jansatta column Baradari: Cinema should give up the responsibility of society - बारादरी: सिनेमा को समाज के जिम्मे छोड़ देना चाहिए - Jansatta
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बारादरी: सिनेमा को समाज के जिम्मे छोड़ देना चाहिए

फिल्म कलाकार मुकेश त्यागी का कहना है कि कला-माध्यमों पर किसी तरह का बंधन नहीं होना चाहिए। इंटरनेट के इस जमाने में फिल्म सेंसर बोर्ड जैसी संस्थाओं को अनावश्यक बताते हुए उन्होंने कहा कि सिनेमा की विषय-वस्तु को समाज पर छोड़ देना चाहिए। जो चीज अच्छी नहीं होगी, खारिज कर दी जाएगी। उन्होंने कहा कि आने वाले समय में नेटफ्लिक्स और अमेजन जैसे खिलाड़ी सिनेमा के बाजार से लेकर उसकी विषय-वस्तु तक को पूरी तरह से बदल देंगे। सिनेमा के सत्ता और समाज के साथ संबंधों पर इस लंबी बातचीत का संचालन किया कार्यकारी संपादक मुकेश भारद्वाज ने।

बारादरी की बैठक में मुकेश त्यागी सभी फोटो: आरुष चोपड़ा

सूर्यनाथ सिंह : सिनेमा क्या और कैसे दिखाए यह बीच बहस में है। इसकी विषय-वस्तु राष्टÑीय मुद्दा बन जाती है। सिनेमा और इसके कथ्यों पर जिस तरह प्रतिबंधों की खींचतान चल रही है, बातचीत की शुरुआत उसी से की जाए, खासकर विषय-वस्तु को लेकर।

मुकेश त्यागी : देखिए, अब इंटरनेट का जमाना आ गया है, आप विषय-वस्तु पर अंकुश नहीं लगा सकते। अभी सरकार ने कोशिश की थी आठ सौ सत्तावन पोर्न साइटों पर रोक लगाने की, लेकिन सुप्रीम कोर्ट से आदेश आया कि आप इन पर रोक नहीं लगा सकते। चाइल्ड पोर्नोग्राफी पर रोक लगा सकते हैं। आज हर किसी के पास स्मार्ट फोन है। अश्लील सामग्री की पहुंच बहुत सुगम है। ऐसे में अगर आप फिल्मों की विषय-वस्तु को नियंत्रित करने का प्रयास करेंगे, तो हो सकता है वह राजनीतिक रूप से अच्छा माना जाए, पर मेरे हिसाब से यह दोमुंहापन है। यहां तक कि अब सेंसर बोर्ड की भी आवश्यकता नहीं है। सेंसर बोर्ड जब फिल्मों को विषय-वस्तु की दृष्टि से देखता है, तो उसकी रचनात्मकता को खत्म कर देता है। अगर हम खुलापन रखेंगे, तो मुझे लगता है कि विषय-वस्तु की वजह से हमारे अंदर परिपक्वता आएगी। आप देखें कि जो देश स्वच्छंद हैं, वहां बलात्कार कम होते हैं। हमारे यहां इसलिए अधिक होते हैं कि यहां हर चीज पर प्रतिबंध है। मैं इस बात से सहमत हूं कि अश्लीलता को लेकर सावधान रहना चाहिए, पर जहां विषय की मांग है, वहां हमें उदार होकर सोचना पड़ेगा। इसलिए मुझे लगता है कि विषय-वस्तु को समाज पर छोड़ देना चाहिए। अगर उसे पसंद नहीं है तो वह खुद उसे खारिज कर देगा।

