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तीरंदाज: मुक्त इच्छा से मुक्ति

निजी जीवन हो, धर्म हो, व्यवसाय हो या फिर लोकतंत्र, मुक्त-इच्छा के त्याग में मोक्ष प्राप्ति निहित नहीं हो सकती है, क्योंकि भक्ति अपने में एक जटिल बंधन है। इसके विपरीत स्वयं की मुक्त-इच्छा को पोषित करके और बहुत सारे मार्ग होते हुए भी अपना नया मार्ग बनाने की चेष्टा से हर प्रकार का मोक्ष संभव हो सकता है।

बुद्ध का जन्म लुंबिनी में हुआ था। उन्हें गया में ज्ञान मिला। सारनाथ में उन्होंने पहला धर्म उपदेश दिया और कुशीनगर में उन्हें निर्वाण प्राप्त हुआ।

गौतम बुद्ध ने जब अपना उपदेश समाप्त किया तब रात ढल चुकी थी। वे शांत मुद्रा में कुछ देर बैठे रहे। उनका उपदेश सुन कर जन समुदाय में से बहुत सारे लोग आगे आए और उन्होंने बौद्ध भिक्षुक बनने की इच्छा प्रकट की। बुद्ध ने उनसे कहा, ‘आपने उपदेश भलीभांति सुन लिए हैं और अब उनको स्वीकार कर आप उस राह पर चलेंगे, जिससे आपके दुख समाप्त होंगे और आपको मोक्ष की प्राप्ति होगी।’ गौतम बुद्ध के उपदेश से गोविंदा भी प्रभावित हो चुका था। वह भी उठ खड़ा हुआ और उसने अपनी प्रार्थना समाने रख दी, ‘हे महाप्रभु, मैं आपकी शरण में आना चाहता हूं। मुझे दीक्षा देकर भिक्षुक बनने की राह पर अग्रसर करें।’ बुद्ध शांत मुद्रा में बैठे रहे। उनके चेहरे पर असीम तेज चमक रहा था। शयन के लिए जाते हुए गोविंदा को पूछे बिना नहीं रहा गया। उसने अपने मित्र और गुरु-भाई सिद्धार्थ से कहा, ‘सिद्धार्थ, हम दोनों ने गौतम बुद्ध का उपदेश एक साथ सुना और उसे सुनने के बाद मुझे विश्वास हो गया कि सत्य मार्ग की मेरी तलाश यहीं समाप्त होती है। उनके वचन अंतिम सत्य हैं और उनका अनुकरण करके मोक्ष प्राप्त किया जा सकता है। ‘हम दोनों ने ज्ञान से मोक्ष प्राप्ति की यात्रा एक साथ शुरू की थी। हम सिद्ध पुरुषों, संतों और उनके आश्रमों में इसकी निरंतर खोज करते रहे हैं। अब तक हम लोग जहां भी गए, हमें वह सत्य प्राप्त नहीं हुआ, जिसकी हमको तृष्णा थी। पर आज बुद्ध के उपदेश ने हमें सच्चे मार्ग से परिचित करा दिया है।’ सिद्धार्थ ने सिर हिला कर गोविंदा से सहमति जताई। गोविंदा ने अपना प्रश्न पूछा, ‘मैं बुद्ध से दीक्षा लेने के लिए तैयार हो गया, पर तुम आगे नहीं बढ़े? तुम क्यों रुक गए? क्या बुद्ध ने जो मोक्ष का रास्ता बताया है उससे बेहतर विकल्प तुम्हारे पास है? क्या तुम मेरे साथ मोक्ष के इस सत्य मार्ग पर चलना नहीं चाहते हो?’ सिद्धार्थ प्रश्न सुन कर कुछ देर मौन रहा और फिर उसने धीरे-धीरे बोलना शुरू किया, ‘मेरे मित्र गोविंदा, तुमने अपनी राह चुन ली है और उस पर अपना पहला कदम बढ़ा भी दिया है। गुजरे काल में मैंने कितनी बार यह सोचा है कि मित्र गोविंदा हमेशा मुझसे एक पग पीछे ही चलता है और मैं जिस दिशा में मुड़ता हूं वह भी चुपचाप उसी दिशा की ओर प्रेरित हो जाता है। अब तक तुम मेरी छाया थे, पर आज यह छाया मुझसे प्राकृतिक रूप से अलग हो गई है। गौतम बुद्ध के उपदेश सुन कर तुमने स्वयं अपनी सत्य मार्ग की खोज को विराम दे दिया है और मोक्ष मार्ग के भिक्षु बन गए हो। मैं तुम्हें साधुवाद देता हूं कि तुमने पहली बार निर्णय स्वयं लिया है। मेरी कामना है कि तुम अपने प्रयास में सफल हो।’

