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दक्षिणावर्त : उनके चेहरे, हमारे चेहरे

तरुण विजय मणिपुर के एक वरिष्ठ राजनेता के साथ घटी यह सत्य घटना है। वे बाद में मुख्यमंत्री भी बने। तब गांधी टोपी, खद्दर की बंडी और कुर्ता पहनने का बहुत चलन था। उसी वेश में वे कनाट प्लेस गए, शंकर मार्केट के पास चाट खाने रुके। उन्हें खादी में यों चाट खाते देख एक […]
Author March 15, 2015 08:07 am

तरुण विजय

मणिपुर के एक वरिष्ठ राजनेता के साथ घटी यह सत्य घटना है। वे बाद में मुख्यमंत्री भी बने। तब गांधी टोपी, खद्दर की बंडी और कुर्ता पहनने का बहुत चलन था। उसी वेश में वे कनाट प्लेस गए, शंकर मार्केट के पास चाट खाने रुके। उन्हें खादी में यों चाट खाते देख एक सज्जन, जो पंजाब से थे, शायद खुद को रोक न पाए और बोल बैठे, ‘आर यू फ्रॉम थाईलैंड?’ वे चाट खाते रहे। फिर पैसे देते वक्त बोले, ‘नहीं, मैं तो भारत से हूं। आप क्या मद्रास से हैं?’ वह प्रश्नकर्ता भड़क गया। ‘मैं मद्रासी लगता हूं? आई एम फ्रॉम पंजाब।’
यह घटना हंसी में भी टाली जा सकती है। और इस पर दुखी भी हुआ जा सकता है।

मणिपुर हमें अपना क्यों माने अगर हम उसे अपना नहीं समझते? वह प्रदेश केवल राधाकृष्ण के विश्वप्रसिद्ध नृत्य का नहीं, वहां इसके अलावा भी बहुत कुछ है। कुल सत्ताईस लाख की आबादी है। अड़तीस विद्रोही, आतंकवादी, भारत-विरोधी संगठन यहां सक्रिय हैं। सब विदेशी मदद पर पलते हैं। कुछ के अड््डे म्यांमा की अराकान पहाड़ियों और जंगलों में हैं, कुछ बांग्लादेश में। एक बड़े संगठन के नाम से उनकी बिरादरी का अंदाजा हो जाएगा- उसका नाम है पीपुल्स लिब्रेशन आर्मी। वे मार्क्सवादी-लेनिनवादी धारा को मानते हैं।

वहां अनेक वर्षों से हिंदी, किंवा सभी भारतीय भाषाएं प्रतिबंधित हैं। दस वर्ष पहले एनडीए प्रथम के काल में नगाक्षेत्र में मणिपुर का कुछ हिस्सा जाने की गलतफहमी हो गई। बस दो सौ से भी अधिक वर्ष पुरानी बंगाली लाइब्रेरी जला दी। अमूल्य धरोहर, मणिपुर की धरोहर भस्म हो गई। पहले बांग्ला लिपि में ही मणिपुरी लिखी जाती थी। हस्तलिखित ग्रंथ, इतिहास, प्राचीन वृत्तांत- सब नष्ट।

यहां शेष देश से आए भारतीय डरे-सहमे रहते हैं। पिछले कुछ वर्षों में सौ से ज्यादा हिंदीभाषी- अधिकतर बिहार से आए, मारे गए। शर्त लगा कर मणिपुर के ओर-छोर तक ढंूढ़ आइए- एक शब्द भी हिंदी का नहीं मिलेगा- केवल केंद्रीय शासनांतर्गत हवाई अड््डे के। न फिल्म, न हिंदी गाने, न हिंदी फिल्में, न कोई डीवीडी, न पोस्टर, न बैनर, न दुकान का नाम, न सड़क का नाम। विश्व प्रसिद्ध मुक्केबाज मैरी कॉम मणिपुर की हैं- नगा जनजाति की हैं, पर है तो मणिपुर की बेटी। उस पर हाल ही में फिल्म बनी- प्रियंका चोपड़ा ने मुख्य भूमिका निभाई थी इसमें। दुनिया ने देखी यह फिल्म- सिवाय मणिपुर के। फिल्म हिंदी में थी, सो इंफल, चूड़ाचंद्रपुर, सेनापति, उखूल कहीं भी नहीं दिखाई गई।

