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समांतर संसार : गुम होती लड़कियां

सय्यद मुबीन ज़ेहरा गणतंत्र दिवस के मौके पर अमेरिकी राष्ट्रपति ने राजपथ पर भारत की स्त्रीशक्ति को देखा, प्रभावित हुए और सीरीफोर्ट सभागार के अपने भाषण में उन्होंने इसका उल्लेख भी किया। उनके आने से कुछ दिनों पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’ अभियान की शुरुआत की। यह अभियान देश के उन […]

Author February 1, 2015 18:04 pm

सय्यद मुबीन ज़ेहरा

गणतंत्र दिवस के मौके पर अमेरिकी राष्ट्रपति ने राजपथ पर भारत की स्त्रीशक्ति को देखा, प्रभावित हुए और सीरीफोर्ट सभागार के अपने भाषण में उन्होंने इसका उल्लेख भी किया। उनके आने से कुछ दिनों पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’ अभियान की शुरुआत की। यह अभियान देश के उन सौ जिलों में चलाया जाना है, जहां लड़कियों का औसत अनुपात लड़कों के मुकाबले बहुत कम है। इसमें हरियाणा के बारह जिले शामिल हैं। हरियाणा लड़कियों के औसत अनुपात के मामले में बहुत पिछड़ा हुआ है। इस लिहाज से वहां से इसकी शुरुआत अहम है।

इस अभियान को लेकर कुछ लोगों का कहना है कि सरकार जब तक सख्त कानून लागू नहीं करती, तब तक बच्चियों के पेट में ही मारे जाने के अपराध को रोकना मुश्किल है। इस हत्या में मां-बाप खुद शामिल होते हैं। कुदरत ने जो दुनिया की सबसे सुरक्षित जगह बनाई है- मां की कोख- उसमें ही अगर बेटी का दम घोंट दिया जाए, तो बाकी जगह उसकी सुरक्षा को लेकर क्या कहा जा सकता है। इसके लिए सरकार को उन डॉक्टरों और चिकित्सा संस्थानों के खिलाफ ऐसी सख्त कार्रवाई सुनिश्चित करनी होगी, जो सोनोग्राफी के जरिए कोख में लड़का या लड़की की अवैध ढंग से पहचान करके उसके जीवन को खतरे में डाल देते हैं।

यह पहचान कराने वाले बहुत पढ़े-लिखे लोग होते हैं। इनसे अपेक्षा की जाती है कि समाज में जागरूकता फैलाएं, मगर ऐसे लोग भी नैतिक गिरावट का शिकार होकर अजन्मे शिशुओं की हत्या के रास्ते खोलते हैं, तो अंदाजा लगाया जा सकता है कि हम कैसे हत्यारों के समाज में रहने को मजबूर हैं। देश के पंद्रह जिले ऐसे हैं, जहां पुरुष और महिलाओं का औसत अनुपात सबसे खराब है, उनमें अकेले हरियाणा के नौ जिले हैं। हरियाणा के अलावा पंजाब के ग्यारह जिलों को इस अभियान के दायरे में लाया जा रहा है। इन दोनों राज्यों में लड़कियों का औसत अनुपात काफी कम है।

इस संबंध में सर्वोच्च न्यायालय ने भी पिछले सप्ताह हरियाणा में कन्याओं के घटते औसत पर गहरी चिंता व्यक्त की। उसने हरियाणा सरकार से कहा कि गर्भ में बेटियों की हत्या से संबंधित सभी एक सौ दो मामलों पर चार महीने के भीतर कार्रवाई पूरी हो जानी चाहिए। हरियाणा सरकार की ओर से पेश की गई रिपोर्ट में सभी इक्कीस जिलों में लड़कियों के औसत में साल-दर-साल गिरावट दर्ज हो रही है। सुप्रीम कोर्ट ने इसे पूरी सभ्यता के लिए खतरनाक बताया है। 2011 की जनगणना के अनुसार हरियाणा में महिलाओं की संख्या एक हजार पुरुषों की तुलना में 873 महिलाओं की राष्ट्रीय औसत से बहुत कम है।
हरियाणा में नारनौल के आसपास के साठ गांवों में पिछले एक साल में एक भी लड़की पैदा नहीं हुई। क्या यह महज संयोग है या इसके पीछे भी वही हत्यारी मानसिकता काम कर रही है, जो बेटियों को दुनिया में आने से पहले ही मौत की नींद सुला देती है।

