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दक्षिणावर्त : बंद आंखों का खुलापन

तरुण विजय समय की रफ्तार बदल रही है और कुछ तो ऐसा नयापन है जो द्वार पर दस्तक दे रहा है। आप चाहें तो सुनें और देखें या जी कड़ा करके, जीवाश्म बन चुके पूर्वग्रहों से चिपके उन्हें अनदेखा, अनसुना कर दें। भारत तो बढ़ेगा ही, श्रेय आप किसी को दें या न दें, बढ़ते […]

Author March 1, 2015 10:20 PM

तरुण विजय

समय की रफ्तार बदल रही है और कुछ तो ऐसा नयापन है जो द्वार पर दस्तक दे रहा है। आप चाहें तो सुनें और देखें या जी कड़ा करके, जीवाश्म बन चुके पूर्वग्रहों से चिपके उन्हें अनदेखा, अनसुना कर दें। भारत तो बढ़ेगा ही, श्रेय आप किसी को दें या न दें, बढ़ते कदम उसकी प्रतीक्षा में थमा नहीं करते।

पार्टियां कोई भी हों, सपा, बसपा, द्रमुक, अन्नाद्रमुक या नीतीश, मांझी या ममता। कौन नहीं चाहते कि देश आगे बढ़े, लोगों की गरीबी दूर हो, भारत दुनिया के मुल्कों में तरक्कीपसंद, मजबूत और दमदार देश के नाते जाना जाए। जब देश बढ़ता है और उसकी ताकत दुनिया कबूल करती है तो ऐसा कोई दुर्भाग्यशाली भारतीय ही होगा जो उस क्षण खुशी के बजाय मातम महसूस करे। हमारे कार्यक्रम और तरीके अलग-अलग हो सकते हैं। भारत एक विराट विश्व है और उसमें जितनी विविधताएं हैं, उनको साथ में लेकर चलने का जिसमें धैर्य और औदार्य हो, वही सुराज कर सकता है।

छोटी-छोटी संकीर्णताओं में अपनी अतिवादिताएं लेकर चलना द्वीप राजनीति के उस कगार तक ले जाता है जहां आज वामपंथी पहुंच गए हैं। कहीं नहीं हैं। जहां हैं, वहां भी या तो स्थानीय नेता के व्यक्तिगत प्रभाव का बल है या कुछ और समीकरण। इस देश में हिंदू बहुसंख्या कभी वैचारिक अतिवाद, भले ही वह कोई समूह हिंदुओं के किसी छायावादी रूप को लेकर ही क्यों न चलाए, को सर्वस्वीकार्य मुख्यधारा का हिस्सा नहीं बना सकती। जिसने कहा कि सिर्फ मैं सच हूं, वह बहुसंख्यक हिंदुओं की आंखों से ही उतरा। बाकी का भी मानस कोई अरब, तुरक या मंगोल तो गढ़ नहीं गए। पुर्तगाली ईसाइयों ने गोवा में हिंदू ब्राह्मणों पर इंक्वीजिशन यानी धीमी आंच में तपते लोहे के तख्ते पर निर्वस्त्र लिटा कर तड़पाने का प्रयोग भी किया। उसके बाद भी जो ईसाई बने, उन्हें वे पुर्तगाली तो नहीं बना सके। वे गोवा में सामंजस्य और समन्वय के सुंदर प्रतीक हैं। भारत में एकतरफा वैचारिक अतिवाद कुछ हिस्सों या हलकों में पलता रह सकता है, लेकिन उस राष्ट्र की छत्रछाया नहीं बन सकता जहां वैचारिक मत-भिन्नताएं, शास्त्रार्थ और तर्क-वितर्क, आस्थाएं और अनास्थाएं एक साथ फलती-फूलती हैं।

