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दूसरी नजर: संतुलन होगा, तभी लोकतंत्र बचेगा

हमारे प्रशासन की सबसे बड़ी नाकामी तो परियोजनाओं और कार्यक्रमों को लागू करने और वादों के अनुरूप लाभ पहुंचाने में रही है। बहुत ही कम देखने में आया है जब प्रशासन ऐसी किसी चुनौती (जैसे प्राकृतिक आपदा में राहत पहुंचाने) के लिए खड़ा हुआ हो। लेकिन लोग इससे पूरी तरह अंसतुष्ट रहे हैं।

Author December 30, 2018 3:34 AM
अदालती व्यवस्था ढह चुकी है, और इसमें संदेह है कि वक्त रहते इसे फिर से खड़ा किया जा सकता है। (Express photo: Ravi Kanojia)

लोकतंत्र का मतलब संतुलन ही है। जब यह संतुलन खतरे में पड़ जाता है, या प्रभावित होता है तो लोकतंत्र के अस्तित्व पर सवाल खड़ा हो जाता है। भारत के सामने तो यह सवाल कि क्या भारत में अब लोकतंत्र जीवित रह पाएगा, गहराता जा रहा है। मैं इस लेख में जिन मुद्दों की पड़ताल करूंगा उनमें से हर मुद्दा अपने में ऐसा नहीं भी लग सकता है जो लोकतंत्र के लिए खतरा हो सकता हो और ऐसा भी लग सकता है कि इन मुद्दों का समाधान होगा। हालांकि अगर समाधान नहीं निकला तो एक मुद्दा भी लोकतंत्र को पटरी से उतार सकता है। अगर इनमें से कई मामले अनसुलझे रह जाते हैं तो मुझे यह पक्का भरोसा है कि- जैसा कि स्वतंत्र, उदार और परिपक्व राष्ट्रों में माना जाता है- लोकतंत्र खत्म हो जाएगा।

चुनाव : तेलंगाना में चुनाव नतीजों की घोषणा के बाद राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (केंद्रीय निर्वाचन आयोग का प्रतिनिधि) ने मतदाता सूचियों से 22 लाख मतदाताओं के नाम हटा दिए जाने को लेकर ‘माफी’ मांगी (आधिकारिक दो करोड़ तिरासी लाख मतदाताओं का आठ फीसद)। बिना किसी झिझक के माफी मांग ली गई और मामला खत्म हो गया। एक सचेत लोकतंत्र में सभी पार्टियां एकजुट होतीं और लाखों लोगों के साथ इस घोटाले का विरोध करने के लिए सड़कों पर उतरतीं। मुख्य निर्वाचन अधिकारी को इस्तीफा देना पड़ता या उन्हें बर्खास्त कर दिया जाता। केंद्रीय निर्वाचन आयोग के जिन अधिकारियों ने तेलंगाना में मतदाता सूचियों के संशोधन के काम की निगरानी की, वे निलंबित कर दिए जाते। लेकिन इनमें से कुछ भी नहीं हुआ, न ही इसे लेकर किसी में गुस्सा दिखा। हालांकि लोग आहत हैं, फिर भी लोकतांत्रिक रूप से चुने गए मुख्यमंत्री के नेतृत्व में तेलंगाना में सब कुछ फिर से पटरी पर लौट चुका है।

विधायिकाएं : इस सारणी पर नजर डालें। इससे लैंगिक असमानता की स्थिति का पता चलता है, और लगता है कि लैंगिक-समानता वाला समाज बनाने को लेकर कोई भी गंभीर नहीं है।

इसके लिए दोषी सभी पार्टियां हैं। राजनीतिक दलों ने कम ही महिला उम्मीदवारों को मैदान में उतारा। पुरुष उम्मीदवारों को ‘जिताऊ’ होने के आधार पर तरजीह दी गई, या फिर उन्हीं सीटों पर महिला उम्मीदवारों को खड़ा किया जहां पार्टी के जीतने के आसार बहुत ही कम थे। कम महिला विधायक होने का मतलब है महिला मंत्री भी कम होना। मिजोरम में तो कोई महिला विधायक इसलिए भी नहीं है क्योंकि मिजो नेशनल फ्रंट ने एक भी महिला को टिकट नहीं दिया! इसका समाधान आसान है- महिलाओं के लिए विधायिका में कम से कम 33 फीसद आरक्षण हो। यह कोई क्रांतिकारी विचार इसलिए नहीं है, क्योंकि नगर निगमों और पंचायतों के चुनाव में इस तरह के आरक्षण का कानून पहले ही से मौजूद है।

