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वक्त की नब्ज: मसीहा बनाम राजनेता

मसीहाओं की जवाबदेही नहीं होती, न कभी उन्हें अपनी गलतियां स्वीकार करनी पड़ती है। सो, आज तक मोदी ने कभी स्वीकार नहीं किया कि नोटबंदी से देश को लाभ नहीं हुआ। जिस काले धन की खोज में उन्होंने यह कदम उठाया, वह वापस आया नहीं, लेकिन छोटे कारोबारियों और किसानों का इतना नुकसान हुआ कि कई छोटे उद्योग बंद हो गए।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी। (पीटीआई फाइल फोटो)

राफेल सौदे पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला चुनावों के नतीजों के बाद न आया होता तो नरेंद्र मोदी के लिए गुजरा सप्ताह उनके राजनीतिक जीवन में सबसे बुरा होता। हारी हुई बाजी में थोड़ी-सी महक जीत की डाल दी सर्वोच्च न्यायालय ने, यह कह कर कि इस सौदे में कोई घोटाला नहीं नजर आता है। फिर भी प्रधानमंत्री के लिए समय आ गया है तय करने का कि वे मसीहा समझते हैं अपने आपको या राजनेता। राजनीति में मसीहाओं की कोई जगह न है, न होनी चाहिए। राजनीति में मसीहाओं के लिए कोई जगह नहीं है, लेकिन नरेंद्र मोदी ने अपने कार्यकाल में कई फैसले लिए हैं जो सिर्फ मसीहे ले सकते हैं। मिसाल के तौर पर नोटबंदी। इस फैसले को अगर उन्होंने राजनेता की हैसियत से लिया होता तो पहले सलाह लेते अर्थशास्त्रियों से, अपने अफसरों से, मंत्रियों से। ऐसा मोदी ने नहीं किया। किसी की सलाह लिए बगैर इस फैसले को लिया और अपने मंत्रियों को तब तक ‘नजरबंद’ रखा जब तक टीवी पर ऐलान करने नहीं आए। ऐसा सिर्फ मसीहे कर सकते हैं, क्योंकि वे जानते हैं कि मसीहा की जवाबदेही नहीं होती, न कभी उन्हें अपनी गलतियां स्वीकार करनी पड़ती है। सो, आज तक मोदी ने कभी स्वीकार नहीं किया कि नोटबंदी से देश को लाभ नहीं हुआ। जिस काले धन की खोज में उन्होंने यह कदम उठाया, वह वापस आया नहीं, लेकिन छोटे कारोबारियों और किसानों को इतना नुकसान हुआ कि कई छोटे उद्योग बंद हो गए

मसीहे के अंदाज में मोदी ने जीएसटी लागू की नोटबंदी के कुछ ही महीनों बाद। नए कर का स्वागत कोई नहीं करता है, लेकिन मोदी ने इस नए कर का जश्न मनाया संसद में, जैसे कि बहुत कमाल की चीज कर रहे हों। खयाल अच्छा बेशक है पूरे देश के लिए एक कर लागू करने का। लेकिन अपना जीएसटी इतना पेचीदा है कि छोटे कारोबारी अभी तक समझ नहीं पाए हैं कि किस चीज पर कितना कर लगाना चाहिए। मेरी जानकारी में कुछ छोटे कारोबारी हैं, जिनका कहना है कि हर महीने उन्हें एक सप्ताह सिर्फ जीएसटी भरने के लिए निकालना पड़ता है। लेकिन प्रधानमंत्री ने कभी स्वीकार नहीं किया है कि शायद उनकी सरकार ने जीएसटी लागू करने में जरूरत से ज्यादा जल्दबाजी की। क्या मोदी की मसीहाई ही कारण है कि मोदी की लहर अब नहीं रही? पिछले हफ्ते जो चुनावों के परिणाम आए हैं मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ से, उन्होंने इस बात को स्पष्ट कर दिया। बल्कि इस देश के मतदाता इतने तंग आ गए हैं कि उस कांग्रेस को वोट देने को तैयार थे, जिसके कुशासन से निराश होकर ‘परिवर्तन’ और ‘विकास’ के नाम पर मोदी को वोट दिया था 2014 में। मोदी मसीहा का चोला नहीं पहने होते तो उन्हें बहुत पहले मालूम पड़ गया होता कि उनकी नीतियों से जनता तंग है।

