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चर्चा: डाटा के तूफान में हमारी निजता

फेसबुक डाटा चोरी की घटना ने सबकी नींद उड़ा दी है। इससे न केवल फेसबुक की विश्वसनीयता सवालों के घेरे में आ गई है, बल्कि डाटा पर निर्भर होती जा रही दुनिया भी सांसत में है। यह संकट सीधे-सीधे निजता के सवाल से जुड़ा है। हमारे बारे में जो जानकारी जिसके पास भी है, उसका इस्तेमाल कौन, कब, कहां कर रहा है, कोई नहीं जानता। फेसबुक विवाद से इस बात का खुलासा होता है कि अपने विस्तार के लिए बाजार और वोटों के लिए राजनीति के खिलाड़ी कैसे डाटा का इस्तेमाल कर सकते हैं। आप क्या सोचते हैं, राजनीति और उसे चलाने वालों के बारे में आपकी क्या धारणा है, आपकी पसंद और प्राथमिकताएं क्या हैं- सब तो डाटा के रूप में उन बड़े सर्वरों में बंद हैं, जो हमारी-आपकी पहुंच से बाहर हैं। ऐसे में सवाल है, क्या सोशल मीडिया के इस्तेमाल को निरापद बनाया जा सकता है? इसी पर केंद्रित है इस बार की चर्चा - संपादक

Author April 1, 2018 5:35 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर।

अभिषेक कुमार सिंह

दुनिया में एक ओर ‘डिलीट फेसबुक’ जैसे अभियानों ने जोर पकड़ लिया है, फेसबुक के संस्थापक मार्क जुकरबर्ग दुनिया भर में अखबारों में माफी के विज्ञापन छपवाते घूम रहे हैं, उनकी दशकों की कमाई एक झटके में स्वाहा होने के करीब पहुंच गई है, तो हमारे देश में यह सवाल जोर पकड़ चुका है कि आखिर हमारी ऐसी कौन-सी जानकारी इन चीजों के जरिए लीक हो गई, जो इतना बड़ा तूफान उठ खड़ा हुआ है। फेसबुक पर मुख्य आरोप अमेरिकी राष्ट्रपति के चुनाव में आम लोगों की मानसिक पड़ताल कर उनके दिलोदिमाग पर असर डालने वाले विज्ञापन तैयार करने में मदद मुहैया कराने का है। उसने (फेसबुक ने) अपने मंच पर मौजूद अमेरिकी नागरिकों का सारा डाटा ब्रिटेन की कैंब्रिज एनालिटिका नामक कंपनी को बेचा, जिसने उसकी पड़ताल से ट्रंप के चुनावी अभियान में मददगार कैंपेन तैयार की। इस प्रक्रिया में सिर्फ निजी जानकारियों से जुड़े डाटा (जैसे कि उम्र, निवास स्थान, दोस्तों की सूची, हर चीज की पसंद-नापसंद, राजनीतिक रुझान आदि) को लीक ही नहीं किया गया, बल्कि फेसबुक के माध्यम से कई अजीबोगरीब मनोवैज्ञानिक सर्वेक्षण करवाते हुए लोगों के मन को पढ़ने की कोशिश की गई। जैसे, पिछले जन्म में आप क्या थे या दाढ़ी-मूंछ लगाने से आप कैसे दिखेंगे। आमतौर पर ऐसे सर्वेक्षण और सामान्य निजी जानकारियों की लीकेज से लोगों को कोई ज्यादा चिंता तब तक नहीं होती, जब तक कि उनका कोई आपराधिक इस्तेमाल न किया गया हो। जैसे, बैंक खाते या क्रेडिट-डेबिट कार्ड से रकम उड़ाना या किसी व्यक्ति की बेहद निजी जानकारियों को पैसे, किसी शोषण या बदले की भावना से सार्वजनिक करना। इनके अलावा आमतौर पर सामान्य निजी सूचनाओं के दूसरों के हाथों में पड़ जाने से कोई भारी खतरा महसूस नहीं होता। लेकिन जब बात देश की सत्ता बदलने की हो और यह मालूम पड़े कि इन निजी सूचनाओं और अजीब मनोवैज्ञानिक सर्वेक्षणों के बल पर हमारा मन पढ़ लिया गया और हमारी मानसिक स्थिति पर असर डालने वाले विज्ञापन या अभियान चलाए गए, तो इस पर चौंकना लाजिमी है। इससे साबित होता है कि कैसे हमारी निजी जानकारियों का इस्तेमाल सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक स्थितियों को प्रभावकारी ढंग से बदलने में किया जा सकता है। सरकारें बनाने-बिगाड़ने जैसे महत्त्वपूर्ण काम में सोशल मीडिया के माध्यम से किस तरीके से धांधली हो सकती है, यह सोच कर दुनिया का हिल जाना स्वाभाविक है। अब तो यह भी दावा किया जा रहा है कि ब्रेग्जिट के मतदान में भी इसी तरह से लोगों को प्रभावित किया गया होगा।

