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दूसरी नजर: बजट में सूराख

खर्च के खाते पर नजर डालें। यहां दो बड़े सूराख हैं। पहले, खाद्य सबसिडी के प्रावधान को लें। वर्ष 2016-17 में यह 1,10,000 करोड़ रु. था और 2017-18 में इस मद में 1,40,000 करोड़ रु. खर्च होने का अनुमान है। 2018-19 में इस मद में 1,70,000 करोड़ रु. का प्रावधान किया गया है।

Author March 11, 2018 4:32 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर।

जब आंकड़े अंतिम रूप से बार्इं या दाहिनी तरफ लिखे जाते हैं और बकाए का हिसाब निकलता है, तो सरकार का बजट एक गृहणी के घरेलू बजट से बहुत अलग नहीं दिखता। अगर हम ढेर सारे शून्य को नजरअंदाज कर दें, तो यह एक समृद्ध परिवार का घरेलू बजट हो सकता है। भारत के 2018-19 के सालाना बजट पर एक नजर डालें:
(करोड़ रु. में)
कुल प्राप्तियां कुल व्यय
18,17,937 24,42,213
घाटा है 6,24,276 करोड़ रु. का। एक गृहस्थ के मामले में पैसा उधार लेने के सिवा कोई चारा नहीं है, अगर वह उधार लेने में सक्षम है और कोई उसे उधार देने को राजी है। सरकार के मामले में भी वही विकल्प है- उधार लेने का- पर स्थितियां भिन्न हैं। सरकार उधार लेगी, चाहे उधार लेने की क्षमता हो या नहीं। कुछ सरकारें अपनी क्षमता से परे जाकर उधार लेती हैं और आने वाली सरकार के मत्थे कर्ज का भारी बोझ डाल जाती है। एक सरकार इस उम्मीद में उधार ले सकती है कि वह उधार अस्थायी रहेगा और ‘अतिरिक्त’ उधार को अतिरिक्त प्राप्तियों के सहारे साल भर के भीतर निपटा दिया जाएगा।

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आंकड़ों के पीछे
बजट 2018-19 के मुताबिक, केंद्र सरकार 6,24,276 करोड़ रु. उधार लेगी। यह प्रसिद्ध राजकोषीय घाटा है। जैसा कि सारे आंकड़ों के मामलों में होता है, सही बात केवल आंकड़ों पर नजर फिरा कर नहीं जानी जा सकती। आंकड़ों के पीछे जाना होगा और यही बात मैं इस निबंध में कहना चाहता हूं। पहली बात, प्राप्तियों पर नजर डालें। प्राप्तियों का बड़ा हिस्सा कर-राजस्व का होता है (केंद्र सरकार के हिस्से में आने वाला)। करों के मुख्य मद और उनसे मिलने वाले राजस्व का अनुमान नीचे दी गई तालिका में उल्लिखित हैं:
(कुल कर-संग्रह करोड़ रु. में)
कॉरपोरेशन कर 6,21,000
आय कर 5,29,000
सीमाशुल्क 1,12,500
उत्पाद शुल्क 2,59,600
जीएसटी 7,43,900
6,03,900 सीजीएसटी
50,000 आइजीएसटी
90,000 उप-कर

जो कड़वी हकीकत ऐन सामने है वह है जीएसटी। जीएसटी 1 जुलाई 2017 को लागू किया गया था। सरकारी लेखा नियंत्रक (सीजीए) द्वारा जारी आंकड़ों के मुताबिक अगस्त 2017 से जनवरी 2018 के दरम्यान, केंद्र के हिस्से का जीएसटी संग्रह (एकीकृत जीएसटी से मिले हिस्से को शामिल करके) औसतन प्रतिमाह 22,129 करोड़ रु. था। बजट में यह मान कर चला गया है कि औसत संग्रह फरवरी और मार्च 2018 में 44,314 करोड़ रु. पर पहुंच जाएगा और फिर 2018-19 में यह आंकड़ा 50,000 करोड़ रु. प्रतिमाह होगा। इस बात पर सहज ही विश्वास नहीं होता। काफी उदारता से बनाई गई धारणा यह है कि केंद्रीय जीएसटी संग्रह बढ़ कर 40,000 करोड़ रु. प्रतिमाह हो जाएगा, और सालाना संग्रह होगा 4,80,000 करोड़ रु.। फिर कुल कमी पड़ेगी 1,23,900 करोड़ रु. की और 71,862 करोड़ रु. की (शुद्ध रूप से केंद्र के हिस्से में, 58 फीसद पर)। प्राप्तियों के मोर्चे पर दूसरा सवालिया निशान है विनिवेश से मिलने वाली प्राप्तियों पर। 2017-18 में बजट अनुमान था 72,500 करोड़ रु., पर संशोधित अनुमान है 1,00,000 करोड़ रु.। यह हाथ की सफाई का कमाल है: ओएनजीसी से कहा गया कि वह एचपीसीएल में सरकार की हिस्सेदारी खरीदे और 36,915 करोड़ रु. उसकी झोली में डाल दे। क्या 2018-19 में यही दोहराया जाएगा? अगर वह मुमकिन नहीं है, तो एक चुनावी साल में विनिवेश से अस्सी हजार करोड़ रु. हासिल करना (जैसा कि बजट अनुमान कहता है) मुश्किल ही लगता है। लिहाजा, इस मद में भी सूराख हो सकता है, कह सकते हैं बीस हजार करोड़ रु. का।