मृणाल वल्लरी : आम हिंदी सिनेमा में कामकाजी महिलाओं की बहुत ही नकारात्मक छवि दिखाई जाती है। घर से बाहर निकली महिलाओं को कई बार समझौता करते, देह का इस्तेमाल करते या साजिश करते दिखाया जाता है। क्या यह कास्टिंग काउच जैसी चीजों को सामान्य मानने की मानसिकता तैयार करने जैसा नहीं दिखता?
’मैं मानता हूं कि महिलाओं को भी काम का मौका मिलना चाहिए, उन्हें भी बाहर निकलना चाहिए। मगर हमारा समाज पुरुष प्रधान है और उसकी सोच ऐसी है कि वह स्त्री को यौन-वस्तु के रूप में देखता है। इसके अलावा मुझे लगता है कि अवचेतन स्तर पर यौन कुंठा काम करती है। सिग्मंड फ्रायड ने सेक्स को बहुत महत्त्वपूर्ण चीज माना था। उसने कहा कि सेक्स बहुत बड़ा रूलिंग पावर है। आप देखिए कि सेक्स के चलते कई बार इतिहास बदल जाता है। मगर इसके अलावा कानून का दुरुपयोग भी होता है। अभी दिल्ली महिला आयोग ने एक सर्वे कराया, जिसमें पता चला कि तिरपन प्रतिशत शिकायतें झूठी दर्ज कराई जाती हैं। मगर जहां तक बॉलीवुड की बात है, मैंने आवाज उठाई कि क्यों नहीं बॉलीवुड एक समिति गठित करता, जो इस तरह की घटनाओं के खिलाफ आवाज उठाए, उस पर अंकुश लगाए। यहां पर एक सशक्त आंतरिक समिति गठित होनी चाहिए, जिससे किसी लड़की को लगे कि उसके साथ अगर दुर्व्यवहार हो तो वह वहां जाकर इंसाफ की मांग करे। अगर ऐसी आंतरिक समिति होगी, तो किसी को अपने साथ हुए अन्याय के खिलाफ अर्द्धनग्न होकर आवाज नहीं उठानी पड़ेगी। आंतरिक समिति गठिन होने की वजह से निरंतर शिकायतें आ रही हैं और इसका नतीजा यह हुआ है कि अब इस मामले में जागरूता आ रही है।
आर्येंद्र उपाध्याय : इंटरनेट के जमाने में अब तो शायद बालिग और नाबालिग का मसला ही नहीं रह गया है।
’इसलिए तो मैंने कहा कि अब सेंसर बोर्ड की कोई आवश्यकता नहीं है। अमेरिका में सेंसर बोर्ड नहीं है। कई देशों में नहीं है। वहां पर वालेंट्री सेंसर बोर्ड है। ब्रिटेन में प्राइवेट सेंसर बोर्ड है। पर हमारे यहां है और उसके प्रमाण-पत्र से फिल्म की मार्केटिंग बनती-बिगड़ती है। इसलिए फिल्मों के कई निर्माता-निर्देशक चाहते हैं कि उनकी फिल्म दूरदर्शन पर भी चल जाए और इंटरनेट पर भी बाजार बना ले। इसलिए इसके जरिए खेल भी होता है।

पारुल शर्मा : आपने टीवी और फिल्म दोनों में काम किया है। इनमें से कौन आपके दिल के नजदीक है?
’मुझे अभिनय करना पसंद है, इसलिए वही मेरे दिल के नजदीक है। फिल्म करना मुझे इसलिए अच्छा लगता है कि उसका अस्तित्व ज्यादा लंबा है। धारावाहिक तो एक तरह से पटाखे जैसा होता है, उसे लोग देखते हैं और वह खत्म हो जाता है। मगर फिल्में आती रहती हैं लगातार, इसलिए आपकी स्मृति उससे जुड़ी रहती है। मुझे टेलीविजन की तुलना में फिल्म करना इसलिए भी ज्यादा अच्छा लगता है कि धारावाहिक में दिन-रात काम करना पड़ता है, फिल्म में ऐसा नहीं होता।

राजेंद्र राजन : फिल्म के अलावा और किन चीजों में आपकी रुचि है?
’मैं एनरॉन, एस्सार, रिलायंस जैसी बड़ी-बड़ी कंपनियों में कार्यकारी अधिकारी रह चुका हूं। जब मैं मुंबई में था तो वहां फिल्म के लोगों से मुलाकातें होती रहती थीं। उन दिन एनरॉन सुर्खियों में था, तो टीवी पर मुझसे बहुत बातचीत हुआ करती थी। तभी मधुर भंडारकर ‘पेज थ्री’ बनाने के बारे में सोच रहे थे। उनसे मुलाकात हुई तो उन्होंने मुझसे पूछा कि फिल्म में काम करेंगे? तो मैंने हां कर दी। तबसे फिल्में कर रहा हूं। वैसे मुझे गाने में भी रुचि है। एक-दो फिल्मों में गाने भी गाए हैं। वक्ता भी हूं। कई सभाओं में भाषण देने जाता हूं। जेएनयू में छात्र नेता भी रह चुका हूं। मैं कम्युनिस्ट कभी नहीं रहा, पर इन दिनों मेरी सोच मार्क्सवाद की ओर जा रही है।

