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वक्त की नजर: सच का सामना करें

आपकी चुप्पी का फायदा उठा कर विपक्षी दल खूब प्रचार कर रहे हैं कि आपने अपना एक भी वादा पूरा नहीं किया है। न अच्छे दिन लाने में सफल रहे हैं और न ही आपने सबका साथ, सबका विकास वाला वादा पूरा किया है। सो, अगर आप इन बातों का खंडन करना चाहते हैं तो मीडिया को हथियार बना सकते हैं इस काम के लिए।

Author February 18, 2018 10:17 am
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी। (PTI/File)

नरेंद्र मोदी को पत्रकार अच्छे नहीं लगते। अभी तक भूले नहीं हैं कि 2002 के दंगों के बाद उनके साथ मीडिया वालों ने कितना अन्याय किया। भूले नहीं हैं कि उस वर्ष हुए दंगों को इस तरह पेश किया था मेरे पत्रकार बंधुओं ने जैसे कि 1947 के बाद पहली बार ऐसी हिंसा हुई है। सरासर झूठ था यह, लेकिन चूंकि यह पहला दंगा था, जो आम लोगों को टीवी पर देखने को मिला, यकीन करना उनके लिए आसान था कि नरेंद्र मोदी ने वास्तव में ऐसा कुछ किया है, जो किसी दूसरे मुख्यमंत्री ने नहीं किया। देश में नुकसान हुआ ही मोदी की छवि को, लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इससे भी ज्यादा, सो जिन देशों ने राजीव गांधी को सिखों के कत्लेआम के बाद भी वीजा दिया, मोदी को देने से इंकार किया इस आधार पर कि उन्होंने बतौर मुख्यमंत्री मुसलमानों को सुनियोजित ढंग से मरवाया।

मेरे पत्रकार बंधुओं ने एक अन्याय और भी किया मोदी के साथ और वह यह कि बिना सबूत के तय किया उन्होंने कि दंगों को मोदी सरकार ने जानबूझ कर करवाया हिंदू वोट हासिल करने के मकसद से। अदालतों और जांच समितियों ने मोदी को निर्दोष पाया, लेकिन इसके बावजूद भारतीय मीडिया में मोदी को हमने दोषी साबित करने की कोशिश जारी रखी। आज भी दिल्ली शहर में मुट्ठी भर ही होंगे पत्रकार, जो मोदी को खलनायक नहीं समझते हैं। लेकिन प्रिय प्रधानमंत्री अब वक्त आ गया है कि आप नए सिरे से हम पत्रकारों के साथ रिश्ता जोड़ें, क्योंकि इसमें आपका फायदा है। नीरव मोदी वाला मुद्दा बहुत बड़ा मुद्दा बन चुका है और इस पर आपकी चुप्पी आपको नुकसान पहुंचाएगी। सो, जितना समय आपने पिछले हफ्ते बच्चों को दिया, उसका आधा हिस्सा भी आप एक प्रेस कॉन्फ्रेंस को देंगे, तो मेरी राय में आपका भला होगा। आप कहते तो हैं कि लोकतंत्र में आपको पूरा विश्वास है, लेकिन भूल जाते हैं शायद कि लोकतंत्र का एक अहम खंभा मीडिया है।