चुनावों से पहले मैंने राजस्थान और मध्यप्रदेश के दौरे किए थे। जहां गई मुझे नौजवान मिले, जिनकी एक ही मांग थी- रोजगार। यह मांग उनकी भी थी, जिन्हें लाभार्थी मानते हैं प्रधानमंत्री, क्योंकि उन्हें पहली बार घरेलू गैस मिली है, पहली बार मकान और शौचालय बनाने के लिए पैसे मिले हैं और पहली बार अपने गांवों में सड़क और बिजली मिली है। इन लाभार्थियों की भी सबसे बड़ी मांग है रोजगार। लेकिन चुनाव अभियान के दौरान भारतीय जनता पार्टी के किसी एक भी प्रचारक ने रोजगार की बात नहीं छेड़ी। प्रधानमंत्री ने लड़ाई ‘नामदार’ और ‘कामदार’ के बीच कर दी तो राष्ट्रीय अध्यक्ष ने ‘राहुल बाबा’ का मजाक उड़ाना अपने भाषणों का अहम हिस्सा बनाया। रही योगी आदित्यनाथ की बात, तो उनका मुद्दा एक ही था- राम मंदिर।

सो, जब परिणाम आए, मुझे कोई आश्चर्य नहीं हुआ कि मतदाताओं ने कामदारों को ठुकरा कर उस नामदार की पार्टी को वोट दिया, जिसका इतना मजाक उड़ाया था भारतीय जनता पार्टी के आला नेताओं ने। राहुल गांधी अगर आज नरेंद्र मोदी को चुनौती देने के लायक बन गए हैं तो कसूर मोदी का है। ‘कांग्रेस-मुक्त भारत’ का नारा वैसे भी गलत था, लेकिन और भी गलत लगने लगा, जब लोगों को दिखा कि कामदारों ने उनके लिए वह काम करके नहीं दिखाया, जिसकी उम्मीद थी।कई राजनीतिक पंडित अब कहने लगे हैं कि मोदी का जादू अब इतना कम रहा है कि 2019 में पूर्ण बहुमत तो दूर की बात, शायद जीत ही नहीं पाएंगे दोबारा। मेरा अपना मानना है कि आज भी देश भर में लोग मोदी को एक ईमानदार और अच्छा इंसान मानते हैं और उनको दोबारा प्रधानमंत्री बनते देखना चाहते हैं। लेकिन राजनेता चाहते हैं, मसीहा नहीं। इसलिए कि राजनेताओं की जवाबदेही होती है और मसीहा की नहीं।

अपने कार्यकाल में मोदी ने एक बार भी प्रेस कॉन्फ्रेंस बुला कर पत्रकारों के सवालों के जवाब नहीं दिए हैं। नुकसान उनका हुआ है, मीडिया का नहीं। जब मसीहा से फिर राजनेता बन जाएंगे तो उन्हें आसानी से समझ में आएगी यह बात। तभी शायद समझ सकेंगे किसानों और बेरोजगार युवाओं का दर्द और तभी शायद उन्हें अपनी गलतियों का भी अहसास होने लगेगा। मसीहा से राजनेता बनेंगे तो यह भी दिखने लगेगा कि जिस परिवर्तन और विकास का वादा करके वे जीते थे 2014 में वह अभी तक आया नहीं है। उनके कार्यकाल में कई अच्छे काम हुए हैं, लेकिन जनता अपने जीवन में जो परिवर्तन देखना चाहती थी, अभी तक नहीं आया। वही पुलिस का शोषण सहना पड़ता है, वही प्रशासनिक लापरवाही है और वही निराशा का माहौल बनने लगा है जो 2014 में था और जिसके होने से परिवर्तन की आस जगी थी देश भर में।

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