मुकेश भारद्वाज : क्या आपको लगता है कि देश की वर्तमान परिस्थितियों में मार्क्सवाद प्रासंगिक है?
’हां, यह प्रासंगिक है। बहुत प्रासंगिक है। अब लोग सकल घरेलू उत्पाद की बात करते हैं। बड़े खुश होते हैं कि हम सात फीसद, आठ फीसद पर चल रहे हैं। लेकिन अमर्त्य सेन ने जिस ह्यूमन इंडेक्स- मानव सूचकांक- की बात की थी, उस पर ध्यान नहीं दिया जाता। जब नब्बे फीसद लोग गरीब हैं, जिनके पास रोटी, कपड़ा, मकान तक मुहैया नहीं है, उसमें आप कैसे कह सकते हैं कि जीडीपी देश की बेहतर अर्थव्यवस्था का मानक है? जहां लोगों के पास पीने तक का पानी नहीं है, वहां आप मानव विकास सूचकांक की बात क्यों नहीं करते? आप उस आधार पर क्यों नहीं देखते कि देश की अर्थव्यवस्था किस स्तर पर चल रही है। मुश्किल से तीन फीसद लोग देश की पचासी फीसद समृद्धि का लाभ उठा रहे हैं। तो यह सामाजिक दृष्टि से कहां तक उचित है? मैं समझता हूं कि मार्क्स ने इस चीज को सोचा था कि जो कुछ खिलाड़ी लोग हैं, वे सबका शोषण करेंगे।

दीपक रस्तोगी : हमारे यहां जैसा सामाजिक ताना-बाना है, उसमें सेंसर बोर्ड की जरूरत को पूरी तरह दरकिनार नहीं किया जा सकता? पर उसमें राजनीतिक प्रभाव से नियुक्तियों की वजह से गड़बड़ी पैदा होती है। इन दोनों में संतुलन कैसे बनाया जा सकता है?
’मुझे लगता है, फिल्मों में दखलंदाजी जितनी कम हो, रचनात्मकता की दृष्टि से वह उतना ही अच्छा है। अभी बहुत ज्यादा दखलंदाजी है। उड़ता पंजाब जैसी फिल्म, जिसमें कहीं कोई अश्लीलता नहीं है, उसे मंजूरी के लिए हाई कोर्ट, सुप्रीम कोर्ट तक जाना पड़ा। इसी तरह प्रकाश झा को आरक्षण फिल्म के लिए सुप्रीम कोर्ट तक जाना पड़ा। फिर ‘पद्मावत’ को लेकर विवाद हुआ। तो, इस तरह के हस्तक्षेप से रचनात्मक समाज को बहुत धक्का पहुंचता है। अवचेतन स्तर पर वे लोग भयभीत हो जाते हैं। बॉलीवुड एक छोटी-सी इंडस्ट्री है। भले उसका प्रभाव व्यापक हो, पर एक राजनेता के आगे वहां के लोगों की सामर्थ्य कुछ भी नहीं है। एक चलता हुआ राजनीतिक कार्यकर्ता कह दे कि यह फिल्म यहां नहीं चलेगी, तो थिएटर वाले की हिम्मत नहीं है कि वह उस फिल्म को रिलीज कर दे। तो, ऐसे भय के माहौल में फिल्म वालों से आप कहें कि एक अच्छी फिल्म बनाओ, तो वह कैसे बनाएगा। वह तो हर समय इसी को लेकर सोचता रहेगा कि इसका समाज पर क्या प्रभाव पड़ेगा, राजनीति पर क्या पड़ेगा। इन हस्तक्षेपों का ही असर है कि हम हॉलीवुड जैसी फिल्में नहीं बना पा रहे हैं।

