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दूसरी नजर: विरोध के कुछ और स्वर

वर्ष 1991 से भारत के मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की वृद्धि दर करीब-करीब जीडीपी/जीवीए की औसत वृद्धि दर के बराबर रही है। अलबत्ता निर्यात में बढ़ोतरी हुई। वर्ष 1990-91 में निर्यात जीडीपी के 6.93 फीसद के बराबर था। वर्ष 2016-17 तक यह अनुपात बढ़ कर 19.31 फीसद हो गया।

Author February 18, 2018 9:34 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर।

फरवरी 2018 ने मुझे राजनीति का एक सबक सिखाया- मैं उम्मीद करता हूं कि बहुत-से अन्य लोगों को भी सिखाया होगा- कि अतीत की, खासकर आर्थिक अतीत की स्मृतियों को मिटाने के लिए पच्चीस साल काफी होते हैं। सत्ताईस साल पहले, भारत एक बंद अर्थव्यवस्था वाला देश था।

– आयात को बुरा समझा जाता था, और आयात के प्रतिस्थापन को अच्छा।
– सीमाशुल्क वांछनीय था, और ऊंचे सीमाशुल्क का मतलब था सुरक्षित अर्थव्यवस्था।
– विदेशी मुद्रा बहुत कीमती मानी जाती थी, सो उसे भरसक जमा रखा जा सके तो अच्छा।
– कर जरूरी थे, ऊंचे कर तो घोर आवश्यकता को रेखांकित करते थे।
– ऊंची ब्याज दरें जमाकर्ताओं और बैंकों के हित में थीं, ऋण लेने वालों और निवेशकों की पूछ नहीं थी।

यह बात मायने नहीं रखती थी कि भारत एक गरीब देश है और अधिकांश भारतीय गरीब हैं। जो बात अंतत: मायने रखती थी वह यह कि वे सुरक्षित हैं, या हम ऐसा मान कर चलते थे। और तभी दो अप्रत्याशित घटनाएं हुर्इं। इतिहास की एक क्रूर घटना की वजह से नरसिंह राव देश के प्रधानमंत्री बने। और उन्होंने एक विनम्र विद्वान डॉ मनमोहन सिंह को वित्तमंत्री नियुक्त किया। दोनों लंबे समय तक प्रतिष्ठान की सेवा कर चुके थे और उनसे राजधर्म की रक्षा करने की उम्मीद की जाती थी।

परिश्रम पर पानी

3 जुलाई 1991 को भारत को अहसास हुआ कि नई दिल्ली में सत्ता एक ध्वंसकारी टोली के हाथ में आ गई है। र्इंट-दर-र्इंट, पुराना ढांचा गिरा दिया गया, और र्इंट-दर-र्इंट, एक नई इमारत खड़ी की गई। सत्ताईस साल बाद, वह काम अब भी जारी है। पर दुर्भाग्य से, अब एक दूसरा, ऐसा ध्वंसकारी दस्ता नई दिल्ली की सत्ता पर काबिज है, जिसने पिछले सत्ताईस सालों में बड़ी मेहनत से बनाई गई इमारत को तोड़ना और राज्य के नियंत्रण वाली अर्थव्यवस्था बनाना शुरू कर दिया है जो धीमी वृद्धि दर के भारत के लंबे इतिहास का कारण रही। वरना कोई कैसे हाल में लिये गए तथा बजट में घोषित किए गए निर्णयों की व्याख्या कर सकता है?

वर्ष 1991 से भारत के मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की वृद्धि दर करीब-करीब जीडीपी/जीवीए की औसत वृद्धि दर के बराबर रही है। अलबत्ता निर्यात में बढ़ोतरी हुई। वर्ष 1990-91 में निर्यात जीडीपी के 6.93 फीसद के बराबर था। वर्ष 2016-17 तक यह अनुपात बढ़ कर 19.31 फीसद हो गया। यह मान लेना गलत होगा कि मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर या निर्यात संरक्षणवादी दीवारों के पीछे ही बढ़ सकता है। इसके विपरीत, संरक्षणवाद के चलते पूंजी तथा तकनीक के स्रोत सूख जाएंगे और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर निर्यात में होने वाली प्रतिस्पर्धा के लायक नहीं रह जाएगा। अनुचित व्यापार-व्यवहारों से निपटने के लिए कई उपाय किए गए हैं। विश्व व्यापार संगठन के करार किसी भी देश को एक हद के भीतर सीमाशुल्क लगाने की इजाजत देते हैं। आयात में ‘अचानक उछाल’ से निपटने के लिए अस्थायी तौर पर सीमाशुल्क उपायों का सहारा लिया जा सकता है। डंपिंग-रोधी शुल्क लगा कर ‘डंपिग’ के खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है। इसके अलावा, घरेलू बाजार में सस्ते, घटिया सामानों की आवक रोकने के लिए गैर-शुल्कीय उपाय अपनाने की भी अनुमति है। बड़े औद्योगिक और कारोबारी देश एक खुली, प्रतिस्पर्धामूलक और नियम-आधारित विश्व व्यापार व्यवस्था में ही फले-फूले हैं। भारत भी लाभान्वित हुआ है।