हम तंग आ चुके हैं गरीबी, बीमारी, बदहाली, सरकारी और गैरसरकारी भ्रष्टाचार, अशिक्षा के अंधेरे और असुरक्षित सीमाएं। हर रोज की खबरें कि आज नक्सली माओवादियों ने इतने सुरक्षा सैनिक और नागरिक मार दिए हैं या खदानों के धंधे में लाखों-करोड़ के घोटाले हो गए, उत्तर-पूर्वांचल में इसलिए पर्यटन नहीं बढ़ता, क्योंकि वहां विद्रोह और भारत विरोधी आतंकवाद व्यापक तौर पर फैला है, कब किसको उठा कर ले जाएं या मार दें, कह नहीं सकते। तिरंगे का फहराना और राष्ट्रीय गीत का गायन भारतीय सीमा के भीतर ही हम संगीनों के साए में करने पर क्यों मजबूर होते हैं? अच्छी सड़कें नहीं, गड्ढे वाले राजमार्ग और शिकायत करने के लिए जाएं तो कोई सुनने वाला नहीं। जम्मू-कश्मीर की अलग समस्या है। सांप्रदायिकता है, संगबाज हैं, अपने ही दो हिस्सों से सौतेलेपन का व्यवहार है। अरण्यरोदन की तरह से आकाश की ओर मुंह बंद करके चिल्लाने और रोने का मन कि इतने सुंदर, महान और अद्भुत कुशलताओं से युक्त नागरिक वाले देश को ऐसा बेसहारा क्यों छोड़ दिया।

भूल जाइए कि आप किसी पार्टी या विचारधारा या हलके से संबंध रखते हैं। देश को आगे बढ़ाने की तमन्ना तो दिल में है? जब आप विदेश जाते हैं तो वहां की प्रगति, सफाई, शक्ति और आत्मविश्वास देख कर अपने भारत की स्थिति के प्रति वेदना नहीं होती? बस इतना ही भर तो चाहिए। हिंदू-मुसलमान की रोटी की जरूरतें अलग होती हैं क्या? कुछ लोगों की जुबान में अलग तेजाब है तो उसकी वजह से सारे हिंदू या सारे मुसलमान सेक्युलर तालिबान की तेजाबी निगाहों के जरिए धिक्कार-योग्य हो जाएंगे क्या? हम जब जी चाहें अपने-अपने पैगंबर बना लेते हैं और फिर अपने हिस्से के सच को सारा सच मनवाने के लिए खून-खराबे तक उतर आते हैं।

कोलकाता स्थित मदर टेरेसा के निर्मल हृदय और कालीबाड़ी मंदिर के बगल में बने सेवाश्रय में जाकर आया। सच में उस महान समर्पित और दीन-दुखियों को अपने हाथों से त्राण देने की कोशिश करने वाली अल्बानिया की ईसाई नन के प्रति मन श्रद्धा से झुक गया। लेकिन यह मदर टेरेसा को पैगंबर बनाने वाले कौन हैं? उनसे पूछा जाए कि सेवाकार्यों का सम्मान करना तो हमारे हिंदू होने का एक हिस्सा है, चाहे वह कोई भी करे। लेकिन क्या यह करते समय यह भी जरूरी है कि चर्च के धर्मांतरण व्यापार का समर्थन किया जाए? बहुत पढ़े-लिखे सेक्युलर होते हैं। हमें विवेकानंद पढ़ाने लगे हैं। विवेकानंद ने ईसाई मिशनरियों के आक्रमण और निहायत अभद्र झूठ पर आधारित हिंदू विद्वेष के प्रति क्या कहा था? उन्होंने कहा था कि जब एक हिंदू धर्मांतरित होता है तो केवल हिंदुओं की संख्या एक कम नहीं होती, बल्कि एक शत्रु बढ़ता है। उन्होंने मिशनरियों को ललकार कर कहा था कि तुम जीजस के अनुयायी नहीं हो, जाओ और जीजस की शरण लो।