मृणाल वल्लरी : आज जिस तरह इंटरनेट और थिएटर के बीच टकराव की स्थिति है, उसे देखते हुए क्या सिनेमाघरों का अंत माना जाए?
’देखिए, आज बाजार पर आधारित अर्थव्यवस्था है। आप कहते हैं कि बाजार की शक्तियों को तय करने दीजिए। तो इसमें नेटफ्लिक्स और अमेजन जैसी कंपनियां तो तय करेंगी न! आज लोग थिएटर में फिल्में देखने नहीं जा रहे, क्योंकि वहां जाकर उन्हें अधिक खर्च करना पड़ता है। टिकट महंगे हैं, फिर थिएटर तक आने जाने में जो समय और खर्च आता है, वह अलग। अब स्मार्ट टीवी, स्मार्ट फोन आ गए हैं। आपको जो भी देखना है, उस पर उपलब्ध है। तो वे क्यों जाएं थिएटर में इतना पैसा खर्च करके फिल्म देखने। फिर नेटफ्लिक्स पर कभी वैसा विवाद या राजनीति भी नहीं होती जैसी थिएटर को लेकर होती है। तो, निर्माता-निर्देशक भी उस तरफ रुख कर रहे हैं। इसलिए हमें बहुत तथ्यपरक होकर इस बारे में सोचने की जरूरत है।
अजय पांडेय : बॉलीवुड और अंडरवर्ल्ड के रिश्तों को लेकर भी बात उठती रहती है। उसमें कितनी सच्चाई है?
’यह उस समय तक तो कुछ हद तक माना भी जा सकता है, जब कालेधन का बहुत बोलबाला था। लेकिन अब वह जमाना निकल गया। अब फिल्में बनाने के लिए बहुत सारे बैंक आसानी से कर्ज दे देते हैं। इसलिए वहां सारा साफ-सुथरा पैसा आने लगा है। निर्माता-निर्देशक भी अब जो कुछ लेन-देन करते हैं, चेक के जरिए करते हैं। इसलिए अंडरवर्ल्ड की उसमें घुसपैठ अब नहीं है।

मृणाल वल्लरी : आज बहुत-सी फिल्में खास राजनीतिक धारा के हिसाब से बन रही हैं, इसे कैसे देखते हैं?
’प्रत्यक्ष तौर पर तो ऐसा नहीं कहा जा सकता। हर तरह के विचारों की फिल्में बन रही हैं, मुसलिम समाज को लेकर भी बन रही हैं, हिंदू समाज को लेकर भी बन रही हैं। हो सकता है उसमें से कुछ के पीछे राजनीतिक प्रेरणा हो।
पारुल शर्मा : फिल्मों में बैनर का बड़ा योगदान होता है। अगर आपको मधुर भंडारकर के अलावा किसी और के साथ काम करना पड़े, तो उससे आपकी छवि पर क्या असर पड़ेगा?
’बैनर का बहुत असर पड़ता है। जैसे यशराज बैनर के साथ काम करते हैं तो आधी पब्लिसिटी तो वैसे ही हो जाती है। मधुर भंडारकर भी बहुत चर्चित हैं। हालांकि मैंने और भी लोगों के साथ काम किया है। अनिल शर्मा, विक्रम भट्ट, तिग्मांशु धूलिया आदि के साथ काम किया है। बड़े बैनर के साथ काम करने का एक फायदा यह भी होता है कि उस फिल्म का प्रसार व्यापक हो जाता है।

आरुष चोपड़ा : आमिर खान ने देश के माहौल पर बयान दिया था तो उन्हें काफी परेशानी का सामना करना पड़ा था। इस प्रवृत्ति को आप कैसे देखते हैं?
’देखिए, आमिर खान की उस बात को ठीक से समझा नहीं गया। मुझे लगता है कि आमिर खान की राष्ट्रीयता पर शक करना एक राष्ट्रीय चरित्र पर बुनियादी प्रश्नचिह्न लगाना है। आमिर खान का पूरा चरित्र तो देखिए, जिसमें उनकी राष्ट्रीयता पर प्रश्नचिह्न लगता हो। उन्होंने कहा कि मेरी पत्नी डरी हुई हैं और उसे लेकर इतना बड़ा बवाल मच गया! सच्चाई कहना अगर राजनीतिक दृष्टि से ठीक नहीं लगता, तो लोग इस तरह बवाल मचा ही देते हैं। मुझे लगता है कि सब लोगों को मिल कर सच का माहौल बनाना चाहिए, नहीं तो बस झूठ ही झूठ रह जाएगा।

