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दूसरी नजर: आखिर खत्म हुआ चुनाव प्रचार

राजनीतिक दलों, उम्मीदवारों, रैलियों और रोड शो, पैसे के खर्च, दी गई गालियां, हिंसा, चर्चित ईवीएम और वीवीपैट की गड़बड़ियों और चुनाव आयोग द्वारा इन्हें क्लीन चिट दिए जाने का काम खुल कर हुआ।

Author May 19, 2019 4:42 AM
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (एक्सप्रेस फाइल फोटो)

चुनावों की अधिसूचना जारी होने के बाद से आज मतदान के आखिरी दिन तक दस हफ्ते का वक्त काफी लंबा, थका देने वाला और कई बार हताश कर देने वाला रहा। नीतियों पर बहस के अलावा जो कुछ हमने देखा उसमें कहीं कोई कमी नहीं छोड़ी गई। राजनीतिक दलों, उम्मीदवारों, रैलियों और रोड शो, पैसे के खर्च, दी गई गालियां, हिंसा, चर्चित ईवीएम और वीवीपैट की गड़बड़ियों और चुनाव आयोग द्वारा इन्हें क्लीन चिट दिए जाने का काम खुल कर हुआ। आखिरकार एक बड़ा लोकतांत्रिक कार्य संपन्न हो गया है।

रिपोर्ट कार्ड पर चुनाव आयोग को सिर्फ ‘औसत’ मिला है। मेरी चिंता इस बात पर रही कि चुनाव आयोग ने अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग मापदंड अपनाए। उदाहरण के लिए, तमिलनाडु में रोड शो, कारों के काफिले और होर्डिंग लगाने की इजाजत नहीं थी, शहरों और कस्बों में पोस्टर लगाने और दीवारों पर लिखने पर पाबंदी थी, खर्च पर निगरानी रखने रखने वाले पर्यवेक्षक दखलंदाजी और मनमानी कर रहे थे और ‘काल्पनिक खर्चों’ की अवधारणा को विचित्र सीमा तक ले जाया गया। दूसरी ओर, दिल्ली और भारत के उत्तर, पश्चिम और पूर्व के चुनाव क्षेत्र होर्डिंग और पोस्टर से अटे पड़े थे। लंबे-लंबे रोड शो और काफिले निकाले गए। दिमाग ठिठका देने वाला खर्च साफ दिख रहा था, कहीं कोई चुनाव पर्यवेक्षक नहीं थे। मुझे आश्चर्य है कि कैसे चुनाव आयोग खुल कर इस तरह के भेदभाव भरे कानूनों को लागू करता और उन्हें उचित ठहराता रहा।

मीडिया- कौन सा?
प्रिंट और टीवी मीडिया ने पक्षपात किया। ज्यादातर सरकार के पक्ष में या तो लगाव के कारण थे या फिर खौफ की वजह से। ज्यादातर तो खौफ की वजह से रहे। कुछ भाजपा के साथ-साथ चलने वाले बन गए। कोई भी ऐसा नहीं दिखा, जिसे याद रहा हो कि लोकसभा चुनाव शून्य सरकार के पांच साल के कामकाज का लेखाजोखा है। कुछ अखबारों और चैनलों ने भाजपा सरकार के कामकाज की आलोचना करने और उसे उजागर करने की हिम्मत दिखाई। ऑनलाइन मीडिया और सोशल मीडिया धन्यवाद के पात्र हैं, जिनकी बदौलत देश में जीवंत बहस चलती रही। देश में गुंजायमान बहस का ही यह असर है, जिसे व्यापक रूप से ‘अंडरकरंट’ कहा जा रहा है और इसी से चुनाव के नतीजों का फैसला होगा।