उलटी दिशा

क्या तथाकथित स्वदेशी लॉबी के दबाव में पुनर्विचार चल रहा है? बजट से ऐन पहले और बजट में भी सरकार ने कई ऐसी घोषणाएं कीं जो संरक्षणवादी (और कराधान) लॉबी के मजबूत होने का संकेत देती हैं। उनमें से कुछ इस प्रकार हैं:

1. दिसंबर 2017 में सरकार ने कई विद्युत और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों पर सीमाशुल्क में खासी बढ़ोतरी कर दी, जैसे मोबाइल फोन (0-15 फीसद), माइक्रोवेव ओवन, कैमरा, मॉनीटर आदि पर। जाहिर है, यह अल्पकालिक उपाय नहीं था।
2. बजट में बहुत सारी वस्तुओं पर सीमाशुल्क में भारी बढ़ोतरी घोषित की गई। इनमें फलों के जूस, इत्र, प्रसाधन सामग्री, वाहनों के पुर्जे, चप्पल-जूते, नकली गहने, मोबाइल टेलीफोन (बीस फीसद तक), स्मार्ट घड़ियां, खिलौने और गेम्स, सिल्क धागे, खाद्य तेल तथा पतंग, मोमबत्ती, धूपी चश्मे आदि विविध वस्तुएं शामिल हैं।
3. पूंजी पर कई तरह से कर थोपा जा रहा है। रिजर्व बैंक ने दीर्घकालीन पूंजीगत लाभ कर (एलटीसीजी) सहित ऐसे पांच करों की पहचान की है, जो निवेश में बाधक बनेंगे।
4. राष्ट्रीय शेयर बाजार और मुंबई शेयर बाजार ने सिंगापुर शेयर बाजार के साथ लाइव डाटा की साझेदारी वाले अपने लाइसेंस-करारों को रद्द कर दिया है। जाहिराना तौर पर इसका मकसद वायदा कारोबार के सूचकांक को सिंगापुर के हाथ लगने से रोकना है, कि वह कर की अपनी नीची दरों और हल्के नियमन के चलते इसका फायदा न उठाए।
5. राजकोषीय घाटे को, इस साल और अगले साल भी, पूर्व में घोषित लक्ष्य से ऊपर जाने की इजाजत दे दी गई, इस बात की अनदेखी करते हुए कि इसका महंगाई पर क्या असर पड़ेगा। रिजर्व बैंक के मुताबिक, अप्रैल-सितंबर 2018 के दौरान महंगाई बढ़ कर 5.6 फीसद हो सकती है।
6. कच्चे तेल की कीमत में कोई भी बढ़ोतरी पेट्रोल, डीजल, रसोई गैस की खुदरा कीमतों में वृद्धि ही करेगी, जबकि इन पेट्रोलियम पदार्थों पर उत्पाद शुल्क घटाने या उन्हें जीएसटी के तहत लाने के विकल्प पर विचार ही नहीं किया गया।

नाकामी का कबूलनामा

संरक्षणवादी कदम उठाना यह कबूल करना है कि ‘मेक इन इंडिया’ अभियान फ्लाप हो गया है, कारोबारी सुगमता (इज आॅफ डूइंग बिजनेस) के सूचकांक में ऊपर चढ़ने की जो बात खूब जोर-शोर से कही गई वह एक भ्रांति है, और इंफ्रास्ट्रक्चर सुधार का दावा खोखला है। अब सत्ता-प्रतिष्ठान के भीतर से भी असहमति के स्वर सुने जा सकते हैं। नीति आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष डॉ अरविंद पानगड़िया ने सीमाशुल्क बढ़ाने पर नाराजगी जताई है। प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य डॉ राथिन राय ने राजकोषीय घाटे के निर्धारित लक्ष्य का उल्लंघन करने पर आलोचना की है। परिषद के एक अन्य सदस्य डॉ. सुरजीत भल्ला ने दीर्घकालीन पूंजीगत लाभ कर पर खरी-खोटी सुनाई है। नीति आयोग के उपाध्यक्ष डॉ राजीव कुमार की यह उम्मीद बहुत लचर जान पड़ती है कि ये कदम अस्थायी हैं। रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति ने छह अनिश्चितताओं का जिक्र किया है जो महंगाई बढ़ाएंगी। उनमें से तीन सीधे-सीधे बजट में की गई घोषणाओं से संबंधित हैं।

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