सूर्यनाथ सिंह : फिल्म उद्योग के लोग अगर किसी मुद्दे पर आवाज उठाते हैं, तो उस पर गंभीरता से ध्यान दिया जाता है, मगर क्या वजह है कि बहुत सारे मुद्दों पर वहां से कोई सशक्त आवाज नहीं उठ पाती?
’मैं आपकी बात से इत्तेफाक रखता भी हूं और नहीं भी रखता। अभी फिल्म पुरस्कारों के समय राष्ट्रपति महोदय के हाथों पुरस्कार न दिए जाने पर लोगों ने एकजुटता दिखाई, आवाज उठाई। उसका व्यापक संदेश गया। मगर आपकी बात सही है कि आवाज जितनी उठनी चाहिए, उतनी नहीं उठती। आवाज में धीमापन है, फिल्म उद्योग के अंदर एकजुटता नहीं है। खंडित एकजुटता है। वे भी राजनीतिक रूप से गुणा-भाग करके चलते हैं। इस वजह से फिल्म उद्योग को नुकसान हो रहा है।

अरविंद शेष : आजकल फिल्मों में गालियों का चलन बढ़ रहा है। क्या ‘पान सिंह तोमर’ की तरह बिना गालियों के बात नहीं कही जा सकती है?
’शेखर कपूर ने बैंडिट क्वीन बनाई तो उसमें गालियों का बहुत ज्यादा इस्तेमाल किया गया था। उस कारण फिल्म पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। अभी जो फिल्में बन रही हैं उनमें गालियों का खूब इस्तेमाल हो रहा है। खासकर जब फिल्म में महिला चरित्र गाली दे रही हों, तो उसका बाजार और बढ़ जाता है। उससे मनोवैज्ञानिक सुख मिलता है। मगर मेरा मानना है कि गालियों का समाज में जितना कम से कम इस्तेमाल करें, उतना ही अच्छा है। इसलिए फिल्म उद्योग को इस पर सोचना चाहिए कि गालियों के बल पर ही अगर वे फिल्म को चलाना चाहते हैं तो वह कहां तक उचित है। जहां गालियों का इस्तेमाल अपरिहार्य हो, वहां पर बेशक कीजिए।

सूर्यनाथ सिंह : क्या अब समांतर सिनेमा जैसे आंदोलनों की संभावना खत्म हो गई है?
’समांतर सिनेमा बहुत जरूरी है। सिनेमा का समाज पर प्रभाव बहुत गहरा पड़ता है। समांतर सिनेमा बनना इसलिए जरूरी है कि यह जो आइटम नंबर वगैरह डाल कर महज इंद्रियों के आनंद का संसार रचा जा रहा है उससे अलगाव की प्रवृत्ति बढ़ रही है। समाज में डिजनरेशन हो रहा है। आज के बच्चों को महात्मा गांधी के बारे में ठीक से नहीं पता, पर सिनेमा और क्रिकेट से जुड़े लोगों के बारे में सब कुछ पता है। इसलिए समांतर सिनेमा जरूरी है। मगर इसके लिए सरकार को भी सहयोग करना पड़ेगा। इसके लिए सरकारी आॅडिटोरियम होने चाहिए, जिनमें मुफ्त में ऐसी फिल्में दिखाई जाएं। या बहुत कम कीमत की टिकट रखी जाए। इसके लिए स्वयंसेवी संगठनों और दूसरे दबाव समूहों को भी साथ मिल कर सहयोग करना चाहिए। अगर ऐसी फिल्म बनाने में कही आर्थिक संकट खड़ा होता है, तो उसे सहयोग मिलना चाहिए। मुझे लगता है कि सरकार के पास ऐसी फिल्मों के लिए कुछ बजट का प्रावधान भी होना चाहिए। अगर किसी फिल्म से समाज में बदलाव आ सकता है, समाज को आगे बढ़ने में मदद मिलती है या बच्चों को कुछ सीख मिलती है, तो ऐसी फिल्में आनी चाहिए। ऐसा नहीं कि लोगों को ऐसी फिल्में बनाने का विचार नहीं आता, पर प्रोत्साहन न मिल पाने की वजह से वे फिल्में बना नहीं पाते। जब तक इसे लेकर स्पष्ट नीतियां नहीं बनेंगी, तब तक समांतर फिल्में बनेंगी ही नहीं।
प्रस्तुति: सूर्यनाथ सिंह / मृणाल वल्लरी

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