मणिपुर में रेल नहीं। दीमापुर (नगालैंड) में उतरना पड़ता है। मणिपुर में कहते हैं- हमारे लिए दूसरे प्रदेश में सिर्फ पांच मिनट रेल रुकती है। एक ही राजमार्ग है जो शेष देश से जोड़ता है, नगालैंड से गुजरता है। उसे बंद कर दिया तो मणिपुर शेष देश से कट जाता है। अक्सर अस्सी दिन, एक सौ सोलह दिन, चालीस दिन, बीस दिन के बंद विद्रोही संगठन किसी भी बात पर कर देते हैं। सारी आपूर्ति बंद। पेट्रोल तीन सौ रुपए लीटर, गैस सिलेंडर बारह सौ रुपए का। उन दिनों विमान कंपनियां भी अपने टिकटों के दाम अनाप-शनाप बढ़ा देती हैं।
बताइए, मणिपुर कहां जाएं?

यहां का साठ प्रतिशत मीतेई-मणिपुरी समाज है। शेष अड़तीस मान्यता प्राप्त जनजातियां हैं, जिनमें तांगखुल, कूकी, शंगमेई, जेलियांग, माओ, लियांगमाई, कचा-नगा आदि हैं।
इस परिदृश्य में मणिपुर को सहारा मिलता है अपने असाधारण प्रतिभावान, साहसी, जबरदस्त खिलाड़ी युवाओं से, और अंतत: गोविंदजी से।

इंफल में गोविंदजी का मंदिर वहां के सामाजिक जनजीवन में अध्यात्म और शांति का एक केंद्र है। जिस दिल्ली का हिंदुस्तान कोलकाता के आगे नहीं जाता, उसे कैसे यह अहसास होगा कि संपूर्ण उत्तर भारत की होली अकेले मणिपुर की होली के आगे फीकी पड़ती है। हर साल, हर टीवी चैनल बरसाने की लट्ठमार होली और वृंदावन के मंदिर होली के राष्ट्र-गीत बना कर दिखाते हैं। क्या कभी किसी ने इंफल की होली के सीधे प्रसारण की जरूरत महसूस की? संभव ही नहीं है। क्योंकि हिंदी के अलावा इस देश के कर्ता-धर्ता अपना भारत-विश्व मानते ही कहां हैं?

होली पर पांच दिन पूरा मणिपुर त्योहारमय रहता है। पांच दिन लगातार बाजार बंद, दप्तर बंद, कामकाज बंद, सड़कों पर न के बराबर भीड़। पांच दिन प्रदेश के कोने-कोने से गुलाबी वस्त्रों में ‘पाला’ यानी टोलियां गोविंदजी के मंदिर में आती हैं। अत्यंत मधुर और सम्मोहित करने वाले स्वर में कृष्ण के होली गीत, भजन गाती हैं, वहीं बहुत ही भद्रता से पिचकारी के असली रंग और गुलाल का खेल होता है। कुछ-कुछ देर बाद सैकड़ों ‘पाला’ मंदिर आते हैं, होली खेलते हैं फिर अपने गांव, बस्ती को होली के लिए लौटते हैं।

हर बस्ती में, प्राय: हर घर के सामने स्थानीय ‘पाला’ होली खेलते हैं। बच्चे, नौजवान, हर सड़क पर गाड़ियां रोक कर ‘होली’ का चंदा मांगते हैं। सुरक्षाकर्मी, पुलिस, सेना- सबकी गाड़ियां रोकते हैं- कोई मांग नहीं, जितना दे दो- पांच, दस, बीस या सौ उतना लेकर मान जाते हैं।

लेकिन उससे भी बढ़ कर यह होता है कि इन पांच दिनों में मणिपुर एक बड़े खेल स्टेडियम में बदल जाता है। हर गांव, मुहल्ले, पंचायत, बस्ती में स्थानीय खेल संगठन हैं। सुबह साढ़े नौ बजे से रात बारह बजे तक बस्ती का हर व्यक्ति, बच्चा, महिला खेलों में शामिल होते हैं। मेरे सहयोगी प्रेमानंद शर्मा ने बताया कि मणिपुर में दस हजार से ज्यादा खेल संगठन होंगे। लंबी दौड़ सौ मीटर, मैराथन, बुद्धि और चुस्ती के खेल, शरीर बल प्रदर्शन, गुब्बारा फोड़, मुक्केबाजी, फुटबाल जैसे हर खेल में हर किसी की सहभागिता होती है। यह एक ऐसा दृश्य होता है, जिसे देखे बिना यकीन करना कठिन होगा।