सिद्धार्थ ने अपनी बात समाप्त भी नहीं की थी कि गोविंदा समझ गया कि उसका मित्र उसे त्याग रहा है। वह विचलित हो उठा। ‘गोविंदा, तुम अब दुख नहीं कर सकते, क्योंकि तुम अब बौद्ध भिक्षु हो गए हो।’ सिद्धार्थ ने कहा, ‘भिक्षु होने के नाते तुमने अपना घर-परिवार, धरोहर और सभी प्रकार की भौतिक वस्तुएं और भाव त्याग दिए हैं। ‘अब तुम मुक्त-इच्छा का प्रयोग भी नहीं कर सकते हो, क्योंकि उपदेश ग्रहण करने के बाद तुमसे महाबोधि की यही अपेक्षा है। तुम स्वयं भी संभवत: अपनी मुक्त-इच्छा (फ्री विल) को अपने पास सुरक्षित नहीं रखना चाहते थे और इसलिए तुम अनुयायी बन गए। कल सुबह, मित्र गोविंदा, मैं तुमसे विदा लूंगा।’ सिद्धार्थ भोर होते ही निकल पड़ा। वह जैता वन में कुछ दूर ही गया था कि उसको गौतम बुद्ध अपनी तरफ आते हुए दिखाई दिए। सिद्धार्थ ने उन्हें श्रद्धा से प्रणाम किया और उनकी प्रेम मुद्रा को देख कर साहस जुटा कर कहा, ‘महाप्रभु, बीती संध्या आपका उपदेश सुन कर मैं धन्य हो गया। बहुत दूर से हम दो मित्र आपका उपदेश सुनने आए थे। उपदेश सुनने के बाद मेरा मित्र आपके बताए मार्ग पर चलने के लिए तत्पर है, पर मेरी यात्रा अभी समाप्त नहीं हुई है, वह जारी रहेगी।’ बुद्ध सिद्धार्थ को धैर्य से सुन रहे थे। उसने फिर साहस किया, ‘महामान्य, महाबोधि, आपके उपदेश में कोई त्रुटि नहीं है। मुझे संदेह नहीं है कि आपका बताया हुआ मार्ग ही मोक्ष प्राप्ति के लिए सर्वश्रेष्ठ मार्ग है, पर यह आपका मार्ग है, जिसे आपने अपने स्वयं यत्न- अनुभूति, ध्यान, समाधि, प्रबोधन- से प्राप्त किया है। आप महाबोधि हैं, क्योंकि आपका ज्ञान स्वयं बोध से उत्पन्न हुआ है। यह आपको किसी शिक्षा या उपदेश से प्राप्त नहीं हुआ है और न ही किसी की भक्ति करके या बताए हुए मार्ग पर चल कर हुआ है।

‘महामान्य, आपका मार्ग श्रेष्ठ है, पर मैं उस पर नहीं चल सकता हूं। मैं अपनी मुक्त-इच्छा नहीं त्याग सकता हूं। आपके अनुयायी आपके बताए मार्ग पर चल कर मोक्ष प्राप्त करना चाहते हैं और मैं उनके निर्णय को रोक नहीं सकता हूं… मैं उनके निर्णय के दोष या गुण नहीं बता सकता हूं। मैं तो केवल अपनी बात कर सकता हूं और मेरी बात सिर्फ इतनी है कि मैं स्वयं को आपके उपदेशों से, संघ के नियमों से, भक्त समुदाय के भाईचारे से प्रतिस्थापित नहीं कर सकता हूं। ‘मैं आपकी तरह, अपने स्वयं की रक्षा करते हुए अपना निज सत्य नित्य खोजना चाहता हूं। गोविंदा ने आपका दिया हुआ सत्य भक्त रूप में स्वीकार कर लिया है, पर मेरी निजता का विलय धर्म या संघ में नहीं हो सकता है। गोविंदा आपके साथ चला गया है और मैं अकेला पड़ गया हूं। पर इससे कोई अंतर नहीं पड़ता है- आप भी तो मुक्त-इच्छा से युगों के संगठित शिक्षा-उपदेशों को त्याग कर अपनी यात्रा पर अकेले ही निकले थे।’ सिद्धार्थ ने बुद्ध के आगे शीश नवा दिया। बुद्ध का हाथ ज्ञान मुद्रा में उठ गया। यह अंश हर्मन हेस की किताब ‘सिद्धार्थ’ पर आधारित है। ‘सिद्धार्थ’ के लिए हेस को 1942 में नोबेल पुरस्कार मिला था। वास्तव में, निजी जीवन हो, धर्म हो, व्यवसाय हो या फिर लोकतंत्र, मुक्त-इच्छा के त्याग में मोक्ष प्राप्ति निहित नहीं हो सकती है, क्योंकि भक्ति अपने में एक जटिल बंधन है। इसके विपरीत स्वयं की मुक्त-इच्छा को पोषित करके और बहुत सारे मार्ग होते हुए भी अपना नया मार्ग बनाने की चेष्टा से हर प्रकार का मोक्ष संभव हो सकता है। सिद्धार्थ से बुद्ध बनने का यह एकमात्र रास्ता है।

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