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दूसरी नजर: गरीब को मिले नगदी

राज्य सरकारों की ओर से उन्हें कुछ नगदी मुहैया कराए जाने के बावजूद ज्यादातर गरीबों के सामने आजीविका का कोई साधन नहीं है। हमें गरीबों के हाथ में फिर से पैसा देना होगा, उनके हाथों में नगदी देनी पड़ेगी। भारत में छब्बीस करोड़ परिवारों में से आधे यानी तेरह करोड़ परिवारों तक पहुंचने का लक्ष्य हो।

भोजन सामग्री बांटने वालों के लिए यूपी सरकार ने एक गाइड लाइन तय की है। (indian express)

चीन में कोरोना विषाणु का पहला मामला 30 दिसंबर, 2019 को सामने आया था। जैसे-जैसे यह विषाणु पूरे वुहान शहर और फिर हुबेई और चीन के अन्य प्रांतों और दूसरे देशों में फैलता गया, उससे दुनिया खौफ में आ गई। जनवरी, 2020 के आखिर तक सत्ताईस देश इससे प्रभावित हो चुके थे। 12 फरवरी, 2020 को राहुल गांधी ने ट्वीट किया था-‘कोरोना विषाणु हमारे देश के लोगों और अर्थव्यवस्था के लिए गंभीर खतरा है। मुझे लग रहा है कि सरकार इस खतरे को गंभीरता से नहीं ले रही है। समय से कार्रवाई जरूरी है।’ 12 फरवरी तक केंद्र सरकार ने सिर्फ दो बड़े कदम उठाए थे। एक, 17 जनवरी को कुछ खास देशों की यात्रा के खिलाफ परामर्श जारी किया गया, और दूसरा यह कि तीन फरवरी को कुछ खास देशों से आने वाले यात्रियों को जारी किए गए ई-वीजा रद्द कर दिए गए।

सही थे राहुल गांधी
जैसी कि उम्मीद थी, ट्रोल भी सक्रिय हुए। किसी सरल पटेल ने लिखा- ‘बहुत खूब। क्या आपने हाल की खबर देख ली है।’ इसी तरह, पूजा ने लिखा- ‘हे भगवान, आप भी समझ सकते हैं। मजाक बंद कीजिए और जाकर पोगो देखिए….।’ मुझे आश्चर्य है कि आज सरल पटेल और पूजा कहां जाकर छिप गए हैं। तीन मार्च को राहुल गांधी ने एक बार फिर ट्वीट करते हुए मांग की थी कि ‘इस संकट से निपटने के लिए ठोस संसाधनों से युक्त कार्रवाई योजना की जरूरत है।’

14 मार्च से केंद्र सरकार हरकत में आई, कुछ खास देशों से आने वाले लोगों को अलग रखने का काम शुरू हुआ, पड़ोसी देशों से लगी सीमाएं बंद की गर्इं, अंतरराष्ट्रीय उड़ानों पर प्रतिबंध लगाया गया, घरेलू उड़ानें भी बंद कर दी गर्इं और आखिरकार 25 मार्च से देश भर में पूर्ण बंदी लागू कर दी गई।

अब लगता है, राहुल गांधी सही थे और इस संकट के बारे में सबसे पहले चेताने वालों में से थे। कर्नाटक, महाराष्ट्र, पंजाब और तमिलनाडु जैसे कुछ राज्यों ने तो केंद्र से पहले ही कदम उठा लिए थे, और अपने राज्यों के कुछ हिस्सों में बंदी लागू कर दी थी। कोविड-19 के खिलाफ जंग जीत जाने के बाद भी इस बात को लेकर बहस चलती रहेगी कि केंद्र सरकार ने जो कदम मार्च में उठाए, क्या उन्हें फरवरी में नहीं उठा लिया जाना चाहिए था।

इस स्तंभ का मकसद बीती बातों का विश्लेषण करना नहीं है, बल्कि इसका उद्देश्य सरकार को सख्त कदम उठाने के लिए प्रेरित करना है, ताकि इस विषाणु के खिलाफ लड़ाई, लोगों की जान बचाने, उनकी आजीविका सुरक्षित रखने और गिरती अर्थव्यवस्था को बचाने और फिर से ऊपर लाने में भारत आगे रहे।

कठोर कदमों की जरूरत
व्यापक स्तर पर इन बातों को लेकर सहमति है, जिन पर सरकार को कड़े कदम उठाने चाहिए-
1. विषाणु के फैलाव को रोकना और इलाज।
2. गरीब और वंचित तबके के लिए रोजीरोटी की मदद।
3. आवश्यक घरेलू सामान और सेवाओं की आपूर्ति को बनाए रखना।
4. नीचे जाती अर्थव्यवस्था को बचाना और उबारना।