इतना स्वस्थ, भद्र और उत्साहवर्द्धक होली का त्योहार क्या कहीं और मनाया जाता होगा। मैं इस बार होली पर छह खेल समारोहों में शामिल हुआ- कहीं भी कोई मुझे नशे में नहीं मिला। हर कोई खेल में मगन था। पुरस्कार? कलम, कोई पुस्तक या मणिपुर का प्रसिद्ध अंग वस्त्र।

होली को यहां याओशांग यानी ‘छोटी कुटी में देवता’ कहते हैं। क्योंकि पहले दिन होलिका दहन होता है तो उसके लिए एक सुंदर-सी छोटी कुटी बना कर उसमें होलिका रखी जाती है। पूजा होती है। गीत होते हैं। दहन के साथ पांच दिवसीय होली शुरू होती है और अंतिम दिन ‘हलंकार’ के साथ पूर्णाहुति होती है।

यहां के विश्वप्रसिद्ध चित्रकार थे राजकुमार चंद्रजीत साना। उनकी चित्र-वीथी इंफल में कलातीर्थ है। मणिपुर के इतिहास, बर्बर बर्मियों के हमले, जापानी सेना की बमबारी, नेताजी सुभाषचंद्र बोस द्वारा मोइरंग में तिरंगा लहराना, महाराजा मणिपुर द्वारा भारत में विलय के पत्र पर हस्ताक्षर- ऐसा कौन-सा मणिपुरी समय है, जो राजकुमार चंद्रजीत साना की सशक्त तूलिका से जीवंत न हुआ हो। पुरस्कार? उनके सुपुत्र और उनते ही बड़े चितेरे हाथ जोड़ कर खड़े हो गए- कृपया किसी पद्म पुरस्कार की कभी सिफारिश न करें। मणिपुर से ऐसे-ऐसे सड़क ठेकेदारों को पद्म मिले हैं कि हम कभी अपने लिए नहीं चाहेंगे। बस यहां के हर निवासी के मन में हमारे प्रति जो आदर है, वही पर्याप्त है।

इस मणिपुर की चिंता कीजिए। यहां की विश्व प्रसिद्ध झील लोकटक घूमने आइए। उसमें कूड़ा और झाड़ियां झील को नष्ट कर रही हैं। नगर के मध्य से बहती, कभी सुंदर इंफल नदी गंदा, सड़ा, ठहरा नाला बन गई है। वहां हर केंद्रीय योजना के सौ करोड़ में से दस-बारह करोड़ ही खर्च होता है। हर कर्मचारी, दुकानदार, योजना के निर्णायक अधिकारी को एक बड़ा हिस्सा विद्रोही संगठनों को देना होता है। बाकी नेता, कर्मचारी बांटते हैं।

यहां आतंकवाद, अंतरराष्ट्रीय विद्रोही गुट, भ्रष्टाचार एक ओर है तो दूसरी ओर है अद्भुत प्रतिभावान नई पीढ़ी, जो भारत का गौरव है। यहां मोदी सरकार ने एक खेल विश्वविद्यालय स्वीकृत किया, पर विडंबना देखिए राज्य सरकार जमीन ही तय नहीं कर पा रही। अकेले मणिपुर से भारत को ओलंपिक पदक दिलाने वाले खिलाड़ी मिल सकते हैं। एक-एक बस्ती ने, बिना सरकारी सहायता के, राष्ट्रीय खिलाड़ियों की कतार खड़ी की है। पर मणिपुर आने की किसे फुर्सत है?

यहां की एक एक परंपरा, मंदिर में पूजा अगर दस बज कर बीस मिनट पर निर्धारित है, तो ठीक उसी समय होती है। भोजन पकाने के वस्त्र अलग, परोसने के परिधान अलग, पत्तलों पर भोजन परोसने की पद्धति जादुई, स्थानीय मणिपुरी पोशाक की मंत्रमुग्ध करने वाली गरिमा में अभियान वाली महिलाएं और क्या समृद्ध और सुसंस्कृत भाषा है मणिपुरी। यह सब बचाना है तो चेहरे पहचानने होंगे।

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