लड़कियों की आबादी बढ़ाने के लिए वित्तीय सहायता देने से अधिक जरूरी समाज के सोच में बदलाव लाना है। जब यह समाज किसी न किसी तरह मेहनत-मजदूरी करके, बिना सरकारी मदद के लड़कों को पाल लेता है, तो लड़कियों के मामले में उसे क्यों तकलीफ होने लगती है। इसकी वजह हमारी संकीर्ण मानसिकता है, जो कन्याओं को न केवल बोझ समझती, बल्कि बनाती भी जा रही है। अगर लड़कियों के खिलाफ अपराध होते हैं, तो इसके लिए वे खुद उत्तरदायी नहीं हैं। अगर उन्हें कोई अपनी हवस का शिकार बनाता है तो वह भी इस समाज का ही हिस्सा होता है। अगर समाज में लड़कियों को सुरक्षा की जरूरत पेश आती है, तो इसके लिए समाज के लोग ही जिम्मेदार हैं।

अगर लड़कियों के हाथ पीले करना कठिन काम होता जा रहा है, तो इसके लिए भी समाज जिम्मेदार है, जो दहेज लेता और देता है। जो समाज धर्म के नाम पर एक-दूसरे की जान लेने में संकोच नहीं करता, वह कैसे भूल जाता है कि किसी भी धर्म में दहेज लेना और देना पाप है। शाहखर्ची और दिखावा समाज ही करता है, जिसकी वजह से शादी-ब्याह में देरी होती है। इससे समाज में बुराइयों को राह मिलती है। इसलिए सरकार चाहे जितना अपने खजाने का मुंह खोल दे, चाहे बेटियों के लिए जितनी परियोजनाएं चलाए, अगर बेटियों को लेकर समाज का सोच नहीं बदलेगा तो यह संभव ही नहीं है कि इसका फायदा लड़कियों तक पहुंच सके।

बेटियां आज के दौर में बेटों से कहीं अधिक माता-पिता की सहायक साबित हो रही हैं। पिछले दिनों हमारे घर पासपोर्ट के संबंध में जांच के लिए एक सरकारी कर्मचारी आए। उनके पास कागजात का बड़ा पुलिंदा देख कर मैंने पूछा कि वे तो इसे लेकर थक जाते होंगे। वे कहने लगे कि यहां के बाद रात को घर जाकर भी काम करना पड़ता है। बेटे तो देखते ही कि बापू फिर कागज इधर-उधर करवाएंगे, निकल जाते हैं। मगर बेटी, जो ग्यारहवीं में पढ़ती है, उनके साथ लगी रहती है और उनके कागजात रखने-संभालने में मदद करती है। वे कहने लगे कि पढ़ाई के साथ-साथ भाइयों का और मेरा भी ध्यान रखती है।
जबकि लड़के या तो टीवी में खोए रहते हैं या फिर यार-दोस्तों में। वे बेटी को आगे तक पढ़ाएंगे और उसके बाद ही उसकी शादी करेंगे। एक लड़की पढ़ जाती है, तो बच्चों को पढ़ी-लिखी गोद मिलती है और आज के दौर में यह बहुत जरूरी है।

इसके लिए जरूरी नहीं कि हम सरकार की आस लगाए बैठे रहें। सबसे पहले हमें बच्चियों को कोख में मारने वालों के साथ अपने रिश्ते खत्म करने होंगे। हम हत्यारों के साथ भला कैसे मेलजोल रख सकते हैं। इसके अलावा, ऐसे डॉक्टरों से दूरी बनानी होगी, जो पेट में बच्चियों को मारने में सहायक होते हैं। जो डॉक्टर अपराधी हो, उससे इलाज करवा कर हमें वैसे भी कोई लाभ नहीं हो सकता, क्योंकि उसका असल मकसद सेवा नहीं, पैसा कमाना है।

ये सब बातें अगर हमारे ध्यान में लगातार लाई जाती रहेंगी, तो यह स्वभाव में शामिल हो जाएगा कि हमें कन्या भ्रूण हत्या से समाज को रोकना है। अपने आसपड़ोस को महिलाओं के जीने लायक और सुरक्षित बनाना होगा। कन्या भ्रूण हत्या का पाप चाहे कोई अपना ही क्यों न करे, उसके खिलाफ खड़ा होना होगा। जहां तक सरकार की बात है, वह केवल अभियान शुरू न करे, बल्कि ऐसे मामलों में सख्त से सख्त सजा सुनिश्चित करे ताकि लोग इस तरह कोख में बच्चियों के संहार से डरें।

 

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