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दक्षिणावर्त : शहीद की बेटी

तरुण विजय अलका छठी कक्षा में पढ़ती है। अपने पिता की शहादत पर रुलाई को बहुत कड़ाई से थामते हुए वह चिल्ला कर बोली थी- जय महाकाली, आयो गोरखाली। उसके पिता कर्नल मुनींद्रनाथ राय गोरखा राइफल्स के युद्ध सेवा मेडल से अलंकृत अधिकारी थे, जो 27 जनवरी को कश्मीर में आतंकवादियों के साथ मुठभेड़ में […]
Author February 1, 2015 18:06 pm

तरुण विजय

अलका छठी कक्षा में पढ़ती है। अपने पिता की शहादत पर रुलाई को बहुत कड़ाई से थामते हुए वह चिल्ला कर बोली थी- जय महाकाली, आयो गोरखाली। उसके पिता कर्नल मुनींद्रनाथ राय गोरखा राइफल्स के युद्ध सेवा मेडल से अलंकृत अधिकारी थे, जो 27 जनवरी को कश्मीर में आतंकवादियों के साथ मुठभेड़ में शहीद हो गए। उनके साथ जम्मू-कश्मीर पुलिस के सिपाही संजीव सिंह भी शहीद हुए। उनतालीस वर्षीय कर्नल राय के पिता नागेंद्र प्रसाद राय उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले के निवासी हैं। साधारण अध्यापक के नाते उन्होंने दार्जिलिंग में नौकरी की और वहीं अपने तीनों बेटों को पढ़ाया। तीनों बेटे फौज में भर्ती हुए। ऐसे माता-पिता कितने मिलेंगे, जो उत्साह से बच्चों को फौज में भेजें?

उनसे मिल कर बड़ा सुकून महसूस हुआ। हम सोचते हैं जिनको राष्ट्रपति भवन में खिताब मिलते हैं, वही बड़े होते हैं। पर कितना गलत साबित होता है यह। जिस पिता ने अपने सब बच्चे देश के लिए दिए, उससे बड़ा कौन खिताबधारी हो सकता है। नागेंद्र प्रसाद हमारा हाथ अपनी दोनों हथेलियों में दबाए भावुक हो गए। आंखों से आंसू इतने निकले कि भूल ही गए कि उनकी संतान कहां पढ़ी। दो बेटियां हैं। कर्नल राय की माताजी अब बहुत वृद्ध हो गई हैं। जब हम गए तो थल सेनाध्यक्ष की सहधर्मिणी उनको बहुत आत्मीयता से ढाढस बंधा रही थीं। हम सब कुछ मदद करेंगे, आप फिक्र मत करो। मां क्या कहती? बस धन्यवाद, धन्यवाद, किसी तरह मुंह से निकाल रोती रही।

अचानक आए खालीपन को कौन भरेगा? अलका ने अपने पिता को एक फौजी की तरह सैल्यूट देते हुए विदा किया। मैंने अलका से कहा, बेटा तुम्हारी हिम्मत देख कर मैं मिलने आया। रोना मत। अलका बोली, कभी नहीं रोऊंगी, मुझे अपने पापा पर गर्व है। मैं क्यों रोऊं?

आतंकवादियों से मुठभेड़ में शहीद होना या पाकिस्तानी गोलीबारी में हताहत सैनिक अब साधारण से ही समाचार हैं। हमें उनसे मिलने, उनके परिजनों के साथ सांत्वना के दो शब्द कहने की भी या तो फुर्सत नहीं मिलती या आवश्यकता नहीं महसूस होती। सैनिक हैं तो ऐसी घटनाओं के लिए वे स्वयं और उनके परिवार के लोग मन से तैयार ही रहते होंगे, यह हम सोच कर चुनाव, ओबामा, घटिया नारेबाजी, आरोप-प्रत्यारोप और घर, दफ्तर के बाकी कामकाज में व्यस्त हो जाते हैं। कर्नल राय की शहादत दिल्ली के अखबारों में आई तो कुछ चर्चा भी हो गई। कांस्टेबल संजीव सिंह भी तो शहीद हुए। उनके बारे में न कुछ ज्यादा छपा, न चर्चा हुई।

ऐसे विषयों में रैंक या ओहदे की बात नहीं होनी चाहिए। संजीव सिंह हों या एमएन राय, मलकियत सिंह या मुहम्मद फजल, जो जहां भी भारत के लिए काम आया, सारे भारत को उनका कृतज्ञ होना चाहिए।

