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किताबें मिलीं:सुरंग के उस पार, कर्मवीर खांडू और चौराह

कथाकार अशोक गुप्ता आठवें दशक से कहानी लेखन के क्षेत्र में निरंतर सक्रिय हैं। उनकी कहानियां विषय वैविध्य और भाषा के खिलंदड़ापन के कारण अपना अनोखा प्रभाव जुटा लेती हैं।

Author April 29, 2018 5:42 AM
सुरंग के उस पार बुक का कवर पेज।

सुरंग के उस पार: कथाकार अशोक गुप्ता आठवें दशक से कहानी लेखन के क्षेत्र में निरंतर सक्रिय हैं। उनकी कहानियां विषय वैविध्य और भाषा के खिलंदड़ापन के कारण अपना अनोखा प्रभाव जुटा लेती हैं। अशोक के पास गहरी मनोवैज्ञानिक पकड़ है और उनकी मानवीय संवेदना उनकी कहानियों को रचनात्मक भी बनाती है और सहज पठनीय भी। उनका कथा परिवेश जीवन की मुख्यधारा से उपजता है और उनके पात्र समाज के हर वर्ग से उठ कर सामने आते हैं। इस संग्रह में कहानी ‘चीकट लबादा’ और ‘संतूर वादक’ अशोक गुप्ता की कल्पनाशीलता का रोचक किंतु सृजनात्मक उदाहरण हैं। अपनी कहानियों में अशोक सद्य: प्रचलित मूल्यबोध को तोड़ते हुए मानवीयता के पक्ष में नए मूल्य स्थापित करने में अपने युवतर सोच का आग्रह सामने रखते हैं। संग्रह की शीर्षक कहानी ‘सुरंग के उस पार’ उनका एक ऐसा ही अद्भुत उद्यम है। संग्रह की सभी पंद्रह कहानियां अशोक गुप्ता के सचेत और जीवंत कथाकार की बानगी हैं। हाल ही दिवंगत हुए अशोक गुप्ता इस संग्रह के बारे में लिखते हैं- ‘जीवन की धारा में अदृश्य बहती हुई कहानियां मुझे सूझती हैं और मैं इस शर्त पर उन्हें उठा लेता हूं कि इनमें जो आनंद, जो पीड़ा, जो उद्वेग, जो अन्याय और शोषण से उबरने की अकुलाहट सबकी आंखों से ओझल है, मैं उसे दृश्य और श्रव्य बना कर जीवन की धारा को लौटाऊंगा।’
सुरंग के उस पार : अशोक गुप्ता; इंडियन पब्लिशिंग हाउस, 852, महावीर नगर, टोंक रोड, जयपुर; 350 रुपए।

कर्मवीर खांडू: राजनेताओं पर किताब लिखना अक्सर विवाद को न्योता देने जैसा होता है। पर कुछ राजनेता ऐसे होते हैं, जिनके बारे में लिखना दस्तावेज बन जाता है, उस पर विवाद की गुंजाइश नहीं रहती। अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री दोरजी खांडू ऐसे ही नेता थे, जिनके प्रति वहां के लोगों में बहुत स्नेह था। इसलिए कि खांडू का व्यक्तित्व कुछ ऐसा था कि वे अपने कामों और व्यवहार से सबको अपना बना लेते थे। उन्हें प्यार से लोगों ने लाफिंग बुद्धा कहना शुरू कर दिया था और यह उनका विशेषण बन गया था। अपने कार्यकाल में उन्होंने अरुणाचल में अनेक उल्लेखनीय कार्य किए।
इस किताब में खांडू के व्यक्तित्व और उनके कार्यों का मूल्यांकन करने का प्रयास किया गया है। पुस्तक का कलेवर जीवनी का नहीं है। जीवनी में कई बार आग्रह प्रकट हो ही जाते हैं, इसलिए उस कलेवर को न अपनाए जाने की वजह से यह किताब अधिक विश्वसनीय बन गई है। अनंत अमित ने इसकी शैली संस्मरणात्मक और यात्रावृत्त के मिले-जुले तौर पर विकसित की है। चूंकि चीन और भारत के संबंधों में सबसे अहम भूमिका अरुणाचल प्रदेश की है, इसलिए खांडू को इस रिश्ते को सुधारने में अधिक प्रयास करना पड़ा। इस किताब में भारत-चीन विवाद के मसलों पर खांडू से लंबी बातचीत भी है। कर्मवीर खांडू : अनंत अमित; सरोजिनी पब्लिकेशंस, 119, क्रॉस रोड, संत नगर, बुराड़ी, दिल्ली; 300 रुपए।

चौराह: यह उपन्यास अलग-अलग परिवेश से आए अलग-अलग आयु वर्ग के ऐसे किरदारों की कहानी है, जो अपनी स्थितियों-परिस्थितियों से जूझते हुए एक गांव में पहुंचते हैं और वहीं बस जाते हैं। अतीत से उपजे संत्रास और कुंठा को बुहारते हुए, हताशा और निराशा को नकारते हुए, जीने और जिंदा रहने की ललक ही इस उपन्यास के पात्रों को एक नई जमीन देती है। इस जद्दोजहद में ये पात्र जितना संघर्ष अपने भीतर के एकाकीपन से करते हुए दिखाई देते हैं, उतना ही संघर्ष उनका बाहरी दुनिया से भी चलता रहता है। यह संघर्ष कुछ हासिल करने या जीत लेने के लिए नहीं, बल्कि उनकी जीवनशैली की एक अनिवार्य आवश्यकता के रूप में उभर कर सामने आता है, जो उन्हें जीने की ताकत देता है। मूलकथा के साथ जुड़ी हुई उपकथाएं इस उपन्यास को रोचक भी बनाती हैं और पठनीय भी। जिंदगी के दंश झेलता और अपने समृद्ध अनुभवों के साथ जीता हुआ इस उपन्यास का हर किरदार कथा को एक नया आयाम देता है। यह उपन्यास छोटे-छोटे सुखों की खोज में बड़े-बड़े दुखों को नकारने की कथा है। महिला पात्रों को केंद्र में रख कर बुनी गई इस उपन्यास की कहानी दोशाले की तरह इसे एकाकार भी करती है और इसमें अनजान, अबूझे लोगों के बीच पनपते संबंधों की गरमाहट भी भरती है। इस उपन्यास को पढ़ना उन अनुभवों और किरदारों से भी गुजरना होगा जो हमारे आसपास धड़कते तो हैं पर जिंदगी की आपाधापी में जिन्हें हम अक्सर नजरअंदाज करते रहते हैं।
चौराह : जितेन ठाकुर; मेधा बुक्स, एक्स-11, नवीन शाहदरा, दिल्ली; 200 रुपए।

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