलावर है। कई उद्धरणों के साथ, मूलत: डीडी कोसंबी के हवाले से लिखा गया यह लेख अकादमिकता के विचित्र दावे के साथ लिखा गया है। एक निगाह में तो यह मिथकों के बहुजन पाठ के साथ खड़ा दिखता है, लेकिन यह फॉरवर्ड प्रेस की अकादमिकता पर सवाल खड़े करते हुए जेएनयू में ‘महिषासुर शहादत दिवस’ के आयोजक की नीयत को भी कठघरे में लेने की कोशिश करता है। आयोजकों के इस प्रयास में उत्तेजना फैलाने का लक्ष्य देखता है।

इस लेख के कुछ और रंग हैं, लेखक के खुद के ब्राह्मण होने और फिर प्रगतिशील सवालों के साथ ब्राह्मण जड़ताओं से मुक्त होने का विस्तृत प्रसंग है यहां। किसी छात्रा के बहाने फॉरवर्ड प्रेस में दुर्गा मिथ को लेकर किए गए सवाल (नहले) पर स्त्रीवादी सवाल (दहला) पेश करना आदि।

इस लेख में यह भी निष्कर्ष है कि ‘लेकिन किसी प्रभुत्वशाली’ वृत्तांत को चुनौती देने में कड़वाहट पैदा न हो, क्या यह संभव है?’ लेखक जब इसी निष्कर्ष पर है, तो वह किस बिना पर जेएनयू में आल इंडिया बैकवर्ड स्टूडेंट फोरम द्वारा आयोजित ‘महिषासुर शहादत’ दिवस के आयोजकों के इरादे में उत्तेजना पैदा करने का उद्देश्य देख लेता है? क्या इसलिए कि आयोजक संगठन के नाम में बैकवर्ड लगा है और यह किसी द्विज की ‘प्रगतिशील चेतना’ से पैदा आयोजन नहीं है!

फॉरवर्ड प्रेस घोषित तौर पर ‘बहुजन चेतना’ की पत्रिका है, क्या इसीलिए लेखक को दुर्गा मिथ के खिलाफ इसके प्रतिबद्ध प्रकाशन का उद्देश्य ज्ञानात्मक नहीं, राजनीतिक दिखाई देता है! जबकि वे शायद भूल रहे हैं कि जिन डीडी कोसंबी के उद्धरणों से वे ज्ञानात्मक चर्चा अपने लेख में कर रहे हैं, उनकी स्थापनाओं के अलावा पुराणों के सीधे उद्धरणों सहित दूसरे कई विद्वतापूर्ण लेखों के उद्धरण फेसबुक पर फॉरवर्ड प्रेस की मुहिम के समर्थक लेकर आ रहे थे, लिंक दे रहे थे और जिनमें से अधिकतर बहुजन समाज के चिंतक-विचारक थे, इनमें से एक इस पत्रिका के संपादक भी थे।

छात्रा के हवाले से लेखक जिन स्त्रीवादी सवालों (?) के साथ उपस्थित हैं, क्या उसके पहले उन्होंने दुर्गा मिथ के खिलाफ देश भर में आयोजनों के समर्थक जिस प्रारूप के साथ खड़े हैं, उनसे गुजरने की जहमत उठाई? क्या किसी की हत्या का जश्न स्त्रीवाद है? क्या स्त्री के ब्राह्मणवादी पितृसत्ता द्वारा इस्तेमाल के खिलाफ निर्मित मिथ का पुनर्पाठ स्त्रीवाद-विरोधी प्रयास है? क्या बंगाल की यौनकर्मियों का दुर्गा के मिथ से खुद को जोड़ना स्त्री-विरोधी मुहिम है? क्या पितृसत्ता द्वारा, जो निश्चित ही भारत के मामले में ब्राह्मणवादी पितृसत्ता है, हर निर्मित स्त्री (जैसा कि स्त्रीवाद में सांस्कृतिक निर्मिति सर्वमान्य सिद्धांत है) स्त्रीवादी ही होगी और उसके हर सवाल क्या स्त्रीवाद के सवाल होंगे? क्या ‘पति परायण सती साध्वी स्त्री’ भी ऐसी स्थिति में स्त्रीवादी नहीं मानी जाएगी?

पता नहीं क्यों यह लेख एक मासूम से सवाल को स्त्रीवादी घोषित कर रहा है। लेख की तैयारी के पूर्व जितना डीडी कोसंबी के उद्धरणों पर मेहनत की गई है, उससे कम भी अगर फॉरवर्ड प्रेस या महिषासुर शहादत के आयोजकों की मुहिम को समझने के लिए की जाती तो यह ‘प्रगतिशील, लेकिन अंतत: द्विज मन’ के स्त्रीवादी कोने को व्यथित नहीं करती। आयोजकों ने शहादत दिवस मनाने की प्रगतिशील पद्धति बताई है, जो किसी पुरोहित की पूजा पद्धति नहीं है। इसमें एक प्रावधान है कि एक स्त्री द्वारा कराई गई इस हत्या के जश्न के खिलाफ शहादत दिवस का आयोजन बौद्धिक बहस के रूप में हो, जिसकी अध्यक्षता कोई स्त्री ही करे।

सवाल है कि इन दोनों लेख-प्रसंगों में दलित-बहुजन बुद्धिजीवियों या आंदोलनों पर सवाल क्यों खड़े किए जा रहे हैं? क्या विमर्श की डोर द्विज हाथों से छूटती जा रही है! या इसलिए कि पिछले तीन-चार दशक में आंबेडकरवादी आंदोलन और चेतना ने अपने को अनिवार्य बना लिया है, जिसके चलते द्विजों को इसी दायरे से अपनी बात कहना उनकी मजबूरी बन गई है! क्या इसलिए कि अब उनकी आसान प्रगतिशीलता प्रश्नों के घेरे में है, उन्हें संदेहों से गुजरना पड़ रहा है!
खारिज किए जाने की इन मुहिमों से बचने की जरूरत है, नहीं तो संघ परिवार छद्म उदारता के साथ दलित-बहुजन विरासत को हड़प लेने की तैयारी में है। मगर आप हैं कि अपनी द्विज श्रेष्ठता की ग्रंथि से बाहर ही नहीं आना चाहते!

 

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