खर्च का कमतर अनुमान
खर्च के खाते पर नजर डालें। यहां दो बड़े सूराख हैं। पहले, खाद्य सबसिडी के प्रावधान को लें। वर्ष 2016-17 में यह 1,10,000 करोड़ रु. था और 2017-18 में इस मद में 1,40,000 करोड़ रु. खर्च होने का अनुमान है। 2018-19 में इस मद में 1,70,000 करोड़ रु. का प्रावधान किया गया है। 2018-19 में 30,000 करोड़ रु. की बढ़ोतरी पर्याप्त नहीं हो सकती। राजग सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) तय करने में कंजूसी ही करती रही है। चुनावी साल के मद्देनजर सरकार ने ‘लागत पर पचास फीसद जोड़ कर’ एमएसपी देने की गर्वीली घोषणा की है। अभी तक यह साफ नहीं है कि ‘लागत’ का हिसाब किस तरह लगाया जाएगा। लेकिन अगर सरकार ने एमएसपी में खासी बढ़ोतरी की घोषणा की, तो 1,70,000 करोड़ का प्रावधान पर्याप्त नहीं होगा। दूसरी बात यह, कि राष्ट्रीय स्वास्थ्य संरक्षण योजना पूरी तरह आबंटन-रहित है। अगर यह जुमला है (जैसे कि 2016-17 के बजट में की गई घोषणा थी), तो परेशान होने की जरूरत नहीं है। लेकिन अगर सरकार ने 2018-19 में इस योजना को लागू किया और लाभार्थियों के लिए बीमा खरीदा, तो उसे धन खर्च करना पड़ेगा। इस पर 11,000 करोड़ रु. के आशावादी अनुमान से लेकर 1,00,000 करोड़ रु. के यथार्थवादी अनुमान तक, भिन्न-भिन्न अनुमान लगाए गए हैं। ये आंकड़े खर्च के खाते में ही जुड़ेंगे। मेरा अनुमान है कि इन दो मदों में सरकार को 70,000 करोड़ रु. और खर्च करने पड़ेंगे- 20,000 करोड़ रु. खाद्य सबसिडी के मद में और 50,000 करोड़ रु. स्वास्थ्य बीमा के मद में।

सूराख कितना बड़ा है?
मैंने कच्चे तेल की कीमतों में होने वाली किसी भी बढ़ोतरी को हिसाब में नहीं लिया है। ऐसा लगता है कि बजट में यह मान कर चला गया है कि कच्चे तेल की कीमत 70 डॉलर प्रति बैरल के नीचे ही रहेगी। अगर यह कीमत चढ़ती है, तो गंभीर परेशानी खड़ी हो सकती है। जब हम ये आंकड़े हिसाब-किताब के दोनों तरफ जोड़ते हैं, तो हम देखते हैं कि प्राप्तियों के हिस्से में 92,000 करोड़ रु. की कमी होगी, और खर्च के हिस्से में 70,000 करोड़ रु. का अतिरिक्त भार पड़ेगा- यह 1,62,000 करोड़ रु. के राजकोषीय घाटे से अलग होगा।
लिहाजा, राजकोषीय घाटा 2018-19 में 6,24,276 करोड़ रु. या जीडीपी के 3.3 फीसद तक सीमित नहीं रहेगा। यह बढ़ कर 7,86,276 करोड़ रु. या जीडीपी के 4.15 फीसद तक जा सकता है। इस पर बाजार की नजर है। आपकी भी होनी चाहिए, क्योंकि लिया जाने वाला उधार आपके सिर पर कर्ज होगा।

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