पर हमारी दृष्टि में शहादत का अर्थ राष्ट्रीय दिवसों पर गीत और कुछ फिल्मों का ही मामला रहता है। इस देश में सैनिक की शहादत पर समाज सिर्फ बातें करता है- सम्मान का भाव भाषण या शब्दों के विलास तक सीमित रहता है। रेलगाड़ी में सफर करते समय अक्सर देखा जाता है कि अगर फौजी का आरक्षण नहीं है तो वह अपना बिस्तर और ट्रेक टायलेट के पास सटा कर रात बिता देता है- यात्री, जो सभी देशभक्त और भारतीय ही होते हैं, तनिक सिकुड़ कर अपनी बर्थ पर उसे बैठने की भी जगह नहीं देते। सैनिक की छुट्टी का बड़ा हिस्सा आने-जाने में चला जाता है- आपातकाल में, घर में सुख-दुख के वक्त छुट््टी मिलेगी ही, यह जरूरी नहीं। हफ्ते भर की छुट्टी भी मिले तो लेह, तवांग या सिक्किम से मुजफ्फरपुर, पिथौरागढ़ या कोयंबतूर पहुंचने में ही तीन दिन लग जाते हैं। ट्रेन में आरक्षण न हो तो भी जाता है। और हम लोग फौजियों को दो इंच की बर्थ पर जगह नहीं देते। एक टिकट चैकर को मैंने एक फौजी की पत्नी से बहुत खराब भाषा में बात करते देखा, जो जम्मू अपने पति से मिल कर मेरठ लौट रही थी और यात्रा-चालान का शायद कोई कागज भूल आई थी। मैं टीटी पर गुस्सा हुआ तो कोई भी सहयात्री मेरे साथ खड़ा नहीं हुआ।

फौजी के परिजन का क्या हमारे जिलों के अधिकारी सम्मान करते हैं? अगर मकान-जायदाद या स्कूल में प्रवेश जैसे साधारण मामलों में फौजी के घर वाले किसी अफसर या प्रधानाचार्य से मिलने जाएं तो क्या वे लोग यह देख कर कि आने वाले सज्जन फौजी परिवार से हैं, उनकी अतिरिक्त सुनवाई करते हैं? सम्मान में जल्दी काम करने का भरोसा देते हैं? दादागीरी और बदजुबानी से अफसरों को ठोकर में रखने वाले उपद्रवी नेताओं को देख कर ही जो ये बड़े शालीन, भद्र, सफेद कमीज वाले अफसर खड़े हो जाते हैं, वे अपने दफ्तर के बाहर बैंच पर फौजी की पत्नी, माता-पिता को घंटों इंतजार करवा कर चपरासी से यह भी कहलवा देते हैं- आज मिलना नहीं होगा- कल दुबारा आना।

जिन विदेशियों की हम अपने हजारों वर्ष पुराने इतिहास का दंभ दिखा कर बुराई करते हैं और उनकी बाजारवादी संस्कृति का मखौल उड़ाते हैं, उनसे सीखिए कि सैनिक और उसके परिवार का सम्मान कैसे किया जाता है। सैनिक की शहादत पर पूरा शहर उमड़ता है। वहां श्रद्धांजलि दी जाती है और सबको बताया जाता है कि यहां उस वीर के बच्चे पढ़ रहे हैं- इसलिए यह स्कूल महान है।

कर्नल मुनींद्रनाथ राय की दो बेटियां हैं- अलका और ऋचा। एक बेटा है- आदित्य जो शायद पहली कक्षा में है। क्या इन बच्चों को समझाया जा सकता है कि अब उनके पिता नहीं रहे? क्या अलका और ऋचा के विद्यालय में प्रधानाचार्य ने यह कष्ट किया होगा कि बच्चों के सामने उस कर्नल की वीरता का बखान कर मौन श्रद्धांजलि दी जाए और बताया जाए कि इस विद्यालय में उस शहीद के बच्चे पढ़ते हैं? क्या उनके किसी कक्ष में उस वीर कर्नल का चित्र लगेगा?
शायद नहीं। प्रधानाचार्य का सरोकार बच्चों की पढ़ाई से है, यह काम उस परिधि में नहीं आता। स्कूल में जाति, बिरादरी, दानदाताओं, धार्मिक नेताओं या स्कूल के प्रबंधन से जुड़े लोगों के चित्र लग सकते हैं। लेकिन उनके नहीं, जिनकी हिम्मत की बदौलत ये तमाम लोग जिंदा हैं और उनकी इमारतें सही-सलामत हैं।