आर्थिकी नदारद
भाजपा ने चुनाव प्रचार के शुरू में रास्ता बदल लिया था। अच्छे दिन का कभी जिक्र नहीं किया गया। 2014 के वादों ने भाजपा को मुश्किलों में डाल दिया। नरेंद्र मोदी ने ‘सर्जिकल स्ट्राइक’, पुलवामा-बालाकोट और राष्ट्रवाद में शरण ले ली। ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ सिर्फ दूसरी सीमापार कार्रवाई थी, जिससे पाकिस्तान को फर्क नहीं पड़ा। पुलवामा व्यापक खुफिया नाकामी का नतीजा था। बालाकोट के रहस्य पर तो परदा ही पड़ गया है। मोदी के ‘राष्ट्रवाद’ के तर्क ने देश को दो हिस्सों में बांट डाला -‘क्या आप मेरे साथ हैं या आप मेरे विरोध में हैं?’ और अगर आप मोदी की नीतियों के खिलाफ थे तो आप राष्ट्र-विरोधी थे। और इस हिसाब से तो वे सभी जिन्होंने 2019 में मोदी के खिलाफ वोट डाला है, राष्ट्र-विरोधी होंगे और इस तरह हम राष्ट्र-विरोधियों की प्रमुखता वाला देश बन सकते हैं।
अर्थव्यवस्था को भुला दिया गया। जब पुख्ता रिपोर्टें और सरकारी आंकड़े सामने आए और इन्होंने सरकार की झूठी कहानी के गुब्बारे की हवा निकाल दी, तो हलचल मच गई। जब प्रधानमंत्री चुनाव प्रचार कर रहे थे और वित्तमंत्री ब्लॉग लिख रहे थे, अर्थव्यवस्था डूब रही थी (देखें- अर्थव्यवस्था खतरे में, जनसत्ता 12 मई 2019)। पिछले हफ्ते और बुरी खबर आई। फरवरी 2019 में विनिर्माण की दर ऋणात्मक हो गई। सेंसेक्स और निफ्टी में लगातार नौ दिन गिरावट बनी रही। डॉलर-रुपए की विनिमय दर 70.26 रुपए तक चली गई। अखबारों में छपी रिपोर्टों ने स्वच्छ भारत, उज्ज्वला और प्रधानमंत्री आयुष योजना के नतीजों को उजागर कर दिया। ईरान पर अमेरिका की पाबंदी के बाद तो भारत को तेल के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है और तेल के दाम भी चढ़ गए हैं। अमेरिका और चीन के बीच चल रहे व्यापार युद्ध से भी भारत के विदेशी कारोबार को खतरा पैदा हो गया है।

सार्वजनिक भाषण का स्तर तेजी से गिरा है। इस बात से जरा इनकार नहीं किया जा सकता कि पूरे चुनाव में अपशब्दों और विशेषणों की भरमार रही और यहां तक कि व्यंग्य, कटाक्ष और इशारे भी असंसदीय भाषा में किए गए! ‘लोकतंत्र का तमाचा’ को शाब्दिक अर्थों में लिया गया और इसे प्रधानमंत्री के लिए तमाचे की बात बना दी गई। महाभारत के एक पात्र की ओर संकेत करते हुए तो बाकायदा नाम भी लिया गया। नरेंद्र मोदी ने हर उस ट्वीट पर नाराजगी जताई जो उनके लिए कहे गए और पीड़ित बने रहे और इसमें उन्होंने इस तथ्य को नजरअंदाज कर दिया कि उन्होंने पीड़ितों की लंबी कतार छोड़ रखी है।

मोदी के कई रूप
चुनाव प्रचार खत्म होते-होते बीच गर्मी में अचानक बारिश की तरह गैरइरादतन हास्य की फुहार भी देखने को मिली। इसके लिए हम प्रधानमंत्री के ऋणी हैं। विज्ञान तथा तकनीकी से अपने संबंध के बारे में उल्लेखनीय खुलासे करके उन्होंने अपने चुनाव अभियान के बीच माहौल हल्का कर दिया। पहला बालाकोट हमले को लेकर था। श्री मोदी ने कहा- ‘विशेषज्ञ खराब मौसम की वजह से हमले के बारे में पुनर्विचार कर रहे थे, लेकिन तब मैंने उन्हें कहा, इतने ज्यादा बादल होना और बारिश होना फायदेमंद हो सकता है और हम उनके रडार से बच सकते हैं। यह मेरी कच्ची समझ थी। तब मैंने कहा- बादल छाए हुए हैं, जाइए आगे बढ़िए।’ श्री एलके आडवाणी के साथ अपने जुड़ाव को याद करते हुए मोदी ने कहा- ‘करीब 1987-88 में मैंने पहली बार डिजिटल कैमरे का इस्तेमाल किया था… मैंने आडवाणी की फोटो खींची और उसे दिल्ली भेज दिया। आडवाणीजी आश्चर्य में पड़ गए थे और उन्होंने पूछा-‘आज मेरा रंगीन फोटो कैसे छप गया?’
विज्ञान के साथ श्री मोदी का अतियथार्थवादी अनुभव ईश्वर का आशीर्वाद होना चाहिए। मुझे 2014 में मोदी की सुनाई एक और कहानी याद आ गई। ‘ईश्वर ने मुझे रंगों को मिलाने की कला बख्शी है। चूंकि मैं ईश्वर की देन हूं, इसलिए मैं सब जगह उपयुक्त बैठता हूं।’ ईश्वर भारत के चुनावों को देख रहे हैं।

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