जिस तरह से हमारा बहुत-सा कामकाज डिजिटल सुविधाओं के हवाले हो गया है, उसमें सेवा प्रदाता कंपनियों और उपयोगकर्ताओं की निजी जानकारियों के बीच कोई ज्यादा दूरी नहीं रह गई है। खासतौर से फेसबुक, गूगल, इंस्टाग्राम जैसी डिजिटल कंपनियां हमारे बारे में और हमारी प्रत्येक गतिविधि के बारे में शायद हमसे ज्यादा जानने लगी हैं। हम कितने बजे घर से दफ्तर आते-जाते हैं, किन जगहों पर खाते-पीते हैं, रास्ते में ट्रैफिक जाम है या नहीं, हमारे दोस्तों के जन्मदिन कब-कब हैं- सवाल है कि क्या इनके बारे में फेसबुक-गूगल को जानने की जरूरत है। कई बार हमें यह बहुत सुविधाजनक लगता है कि फेसबुक और गूगल को हमारे सारे परिचितों के जन्मदिन से लेकर सारे डिटेल मालूम हैं, क्योंकि याद नहीं आने पर हम उन जानकारियों को फेसबुक आदि से आसानी से हासिल कर लेते हैं। पर उसी वक्त ये डिजिटल प्रबंध हमें कुछ विज्ञापनों के जरिये यह भी बताते दिखते हैं कि हमें जन्मदिन के लिए किसके लिए क्या खरीदना चाहिए। अभी तो सवाल सिर्फ यह उठ रहा है कि फेसबुक ने क्यों आम लोगों की जानकारियां गैरकानूनी ढंग से हासिल कीं और उन्हें किसी और को बेच दीं। लेकिन जब सवाल हमारी निजता का उठेगा तो मामला और पेचीदा हो जाएगा, क्योंकि निजी सूचनाओं तक पहुंच के सारे अधिकार तो लोग पहले ही डिजिटल कंपनियों के हवाले कर चुके हैं। इंटरनेट के माध्यम से दिमाग पर नियंत्रण की शुरुआत शायद यहीं से होती है। यही वजह है कि आज से चार साल पहले यूरोप के डाटा संरक्षण कानून की धारा-17 की तरह 2014 में ब्रूसेल्स की एक अदालत ने व्यवस्था दी थी कि किसी भी व्यक्ति या संस्था को इंटरनेट पर प्रसारित अपनी जानकारियों, छवियों (डाटा और फोटो) पर नियंत्रण का पूरा अधिकार है। इस अधिकार के तहत किसी भी सर्च इंजन या डिजिटल कंपनी से ये चीजें हटाने के लिए कहा जा सकता है। असल में मामला व्यक्तियों और किसी भी संस्था की डिटिजल निशानियां हटाने से संबंधित है जो कई बार उनकी जानकारी में और कई बार बिना उनके संज्ञान में लाए इंटरनेट पर प्रसारित होती रहती हैं। इंटरनेट के सर्च इंजन से कुछ भी खोज लेने के इस युग में सूचनाओं और छवियों के बिना नियंत्रण के ऐसे प्रसार का सबसे ज्यादा नुकसान महिलाओं और बच्चों को हो रहा है। जहां कई महिलाएं इस बात से परेशान हैं कि उनका कोई बेहद निजी फोटो आखिर कैसे उनके पूरे नाम-पते के साथ इंटरनेट पर आ जाता है, वहीं बच्चों को इन वजहों से पोर्नोग्राफी के दलदल में घसीटने की कोशिशें होती हैं।

हालांकि वेब यानी इंटरनेट से लोगों व संस्थाओं की निजी सूचनाएं हटाने का हक देने संबंधी ऐसी व्यवस्थाओं का विरोध भी होता रहा है। कुछ लोग कहते हैं कि इससे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार का हनन होता है। साथ ही, वे सभी जानकारियां जो आम लोगों तक पहुंचनी चाहिए, उन्हें सरकार द्वारा रोक लिए जाने का अंदेशा पैदा होता है। ऐसे मामलों की पेचीदगी यह है कि ऐसी सूचनाओं और तस्वीरों के प्रकाशन से अगर माना जाए कि कानून टूट रहे हैं, तो यह तय नहीं हो पाता है कि आखिर इसके लिए कौन जिम्मेदार है। वह व्यक्ति जिसने ऐसे फोटो या सूचनाएं वेबसाइट पर डालीं या फिर वे डिजिटल कंपनियां, जो उनके जरिये पैसा बनाने के लिए तमाम तरह के खेल कर रही हैं। कई बार ऐसी घटनाओं और लोगों का पता लगाना और उन्हें दंडित करना काफी जटिल होता है। यदि मामला दूसरे देशों के इंटरनेट प्रयोगकर्ताओं से जुड़ा हो, तो यह काम और भी मुश्किल हो जाता है।

कुछ देशों में वेबसाइट के मालिकों और होस्ट करने वाली कंपनियों को कानूनी संरक्षण भी मिला हुआ है। जैसे अमेरिकी कानून- कम्युनिकेशंस डिसेंसी एक्ट की धारा एस-230- के तहत वेबसाइट संचालक और होस्ट करने वाली कंपनी को किसी अनजान इंटरनेट प्रयोगकर्ता द्वारा डाली गई सूचनाओं-तस्वीरों के मामलों में पर्याप्त संरक्षण दिया गया है, यानी इसके लिए गूगल जैसे सर्च इंजन दोषी नहीं माने जाते। यही वजह है कि फेसबुक या यूट्यूब अपनी वेबसाइटों पर पोस्ट की जाने वाली सामग्री की जिम्मेदारी से बाहर रहते हैं। इसलिए निजी तस्वीरों के पोर्न वेबसाइटों पर प्रकाशन की स्थिति में वहां लोगों को यह साबित करना पड़ता है कि मामला या तो चाइल्ड पोर्नोग्राफी के तहत आता है या फिर वह प्राइवेसी एक्ट यानी निजता के कानून के उल्लंघन का मामला है। असल में, अब इसकी जरूरत उठ खड़ी हुई है कि सरकारें यह तय करें कि खासतौर से इंटरनेट के मामले में कहां और कैसी निजता की जरूरत बनती है। आम नागरिकों के संदर्भ में अब यह बताना जरूरी हो गया है कि निजता का हमारे लिए आखिर क्या मतलब है।

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