एक बात बस कह कर देख लीजिए कि जिन कायरों ने हमारे सैनिक पर हमला कर उन्हें शहीद किया, उनकी तमाम जमातों और गिरोहों को खत्म कर इस शहादत का प्रतिशोध लेना होगा। बस बिफर पड़ेंगे आप पर ये तमाम खद्दरधारी नक्सली विचारक और गिलानी के दिल्ली वाले रक्षा-कवच। आपको सांप्रदायिक, युद्धोन्मादी, हिंसक और पाकिस्तान से दोस्ती का विरोधी जंग-खोर साबित कर दिया जाएगा। भाई, अपनी सरहद के भीतर अगर हमसे संविधान विरोधी आतंकवाद समाप्त करने की बात करें तो इसमें पाकिस्तान से दोस्ती का खाना खराब करने का कहां से मिजाज आ गया? पाकिस्तान से दोस्ती की खातिर हमें अपने ही नागरिकों पर आतंकवादी हमले नरमाई से सहन करते रहने होंगे।

नागेंद्र प्रसाद राय और अलका तीन पीढ़ियों के प्रतिनिधि हैं। एक पीढ़ी ने अपने तीनों बेटे फौज में देने का मन बनाया, यह नहीं सोचा कि एक भले फौज में जाए, लेकिन बाकी दो तो घर में या आसपास रहें। आइएएस या ऐसे ही बड़े अफसर हो जाएं। तीसरी पीढ़ी ने अपने पिता की शहादत पर अपनी गोरखा पलटन का नारा बुलंद करते हुए गर्वीली श्रद्धांजलि दी। ऐसा परिवार धन्य है। ये तमाम नेता और अभिनेता, जिनमें से शायद ही कोई- जी हां, शायद ही कभी दुर्लभता से किसी नेता के
परिवार का बेटा फौज में गया हो, उन साधारण अध्यापक नागेंद्र प्रसाद और उनकी पोती अलका के सामने निहायत बौने हैं।

यह देश ऐसे ही लोगों की वजह से बचता है। प्राण पाता है, आगे बढ़ता है। इनकी पेंशन, भत्ते, तरक्की, रैंक आदि की समस्याए हैं। इनके पक्ष में अदालतें फैसला देती हैं तो भी सरकार उन फैसलों के खिलाफ, अपने ही सैनिकों के खिलाफ अदालत में उतरती है। फिर भी, सब कुछ होते हुए या बहुत कुछ न भी होते हुए, ये भारत के उन परिवारों से हैं, जहां फौज में भर्ती होना वेतन के लिए नहीं, अपने खानदान की इज्जत और मातृभूमि की रक्षा के लिए जरूरी माना जाता है। ये लोग रिश्वत देकर पाई अफसरी या नारेबाजी और चरण-स्पर्शी कलाकारी से नेतागीरी करने में माहिर लोगों से भिन्न अलग दरजे के भारतीय हैं- जिनके बारे में शायद कभी दो-चार पंक्तियां तभी छपती हैं जब ये शहीद होते हैं। इन्हें हथियार ठीक न मिले, वर्दी घटिया मिली, पांवों में गरम जुराबें न मिलीं, तब भी 1962 के हड््िडयां कंपाने वाले सर्द मौसम में इन्होंने ही चीन को करारा जवाब दिया था। 1962 में फौजी नहीं, दिल्ली का नेता हारा था। फौजी सदा विजयी ही रहा है।

अलका बिटिया रोएगी नहीं, वह सवाल पूछेगी। इस देश से। देश के उन देशभक्तों से जो अपनी हर जिम्मेदारी सिर्फ सरकार पर डाल कर स्वयं मुक्त हो लेना चाहते हैं। जिस समाज की राष्ट्रीय भावनाओं का हम बढ़चढ़ कर बखान करते हैं, उस समाज ने सैनिकों के प्रति सामान्य सामाजिक शिष्टाचार में कितना सम्मान बढ़ाया है? सैनिक होना और सैनिक के परिवार का होना कितने गौरव और प्रतिष्ठा का विषय बनाया है? मनोज कुमार, सनी देओल और अक्षय कुमार की फिल्में सैनिक को समाज में कितना प्रतिष्ठा दे पाई हैं? क्या वजह है कि सेना में अफसरों और जवानों की भर्ती के वक्त पर्याप्त संख्या में सुयोग्य उम्मीदवार नहीं आते? क्या जीवन का अभीष्ट सिर्फ सिविल सर्विस, एमबीए और विदेश जाने का मौका ढूंढ़ना मात्र रह गया है और जो जब कहीं और नौकरी न पा सके तो उसके लिए फौज आखिरी रास्ता माना जाए? जब सब रास्ते बंद तो चलो देशभक्ति से सहारे ही चला जाए? इस निकम्मेपन से वीरता की गाथा नहीं रची जाती। सीखना हो तो शहीद की नन्ही बेटी अलका के पांव तले की धूल पर लिखी इबारत से कुछ सीखो।

 

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