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दूसरी नजर: अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता

नया शीतयुद्ध भारत और चीन के बीच है। यह जंग दो टकराते दृष्टिकोण की उपज है: भारत चीन को ईर्ष्या की निगाह से देखता है, चीन भारत को हिकारत की नजर से देखता है। भारत की निगाह में चीन वर्चस्ववादी है, चीन भारत को नौसिखुआ मानता है।

Author April 1, 2018 5:02 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर

इस समय दुनिया में एक नया शीतयुद्ध चल रहा है। यह अमेरिका और रूस के बीच नहीं है; जो कि एक कूटनीतिक जंग है, ढीठ व ‘एकमात्र महाशक्ति’ और एक प्रताड़ित पर स्वाभिमानी देश के बीच, जिसने धुरी होने की अपनी हैसियत खो दी है। यह अमेरिका और चीन के बीच नहीं है; जो कि व्यापार युद्ध है, जिसे विश्व व्यापार के नियमों के तहत ही उचित तरीके से रोका जा सकता है। नया शीतयुद्ध भारत और चीन के बीच है। यह जंग दो टकराते दृष्टिकोण की उपज है: भारत चीन को ईर्ष्या की निगाह से देखता है, चीन भारत को हिकारत की नजर से देखता है। भारत की निगाह में चीन वर्चस्ववादी है, चीन भारत को नौसिखुआ मानता है।

निरर्थक ईर्ष्या
खटास को समझने के लिए कुछ कठोर तथ्यों को जानना ही होगा। देखें तालिका। मैं इसे काफी अफसोस के साथ कहता हूं, पर इसमें दो राय नहीं कि कौन अधिक सशक्त और अधिक समृद्ध राष्ट्र है। दोनों में एक को या दोनों को ही गरीबी से पार पा चुके मध्य-आय वाला देश होने में बरसों लगेंगे। हालांकि चीन इस दौड़ में भारत से आगे है।

चीन की शानदार रणनीति
हर लिहाज से चीन की रणनीति शानदार है। चीन की रणनीति का एक प्रमुख पहलू पड़ोस में दबदबा है, जिसमें एशिया का बड़ा हिस्सा और यूरोप का भी कुछ हिस्सा आता है। भारत, और शायद जापान, आस्ट्रेलिया, और कुछ दक्षिण-पूर्व एशियाई देश इसे वर्चस्व के रूप में देखते हैं; जबकि चीन किसी प्रकार की दखलंदाजी से इनकार करता है। बीआरआई यानी ‘बेल्ट ऐंड रोड इनीशिएटिव’ राष्ट्रपति शी जिनपिंग की खास पहल है। भारत और भूटान समेत कुछ देश बीआरआई में शामिल होने के खिलाफ हैं। चीन ने बांग्लादेश, मालदीव, म्यांमा, नेपाल, पाकिस्तान और श्रीलंका से व्यापक आर्थिक साझेदारी शुरू कर दी है, उन देशों से जो भारत के चतुर्दिक पड़ोस में हैं। इन देशों से चीन का व्यापार और इन देशों में चीन का निवेश बढ़ा है। बांग्लादेश का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार चीन है। श्रीलंका के आयात में सबसे बड़ा हिस्सा चीन-निर्मित चीजों का है। चीन पाकिस्तान में भारी ढांचागत निवेश कर रहा है, जिसमें सबसे उल्लेखनीय है ग्वादर बंदरगाह का निर्माण। श्रीलंका ने हंबनटोटा बंदरगाह का सत्तर फीसद मालिकाना हक चीन को सौंप दिया है, जो कि आगे कभी भी जिबूती की तरह नौसैनिक अड्डे में बदल सकता है। अक्टूबर 2016 में चीन ने म्यांमा के साथ 24 अरब डॉलर के निवेश का करार किया था और वह क्याकप्यू में गहरे समुद्र में बंदरगाह बना रहा है। मजबूत मार्क्सवादी प्रभाव वाली नेपाल की केपी ओली सरकार के बारे में कयास है कि वह चीन की तरफ झुक सकती है। मालदीव की बाबत भारत के बराबर अधिकार जताते हुए चीन ने संकट में पड़े इस द्वीपीय देश में भारत की तरफ से हो सकने वाली किसी भी कार्रवाई को बड़े प्रभावी ढंग से रोक दिया है।

भारत कैसे नाकाम हुआ
कूटनीतिक पर्यवेक्षकों ने भारत की कई रणनीतिक भूलों की तरफ इशारा किया है। सबसे गंभीर गलती पाकिस्तान के संबंध में अचानक किया गया बदलाव रहा है, जिसे ‘विदेश नीति’ के तौर पर पेश किया गया और जिसने पाकिस्तान को पूरी तरह चीन के पाले में धकेल दिया। अगर भविष्य में कोई युद्ध होगा, तो वह सिर्फ एक पड़ोसी देश के साथ सीमित रहने वाला युद्ध नहीं होगा, बल्कि वह युद्ध दो मोर्चों पर होगा। नेपाल के नए संविधान को लेकर उसके साथ भारत के गतिरोध को दूर करने की कोशिश इतने अपरिपक्व ढंग से की गई कि उससे नेपाल में राष्ट्रवादी भावना को गहरी चोट पहुंची और एक प्रकार का टकराव पैदा हुआ (खासकर केपी ओली की पार्टी के साथ)। इस घाव को भरने में लंबा वक्त लगेगा। मालदीव में भारत चुपचाप पीछे हट गया, वहां के विपक्षी दलों को हैरानी में डालते हुए। श्रीलंका में सरीसेना-विक्रमसिंघे का सत्तारूढ़ गठबंधन उपेक्षा से आहत है, फिर से उभरते राजपक्षे खुल कर विरोध का राग अलाप रहे हैं। रहा बांग्लादेश, तो वह एक दूसरे के प्रति घोर वैर पाले दो राजनीतिक दलों के बीच इस कदर विभाजित है कि उनकी तीखी सियासी लड़ाई में भारत को कभी भी एक तटस्थ देश के रूप में नहीं देखा जाएगा। फिर इसमें आश्चर्य की क्या बात है कि भारत का पड़ोस चीन के लिए एक लुभावना क्षेत्र बन गया है, जिसके पास विपुल संसाधन हैं, जिसकी सरकार के सम्मुख देश में कोई विपक्ष नहीं है, जिसके पास एक सर्वशक्तिमान नेता है और कपट-भरी चालें हैं? (यह भी याद करें कि राष्ट्रपति शी यह कहने वाले एकमात्र नेता हैं कि वे प्रधानमंत्री मोदी से गले मिलने को आतुर नहीं हैं।) तमाम पर्यवेक्षक जानते हैं कि चीन भरसक भारत को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद या एनएसजी (न्यूक्लीयर सप्लायर्स ग्रुप) का सदस्य बनने नहीं देगा।

चीन खुद को एशिया की एकमात्र महाशक्ति के रूप में देखता है और अमेरिका के बराबर शक्तिशाली हो जाने की उम्मीद पाले हुए है (ट्रंप की भूलों की बदौलत!)। भारत को एक दीर्घकालीन रणनीति पर काम करना पड़ेगा- चीन के बराबर की आर्थिक शक्ति बनना पड़ेगा। उसके लिए सामूहिक आर्थिक समझ, साहसिक, ढांचागत सुधारों, कड़े नीतिगत बदलावों और दृढ़ कार्यान्वयन की जरूरत है, जो दो दशक तक सतत और ऊंची (आठ से दस फीसद) विकास दर की तरफ ले जाएगा। इस चुनौती से पार पाना अकेले मोदी के बस का नहीं है।

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