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प्रसंगवश: नकल का बाजार

अब निजी विद्यालय ऐसे वैश्विक बाजार का हिस्सा हैं, जहां शिक्षा एक बिकाऊ माल की तरह है। शिक्षा के इस निजी बाजार में विद्याार्थी हर किस्म का उपभोक्ता है और शिक्षक महज एक सेवा प्रदाता। निजी क्षेत्र के ये विद्यालय अब कोचिंग इस्टीट्यूट के साथ जुड़ कर विद्यार्थियों को आठवीं कक्षा से ही इंजीनियर और डॉक्टर बनने का सपना बेचने लगे हैं।

Author April 29, 2018 5:15 AM
प्रतीकात्म तस्वीर।

ज्योति सिडाना

शिक्षा के बाजारवाद के घातक परिणाम अब सामने आने लगे हैं। वैश्वीकरण के बाद अब शिक्षा व्यापार, उद्योग और बाजार के मिश्रित रूप में देखी जा सकती है। भारत में विद्यार्थियों की एक बड़ी संख्या निजी शैक्षणिक संस्थानों में पढ़ती है। इनमें से बहुत सारे विद्यार्थी निम्न वर्ग से भी आते हैं, जो मध्यवर्ग से प्रभावित होकर अपने बच्चों का भविष्य तलाशता है, जिसकी रूपरेखा बाजार ने निर्मित की है। निजी विद्यालयों के आकर्षक परिसर, आधुनिकतम सुविधाएं, विज्ञापनों में अपने को सर्वश्रेष्ठ स्थापित करने की कोशिश और वैश्विक स्तर की शिक्षा का वादा कुछ ऐसे तत्त्व हैं, जो अभिभावकों और विद्यार्थियों को आकर्षित करते हैं। देश के अनेक निजी विश्वविद्यालय पैसा लेकर जिस तरह ‘डिग्री प्रोवाइडर’ की भूमिका निभा रहे हैं, उससे शिक्षा के निजीकरण का यथार्थ समझ में आ जाना चाहिए। ये डिग्रियां हासिल कर अनेक विद्यार्थी विभिन्न संगठनों में बड़े पदों पर बैठे हैं। अधिकतर राज्यों में ऐसे अनेक विश्वविद्यालय हैं, जिन्हें विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) हर बार फर्जी विश्वविद्यालय करार देता है, पर वे कहीं न कहीं अपनी सक्रियता दिखाते रहते हैं। इस फर्जीवाड़े ने अनेक राजनेताओं और अन्य लोगों को लाभ पहुंचाया है। फर्जी डिग्री द्वारा अपने को शिक्षित साबित करने का यह सिलसिला इस तथ्य को दर्शाता है कि डिग्री एक उपभोक्ता वस्तु है, जिसे बाजार में खरीदा जा सकता है और इसे उत्पादित करने वाली संस्थाओं में अनेक महत्त्वपूर्ण लोगों द्वारा निवेश किया जा चुका है।

यह स्थिति हमें एक अन्य तथ्य के विश्लेषण के लिए भी बाध्य करती है। ऐसे अनेक महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों की चर्चा की जा सकती है, जहां नकल एक उद्योग है। किसी प्रांत में यह नकल सार्वजनिक विमर्श का केंद्र बन जाती है, जबकि कुछ प्रांतों में यह बड़े पैमाने पर, लेकिन छिपे रूप में होती है। जबसे पंचायत और नगर निकाय यानी स्थानीय शासन प्रणाली में शैक्षणिक योग्यता तय कर दी गई है, प्रमाणपत्र प्राप्त करने का प्रयास एक बड़े व्यवसाय का रूप ले चुका है। पांचवीं और आठवीं कक्षाओं के प्रमाणपत्र बाजार में उपलब्ध हैं, जो नगर शासन में लोगों का प्रतिनिधि बनाने का रास्ता प्रदान कर देते हैं। परीक्षा से पूर्व प्रश्नपत्र का आउट हो जाना, प्रश्नपत्र तैयार करने वाले शिक्षकों पर दबाव डाल कर महत्त्वपूर्ण प्रश्नों के नाम पर प्रश्नपत्रों का परिचय प्राप्त कर लेना, परीक्षा पुस्तिकाओं का मूल्यांकन करने वाले परीक्षकों तक पहुंचने की कोशिश और उन पर अनेक दबाव डलवा या डाल कर उत्तीर्ण होने का प्रयास, अनेक विश्वविद्यालयों में प्री-पीएचडी पाठ्यक्रमों का कागजों में संचालित होना, पीएचडी की उपाधि में विभिन्न पुस्तकों और शोध ग्रंथों से विषय-वस्तु चुरा कर उपाधि प्राप्त करने की कोशिश वे पक्ष हैं, जो फर्जी डिग्री को कई भागों में बांट देते हैं, जिसमें पैसा देकर प्राप्त की गई फर्जी डिग्री और नकल करके प्राप्त की गई डिग्री प्रमुख हैं। इस पूरे संचालन में राजनेता-प्रशासक-शिक्षक-विद्यार्थी और निजी शैक्षणिक संस्थानों को संचालित करने वाले व्यवसायियों/ उद्योगपतियों का गठबंधन सक्रिय है। सवाल है कि शिक्षा को परीक्षा के साथ जोड़ना और डिप्लोमा, प्रमाणपत्र और डिग्री को नौकरी तथा अपनी उपलब्धियों को अभिव्यक्त करने का मापक बना लेना वे पक्ष हैं, जो भारतीय शिक्षा प्रणाली की विसंगतियों को दर्शाते हैं। नकल और फर्जीवाड़े का यह बाजार किस तरह की युवा शक्ति को विकसित कर रहा है, यह किसी से छिपा नहीं है।