पहले पर आएं, कई गलत शुरुआतों के बाद लगता है कि केंद्र सरकार मिल कर काम कर रही है। बंदी को सख्ती से लागू करने के लिए इसने राज्यों पर जिम्मेदारी डाल दी है। महामारी विशेषज्ञों और विपक्षी नेताओं के दबाव में, अगर व्यापक स्तर पर नहीं, इसने जांच का दायरा बढ़ाया है और इसके तहत हाल में स्वीकृत एंटीबॉडी टैस्ट कराने का फैसला किया है, जो तत्काल नतीजा देगा। स्वास्थ्य सुविधाओं के साथ चिकित्सा और बचाव संबंधी उपकरणों व सामान के उत्पादन में तेजी लाई जा रही है। इसमें भी राज्य सरकारें ही पहल कर रही हैं। अभी काफी कुछ किया जाना बाकी है।
दूसरे बिंदु पर देखें, तो सरकार दुर्भाग्य से पूरी तरह असफल रही है और राज्य सरकारों को कोई वित्तीय मदद नहीं बढ़ाई है। देश के संसाधनों पर पहला हक गरीबों और वंचितों का है। केंद्र सरकार की वित्तीय कार्रवाई योजना (जो 25 मार्च को घोषित की गई थी) में कई वर्गों को नजरअंदाज कर दिया गया है। और यह बड़ा कारण था, जिसने प्रवासी मजदूरों को शहर छोड़ कर अपने गांवों को लौटने को मजबूर किया। अफसोस, इनमें से कई विषाणु अपने साथ ले गए होंगे।

गरीब का हक पहले
राज्य सरकारों की ओर से उन्हें कुछ नगदी मुहैया कराए जाने के बावजूद ज्यादातर गरीबों के सामने आजीविका का कोई साधन नहीं है। हमें गरीबों के हाथ में फिर से पैसा देना होगा, उनके हाथों में नगदी देनी पड़ेगी। भारत में छब्बीस करोड़ परिवारों में से आधे यानी तेरह करोड़ परिवारों तक पहुंचने का लक्ष्य हो।

शहरी गरीबों के लिए तेल विपणन कंपनियों की उज्ज्वला सूची से शुरुआत की जाए। जनधन खातों (और पहले के बिना शर्त वाले खाते भी) को भी लिया जाए। जन आरोग्य-आयुष्मान भारत योजनाओं के तहत पंजीकृत लोगों को इसमें लिया जाए। आधार के जरिए दोहराव रोका जाए। राज्यों को उनकी बीपीएल सूची की जांच करने और उसे नए सिरे से तैयार करने के लिए अधिकृत किया जाए।
ग्रामीण गरीबों के लिए 2019 के मनरेगा भुगतान सूची से शुरुआत की जाए। जनधन खातों (और पहले के बिना शर्त वाले खाते भी) को शामिल किया जाए। उज्ज्वला सूचियों को भी इसमें लें। आधार के माध्यम से दोहराव खत्म किया जाए। राज्यों को उनकी बीपीएल सूची की जांच करने और उसे नए सिरे से तैयार करने के लिए अधिकृत किया जाए।

आदिवासी इलाकों में सभी परिवारों को शामिल किया जाए।
मेरा मानना है कि तेरह करोड़ परिवारों तक के लिए राज्यवार सूचियां और कुछ सौ हजार करोड़ देना या लेना संभव है। कुछ मामलों में लोग दोहरा फायदा उठा सकते हैं। लेकिन राष्ट्रीय आपातकाल में यह कोई मायने नहीं रखता। सूचना तकनीक की मदद से पांच दिन में सरकारें इस काम को कर सकती हैं। 14 अप्रैल को प्रधानमंत्री को टेलीविजन पर जाकर इस फैसले की घोषणा करनी चाहिए कि तीन दिन के भीतर हर चिह्निहत गरीब परिवार के खाते में पहली किस्त के रूप में पांच हजार रुपए डाल दिए जाएंगे। और यदि किसी लाभार्थी परिवार का बैंक खाता नहीं है, तो उसे यह पैसा उसके घर पर पहुंचाया जाएगा। इस पर अधिकतम लागत पैंसठ हजार करोड़ रुपए बैठेगी, जो कि पूरी तरह से पहुंच में, बिल्कुल व्यावहारिक, वित्तीय रूप से विवेकपूर्ण, आर्थिक रूप से न्यायोचित और सामाजिक रूप से जरूरी है।

इसलिए, अगर पूर्ण बंदी बढ़ाई भी जाती है तो मुश्किलों का सामना कर पाने में गरीब समर्थ हो सकेंगे।
ऊपर चार में से तीसरा और चौथा बिंदु छोड़ दिया गया है। अभी हमें पहले का काम पहले करना शुरू करना चाहिए। हमें अब यह घोषणा करनी चाहिए कि देश के संसाधनों पर पहला हक गरीबों का है।

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