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दूसरी नजर: ज्यादातर भारतीय गरीब!

सबसे बड़ा सवाल तो यह है कि जो भी देना है, देंगे कैसे। सरकार स्कूलों और कॉलेजों में बिना बुनियादी सुविधाओं और प्रशिक्षित शिक्षकों के और ज्यादा सीटें बढ़ा सकती है। लेकिन सरकार में नौकरियों के मामले में देखें तो नौकरियां हैं कहां?

Author January 13, 2019 3:48 AM
पीएम नरेन्द्र मोदी, फोटो सोर्स- इंडियन एक्सप्रेस

उल्टी गिनती शुरू हो चुकी है। नरेंद्र मोदी की सरकार भी स्पष्ट रूप से यह समझ गई है। इस नतीजे के समर्थन में प्रमाण प्रतिदिन बढ़ते ही जा रहे हैं। हाल का ताजा सबूत तो यह है कि किस तरह जल्दबाजी में एक सौ चौबीसवें संविधान संशोधन विधेयक का मसविदा (सात जनवरी को) तैयार किया गया और नौ जनवरी को इसे संसद से पास भी करा लिया गया। याद कीजिए भारत का संविधान तैयार करने में कितना लंबा वक्त लगा था। यह भी याद करें कि 1951 में जो पहला संविधान संशोधन किया गया था, उसका मसविदा तैयार करने और उसे पारित करने में कितना समय लगा था। वह पहला संविधान संशोधन था, जिसमें ‘सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों या अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों’ के लिए ‘विशेष प्रावधान’ की अवधारणा प्रस्तुत की गई थी। यह ‘विशेष प्रावधान’ ही ‘आरक्षण’ के रूप में जाना जाता है।

खौफ में उठाया कदम
एक सौ चौबीसवें संशोधन को लेकर आलोचना इसलिए हुई है, क्योंकि इसे मात्र अड़तालीस घंटे के भीतर ही अंजाम दे दिया गया, वह भी बिना किसी संसदीय समिति की गहन जांच या सार्वजनिक बहस के। दूसरी ओर, लोकसभा में महिलाओं के लिए एक तिहाई सीटें आरक्षित करने के लिए संविधान संशोधन विधेयक 2008 से लटका पड़ा है। एक सौ चौबीसवें संशोधन की खूबियों को छोड़ दें तो यह एक ऐसे खौफ का संकेत है, जिसने भाजपा और सरकार दोनों को अपनी जकड़ में ले लिया है। ऐसे खौफ में आकर ही सरकार कई कदम उठा रही है, और किसानों को नगदी हस्तांतरण का कदम भी इनमें से एक है जिसका जिक्र मैंने छह जनवरी को इसी स्तंभ में किया था।