चर्च का धर्मांतरण व्यापार सारी दुनिया में विरोध और सामाजिक तनाव का कारण रहा है। इस चर्च ने जॉन ऑफ आर्क को दो बार जलाया और डर के मारे उसकी राख सिएन नदी में बहाई, ताकि वह कहीं जिंदा न हो जाए। सदियों बाद चर्च ने इस कृत्य के लिए माफी मांगी। संगठित आस्था कभी समाज का भला नहीं करती, जब तक कि उसमें सुधार और आत्मसंशोधन की कठोर आवाज न उठे या वैसी अनुमति न हो। आखिर प्रोटेस्टेंट पंथ क्यों जनमा?
मदर टेरेसा की सेवा में जो लोग लगे थे उनमें उनके सबसे प्रमुख हृदय रोग चिकित्सक डॉ सुजीत धर थे। मैं हमेशा कोलकाता में उनके घर ही रुकता था। भारत प्रसिद्ध कार्डियोलॉजिस्ट। जब कभी मदर टेरेसा को इमरजेंसी में डॉक्टर बुलाना पड़ता तो डॉ. सुजीत धर ही बुलाए जाते थे। उनके पास मदर के सैकड़ों अनुभव और प्रसंग थे। कभी भी उन्होंने उनकी आलोचना नहीं की। और डॉ सुजीत धर कोलकाता राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख और बाद में विश्व हिंदू परिषद के राष्ट्रीय पदाधिकारी रहे। इसे आप क्या कहेंगे? नफरत में डूब कर सद्भाव के उपदेश नहीं दिए जा सकते।

पहले अपने भीतर जमी नफरत की काई साफ करनी होगी और फिर खुद से पूछना होगा कि आज की परिस्थिति में जो भी है, जैसा भी है, उसमें देश के लिए हितकर क्या है? नरेंद्र मोदी के प्रति कितनी ही घृणा और विरोध पाल लें, लेकिन देश के प्रति तो अनुराग रखें। छोटे-छोटे दल और विचारविहीन राजनीतिक समुदाय किसका भला करेंगे? इसमें बहुत दार्शनिक व्याख्यान देने की आवश्यकता नहीं। हम पानसरे और दाभोलकर पर कायराना हमलों के विरुद्ध सबको खड़ा करना चाहते हैं। ठीक बात है।

अगर किसी की वामपंथी विचारधारा है और मैं उससे सहमत नहीं हूं तो क्या उसके व्यक्तिगत दुख में मुझे खुश होना चाहिए? अगर ऐसा है तो यह पाप है। लेकिन पानसरे और दाभोलकर पर संसद में शोर मचाने वाले केरल में स्वयंसेवकों को कायरों की तरह मारने वाले माकपाइयों के हमले पर चुप क्यों रहते हैं? क्यों बांग्लादेश में अभिजीत रॉय और उनकी पत्नी रुखसाना पर इस्लामी जिहादियों के हमले पर भारत का सेक्युलर मीडिया सन्नाटा ओढ़ लेता है? नेपाल में हिंदू राष्ट्र का सजावटी स्तर खत्म करने के लिए भारत के सेक्युलर युद्ध छेड़ते हैं, लेकिन इस्लामिक स्टेट के बर्बर और अमानुषिक जिहादियों द्वारा इराक में हजारों साल पुरानी इस्लाम पूर्व की कलाकृतियां नष्ट करने और दुर्लभ ग्रंथागार जलाने पर सन्नाटा ओढ़े रहते हैं। यह कहां का न्याय और वैचारिक महात्म्य है?

कुछ अच्छा होने दिया जाए। इतना भर हमारा सौभाग्य रहे कि जब देश ठहराव से गतिशीलता की ओर बढ़ रहा है तो हम उस अपूर्व, असाधारण भारत यात्रा के हिस्से हैं। आंखें बंद रखते हुए उषा का आगमन टाला तो नहीं जा सकता, बस अपने भीतर ही रोशनी उतरने से तनिक रोकी जा सकती है।

 

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