डोनल्ड ट्रंप भी मीडिया से नफरत करते हैं और उन टीवी चैनलों और अखबारों को ‘फेक न्यूज’ कहते हैं, जो उनका विरोध करते हैं, लेकिन ट्रंप ने अपने कार्यकाल के पहले वर्ष में कई पत्रकार वार्ताओं में भाग लिया है और कई इंटरव्यू दिए हैं। ऐसा करना जरूरी है लोकतांत्रिक देशों में। जो राजनेता पत्रकारों को अपने से दूर रखते हैं वे धीरे-धीरे उन लोगों से भी दूर होने लगते हैं, जिनके वोट उनके लिए जरूरी हैं। मोदी समझते हैं अगर कि मन की बात से जनता से उनका संपर्क कायम रह सकता है, तो गलत समझते हैं। हमारे गरीब, अनपढ़ लोग भी आज लोकतांत्रिक तरीकों को सीख गए हैं और जब नीरव मोदी जैसा अमीर, संपन्न कारोबारी ग्यारह हजार करोड़ रुपए सरकारी बैंकों से लेकर भाग जाता है, वे चाहते हैं कि देश के प्रधान सेवक उनको समझाएं कि यह कैसे हुआ जब गरीब किसान आत्महत्या करने पर मजबूर हैं कर्जों के बोझ तले। यह काम न कोई मंत्री कर सकता है और न ही कोई सरकारी प्रवक्ता, इसको सिर्फ प्रधानमंत्री कर सकते हैं। सो, अगर इस बार भी फैसला लेते हैं चुप्पी साधे रखने की तो इससे नुकसान स्वयं मोदी का ही होगा।

सच पूछिए तो समझना मुश्किल होता जा रहा है कि मोदी क्यों पत्रकारों से इतनी दूर रहना चाहते हैं। पिछले हफ्ते बच्चों से बात करते समय उन्होंने साबित किया कि वह किसी भी सवाल का जवाब दे सकते हैं आराम से। यहां तक कि जब किसी चतुर बच्चे ने उनसे पूछा कि 2019 में उनकी बोर्ड परीक्षा के साथ उनकी अपनी परीक्षा भी होने वाली है, सो क्या उससे वह थोड़े से ‘नर्वस’ नहीं हैं? तो मोदी ने हंस कर कहा, ‘मैं आपका अध्यापक होता तो आपको जर्नलिज्म में जाने के लिए गाइड करता, क्योंकि इतना लपेट कर सवाल सिर्फ जर्नलिस्ट पूछ सकते हैं।’ बेशक प्रधानमंत्रीजी! बेशक। लेकिन हमारे सवाल आपको तैयार कर सकते हैं उन और भी ज्यादा महत्त्वपूर्ण सवालों के लिए, जो जनता आपसे पूछने वाली है अगले आम चुनावों में। ऊपर से आपको लाभ यह भी होगा हमसे मिल कर कि आपको हम बता सकेंगे कि असली दुनिया में क्या कहा जा रहा है आपकी सरकार के बारे में, आपके बारे में। चलिए एक छोटी-सी झलक आपको मैं खुद दिए देती हूं। दिल्ली में पिछले दिनों माहौल इतना बदल गया है कि जहां जाती हूं अब मुझे मिलते हैं राजनीतिक पंडित और राजनीतिज्ञ, जो अभी से आपको हरा चुके हैं। सो, बातें हो रही हैं कि अगले चुनाव के बाद क्या होने वाला है। कहते हैं कि अगर भारतीय जनता पार्टी की दो सौ बीस के करीब सीटें आती हैं, तो आपको हटा कर आपकी पार्टी के लोग किसी और को प्रधानमंत्री बना देंगे। और सीटें अगर दो सौ से कम आती हैं, तो देश में एक बार फिर खिचड़ी सरकार बनेगी और प्रधानमंत्री कोई भी हो सकता है। ऐसी बातें होना शुरू हो गई हैं, इसलिए कि आपकी चुप्पी का फायदा उठा कर विपक्षी दल खूब प्रचार कर रहे हैं कि आपने अपना एक भी वादा पूरा नहीं किया है। न अच्छे दिन लाने में सफल रहे हैं और न ही आपने सबका साथ, सबका विकास वाला वादा पूरा किया है। सो, अगर आप इन बातों का खंडन करना चाहते हैं तो मीडिया को हथियार बना सकते हैं इस काम के लिए। माना कि कुछ टीवी चैनल और कुछ अखबार आपकी चमचागिरी कर रहे हैं दब कर, लेकिन सब जानते हैं कि क्या हो रहा है और सब यह भी जानते हैं कि इन चमचों की झूठी प्रशंसा से आपको नुकसान ज्यादा और फायदा कम हुआ है। सो, हमारे लिए न सही अपने लिए ही आप पत्रकारों से नए सिरे से रिश्ता जोड़ें।

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