अदालतें : अदालती व्यवस्था ढह चुकी है, और इसमें संदेह है कि वक्त रहते इसे फिर से खड़ा किया जा सकता है। समस्या सिर्फ खाली पड़े पदों की नहीं है, बल्कि इससे भी बड़ी है। इस चरमरा चुकी व्यवस्था के जो दूसरे पहलू हैं, उनमें पुराने ढर्रे वाली न्यायिक प्रक्रियाएं और कामकाज के तौर-तरीके, ढांचागत सुविधाओं की बेहद कमी, आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल नहीं होना, अयोग्य महिला व पुरुष वकीलों की भरमार, पेशे को बदनाम करने वालों को खदेड़ने में बार कौंसिल की उदासी और अक्षमता, और हर स्तर पर फैला भ्रष्टाचार। अगर कई मामलों में आज भी न्याय मिल रहा है, तो वह ईमानदार जजों की वजह से मिल पा रहा है। संकट इस बात का है कि ऐसे जज कम होते जा रहे हैं।

जनहित याचिकाएं : गरीब और दबे कुचले लोग जिनकी पहुंच उच्च न्यायपलिका तक नहीं है, उन तक न्याय पहुंचाने के लिए जनहित याचिका जैसा कारगर औजार अब ‘तय’ नतीजों वाले बदले के हथियार के रूप में तब्दील हो गया है। जनहित याचिकाएं दायर करने वाले कुछ याचिकाकर्ताओं का मकसद संदिग्ध है। जनहित याचिकाओं पर फैसला देते समय अदालतों ने सवालिया वैधता की आदर्श प्रक्रिया को अपना लिया है। इस प्रक्रिया में, उच्च अदालतें क्षेत्राधिकार में जकड़ चुकी हैं, कार्यपालिका की शक्तियों को हड़प लिया है और यहां तक कि विधायिकाओं और संसद के क्षेत्राधिकार का भी अतिक्रमण कर लिया है। इससे यह तो लग सकता है कि ‘न्याय हो चुका है’, लेकिन इससे कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया को गहरा आघात लगता है और साथ ही न्याय के स्थापित सिद्धांतों को भी। कुछ मामलों में स्पष्ट तौर पर गलत फैसले हुए हैं।

नौकरशाही : हमारे प्रशासन की सबसे बड़ी नाकामी तो परियोजनाओं और कार्यक्रमों को लागू करने और वादों के अनुरूप लाभ पहुंचाने में रही है। बहुत ही कम देखने में आया है जब प्रशासन ऐसी किसी चुनौती (जैसे प्राकृतिक आपदा में राहत पहुंचाने) के लिए खड़ा हुआ हो। लेकिन लोग इससे पूरी तरह अंसतुष्ट रहे हैं। अगर निर्वाचित राजनेता इसके लिए दोषी हैं तो सीधे तौर पर हमारी नौकरशाही इसकी जिम्मेदार है। नौकरशाह परियोजनाएं और कार्यक्रम तैयार करते हैं, इनमें लगने वाला वक्त और लागत तय करते हैं और इनके क्रियान्वयन के लिए वे सीधे तौर पर जिम्मेदार हैं। फिर भी कई कार्यक्रम तो पूरी तरह से चौपट हो गए और कइयों के नतीजे बहुत ही खराब रहे। हमारे देश में प्रतिभा भरी पड़ी है, लेकिन प्रतिभावान लोग निजी क्षेत्र में या फिर विदेशों में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। इस समस्या का हमारे पास कोई समाधान नहीं है और जैसे-जैसे साल गुजरते जा रहे हैं, यह समस्या और गंभीर होती जा रही है।

संस्थान और संगठन : पिछले चार साल में जिस तरह से कई संस्थाओं को चौपट कर दिया, वैसा पहले कभी नहीं हुआ। सीईसी, सीआइसी और आरबीआइ के पर कतर दिए गए, या फिर इन्हें झुक जाने को मजबूर कर दिया गया। सीबीआइ तो खत्म ही हो गई, सरकार का बदलाव कई और जांच एजंसियों के ढहने का कारण बनेगा।

कराधान : सामान्य तौर पर कर दरें संतुलित होनी चाहिए और कर प्रशासन को सेवा देना चाहिए। लेकिन ये नियम तो एकदम उलट गए हैं। कर दरें तो अब लूट-खसोट वाली और भेदभावपूर्ण (जैसे जीएसटी) हो गई हैं और कर प्रशासन कर आतंकवाद में तब्दील हो गया है।

प्रधानमंत्री : मौजूदा प्रधानमंत्री सरकार के प्रमुख नहीं हैं, बल्कि वे खुद ही सरकार हैं। बिना संवैधानिक संशोधन के संवैधानिक लोकतंत्र करीब-करीब राष्ट्रपति शासन प्रणाली में बदल चुका है। सारी जांच और निगरानियां खत्म कर दी गई हैं। ऐसा पंगु लोकतंत्र मर जाएगा। भारत में लोकतंत्र सिर्फ तभी बच पाएगा जब हम संतुलन बहाल करेंगे। मैं साल का अंत इस उम्मीद से खत्म करता हूं- अगर सर्दियां आती हैं तो वसंत कैसे दूर रह सकता है?

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