मूल भावना स्वीकार्य
अब बिल की खूबियों को देखें। विधेयक के साथ संलग्न उद्देश्यों और कारणों में कहा गया है-‘नागरिकों का आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों का एक बड़ा हिस्सा पैसे के अभाव में उच्च शिक्षण संस्थानों और सरकारी रोजगार से वंचित है और इसलिए वह उन लोगों से प्रतिस्पर्धा नहीं कर पाता जो आर्थिक रूप से ज्यादा सक्षम हैं।’ किसी भी राजनीतिक दल ने विधेयक के पीछे इस मूल भावना का विरोध नहीं किया। (कांग्रेस ने 2014 के लोकसभा चुनाव में अपने घोषणापत्र में आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों को आरक्षण देने का वायदा किया था।) इसलिए व्यापक रूप से इस विधेयक का विरोध इसके मूल सिद्धांत को लेकर नहीं, बल्कि उन दूसरे कारणों की वजह से है जो काफी महत्त्वपूर्ण और प्रासंगिक हैं और इनमें से कुछ ये हैं-
1- आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए आरक्षण अगर पिछले चार साल सात महीने में प्राथमिकता नहीं रही (जबकि तीन तलाक थी) तो अब, जब लोकसभा चुनाव की अधिसूचना जारी होने में साठ दिन से भी कम का वक्त रह गया है, सरकार की शीर्ष प्राथमिकता क्यों बन गई?
2- अनुच्छेद 15 की प्रस्तावित धाराएं 6 (ए) और (बी) इसी अनुच्छेद की मौजूदा धाराओं (4) और (5) की हूबहू नकल हैं, सिर्फ इसमें एक महत्त्वपूर्ण बदलाव किया गया है। जबकि अनुच्छेद 15 (5) के तहत विशेष प्रावधान (आरक्षण) के कानून द्वारा जरूरी बताया गया है, नई धारा में शब्द ‘कानून द्वारा’ हटा दिया गया है और इससे सरकारी स्कूलों और कॉलेजों में सरकारी आदेशों के जरिए ही सरकार को आरक्षण देने का अधिकार मल जाएगा।
3- एक महत्त्वपूर्ण बदलाव के साथ ही अनुच्छेद 16 की प्रस्तावित धारा (5) भी इसी अनुच्छेद की धारा (4) की नकल है। अनुच्छेद 16(4) में सिर्फ पिछड़े वर्ग को आरक्षण देने की अनुमति दी गई है जिनका सरकारी सेवाओं में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं है। नई धारा में खास शब्दों को हटा दिया गया है।
वैधानिक और नैतिक रूप से संदिग्ध
4- सुप्रीम कोर्ट के द्वारा घोषित कानून के मुताबिक नौकरियों में आरक्षण की अनुमति तब तक नहीं है जब तक कि संबंधित वर्ग का पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं हो, न ही सिर्फ आर्थिक पिछड़ेपन को आधार मान कर आरक्षण देने की बात है। ये फैसले मौजूदा संशोधन के पहले संविधान के मुताबिक दिए गए थे। सरकार को यह सलाह दी गई होगी कि अगर संविधान संशोधन हो गया तो इन फैसलों से निपटा जा सकता है। विधेयक के समर्थकों ने सरकार द्वारा प्राप्त कानूनी राय की मांग की ताकि वे अपने को इस बात के लिए संतुष्ट कर सकें कि कानूनी रूप से इसके पिट जाने की स्थिति में इसके भागीदार नहीं हैं।
5-सबसे ज्यादा आलोचना तो गरीबों का आकलन करने के तरीके को लेकर है। आठ जनवरी, 2019 को सारे अखबारों और चैनलों ने इसका एक-सा ही आधार बताया ( जाहिर है जैसा कि उन्हें सरकार ने बताया)। एक व्यक्ति जिसके परिवार की सालाना आय आठ लाख रुपए है, उसे गरीब माना गया है। विपक्ष ने सरकार से मांग की कि वह आंकड़े प्रस्तुत करे जिनके आधार पर आठ लाख की यह सीमा तय की गई है। लेकिन सरकार ये आंकड़े मुहैया नहीं करा रही। सार्वजनिक रूप से मौजूद आंकड़े बताते हैं कि भारत की सवा सौ करोड़ आबादी का पनच्यानवे फीसद हिस्सा इसके दायरे में आ जाएगा। अगर संशोधन के मुताबिक करीब-करीब हर नागरिक गरीब है तो ऐसे में जिनके लिए संशोधन लाया गया है वे तो गरीब से भी बदतर हालत में माने जाएंगे। जब तक कि गरीब को इस रूप में परिभाषित नहीं किया जाता जिससे कि आर्थिक पायदान पर आबादी का सबसे निचला बीस फीसद हिस्सा न आ पाए तो यह नया प्रावधान कानूनी और नैतिक दोनों ही तरह से संदिग्ध माना जाएगा।

सबसे बड़ा सवाल तो यह है कि जो भी देना है, देंगे कैसे। सरकार स्कूलों और कॉलेजों में बिना बुनियादी सुविधाओं और प्रशिक्षित शिक्षकों के और ज्यादा सीटें बढ़ा सकती है। लेकिन सरकार में नौकरियों के मामले में देखें तो नौकरियां हैं कहां? क्या यह सरकार का व्यापक स्तर पर जैसे- केंद्र, राज्य, नगर निगम, पंचायत और सार्वजनिक क्षेत्र- सरकार का विस्तार करने का इरादा तो नहीं है? केंद्रीय सार्वजनिक उद्यमों में कर्मचारियों की संख्या काफी घटी है। मार्च 2014 में यह सलह लाख नब्बे हजार सात सौ इकतालीस थी, जो मार्च 2017 में पंद्रह लाख तेईस हजार पांच सौ छियासी रह गई। ऐसे में जब रोजगार खत्म हो रहे हैं, तो और आरक्षण को सरकार का झांसा ही माना जाएगा। इसलिए यह विधेयक आरक्षण के लिए नहीं, आत्मरक्षा के लिए है।

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