हाल में अनेक प्रतियोगी परीक्षाओं के प्रश्नपत्रों का आउट होना, राज्य लोक सेवा आयोग के प्रश्नपत्रों का बाहर आना, माध्यमिक परीक्षा में एक ही विद्यालय के सत्रह बच्चों का मेरिट में आना, ऐसे उदाहरण हैं, जो दर्शाते हैं कि शिक्षा रूपी कुएं में इतनी भांग मिला दी गई है कि उसमें से जो भी निकल कर बाहर आ रहा है उसे लोग नशेड़ी के रूप में देखने लगे हैं। संदेह का यह विस्तार देश के विकास के लिए चुनौती है, क्योंकि इन सबमें अधिकतर वे लोग सम्मिलित हैं, जिन्हें हम जनसांख्यिकीय लाभ यानी ‘डेमोग्राफिक डेविडेंड’ के रूप में प्रस्तुत करते हुए खुद को गौरवान्वित महसूस करते हैं। जबकि यह भी एक तथ्य है कि इन सब घटनाओं से विद्यार्थियों में असंतोष पैदा हो रहा है और वह ‘डेविएटेड डिविडेंड’ में परिवर्तित हो रहा है। अब निजी विद्यालय एक ऐसे वैश्विक बाजार का हिस्सा हैं, जहां शिक्षा एक बिकाऊ माल की तरह है, बशर्ते आपके पास धन हो। शिक्षा के इस निजी बाजार में विद्याार्थी हर किस्म का उपभोक्ता है और शिक्षक महज एक सेवा प्रदाता। निजी क्षेत्र के ये विद्यालय अब कोचिंग इस्टीट्यूट के साथ जुड़ कर विद्यार्थियों को आठवीं कक्षा से ही इंजीनियर और डॉक्टर बनने का सपना बेचने लगे हैं। बचपन को मारने की यह साजिश सृजनशीलता को विद्यार्थियों से अलग कर देती है। ऐसा लगता है कि भारत सहित दक्षिण एशियाई देशों में शिक्षा के क्षेत्र में नीतिगत लकवाग्रस्तता यानी ‘पॉलिसी पैरालिसिस’ की स्थिति उत्पन्न हो गई है। इन सबसे कैसे निजात पाया जा सकता है, इस तरफ शिक्षकों, विद्यार्थियों, अभिभावकों और नीति निर्माताओं का ध्यान जाना आवश्यक है, ताकि समग्र और संतुलित विकास तथा साझा सांस्कृतिक विरासत वाला भारत मूर्त रूप ले सके।

पाओले फ्रेरे का कहना था कि अपनी शिक्षा में वयस्कों को सक्रिय हिस्सा लेना चाहिए और शिक्षा उनके परिवेश में उनकी समस्याओं से पूरी तरह जुड़ी होनी चाहिए। उनका विचार था कि वयस्क शिक्षा का उद्देश्य लिखना-पढ़ना सीखने के साथ समाज का आलोचनात्मक मूल्यांकन करना है, जिसमें गरीब और शोषित व्यक्तियों को अपने समाजों, परिवेशों, परिस्थितियों और उनके कारणों को समझने की शक्ति मिले ताकि वे अपने पिछड़ेपन और गरीबी के कारण समझे और उन कारणों से लड़ने के लिए सशक्त हों। इसके लिए आवश्यक है कि शिक्षक को पढ़ाने से पहले अनुसंधान करना चाहिए कि वहां के लोग किन शब्दों को समझते हैं, उनकी चिंताएं क्या हैं, वे क्या सोचते हैं। फिर शिक्षक को कोशिश करनी चाहिए कि उसकी शिक्षा उन्हीं शब्दों, चिंताओं से जुड़ी हुई हो। पर क्या हम ऐसी शिक्षा नीति बना पाए हैं? क्या शिक्षा को परिवेश और परिवेश की समस्याओं से जोड़ पाए हैं? शायद नहीं, तो फिर नकल के बाजार के उभार और डिग्रियों की खरीद-फरोख्त को रोकना आसान नहीं दिखता। यह एक तथ्य है कि वैश्वीकरण की प्रक्रिया ने शिक्षा और चिकित्सा के क्षेत्र में एक अदृश्य संघर्ष को तीव्र किया है, बाजार और व्यवस्था में से कौन किसको नियंत्रित और निर्देशित करे? अगर यह नियंत्रण और निर्देशन बाजार की शक्तियों के पास है, तो पर्चों का आउट होना और क्रय-विक्रय आने वाले समय में आम हो जाएगा। व्यवस्था को संचालित करने वाली शक्तियों से इस पक्ष पर ध्यान देने की अपेक्षा अकादमिक जगत द्वारा की जा रही है।

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