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किताबें मिलीं – बुद्ध को बीते बरस बीते

इन कथानकों के केंद्र में ईमानदाराना कशमकश और संबंधों का भावनाजनित संसार साथ-साथ चलता है। सभी कहानियां लगभग दो विपरीत ध्रुवों के बीच एक किस्म की समन्वयता रखते हुए समानांतर रूप से आगे बढ़ती हैं और कथ्य के प्रति अनूठा न्याय बरतती हैं।

Author February 11, 2018 5:38 AM
बुद्ध को बीते बरस बीते किताब का कवर पेज।

बुद्ध को बीते बरस बीते

राजकुमार कुंभज की कविताएं पढ़ते हुए अंग्रेजी कवि कीट्स का लोकप्रिय कथन याद आ जाता है कि ‘कविता को जीवन में इस सहजता से फूटना चाहिए जैसे पेड़ से कोंपलें फूटती हैं।’ उनकी कविताएं मनुष्य की सांस की तरह सहज हैं, जो जीवन के लिए बेहद जरूरी है। कविता में सहजता और सादगी एक लंबी कला साधना का परिणाम होती है। यकीनन इस साधना को राजकुमार कुंभज ने अर्जित किया है- बहुत कुशलता से, बहुत बारीकी से, इसीलिए वे अपनी कविताओं में जीवन के प्रति अटूट आस्था का स्वर मुखरित करते हुए कहते हैं : ‘तरबूज को छील कर देखो/ जितना हरा है वह बाहर/ उससे कहीं ज्यादा लाल है भीतर/ और पेट में पाले हुए बीज अपार/ तलाश करो, तलाश करो, उस मिट्टी को/ जिसमें अपार क्षमताएं हों गर्भ धारण की/ बुद्ध को बीते बरस बीते।’
राजकुमार कुंभज की कविताओं में सहज मानवीय संवेदना झिलमिलाती नजर आती है। अपनी इन कविताओं में वे जीवन के मर्म तलाश करते हुए दिखाई देते हैं और अपनी कविताओं की संवेदना को अन्याय के खिलाफ और मेहनत के पक्ष में ले जाते हैं।… उनकी कविताएं पढ़ते हुए यह अहसास ही नहीं होता कि वह किस भाषा या किस शिल्प में कविता को ढाल रहे हैं। भाषा एक जीवंत बिंब का निर्माण इस तरह करती है कि कविता का बिंब पाठक की संवेदना को गहरे जाकर प्रभावित करता है।

वे बहुत जानी पहचानी स्थितियों को भी कुछ इस तरह पेश कर देते हैं कि पढ़ते हुए चौंकना स्वाभाविक है। भला पीड़ा का अनुवाद करने के बारे में किसने सोचा होगा, पर कुंभज की नजर वहीं जाती है और वे बड़े सहज भाव से कह देते हैं : ‘जितना सह सकते हैं/ सचमुच उतना उतना सहें/ और जो कह नहीं सकते हैं/ वह कभी भी, किसी से भी, कहीं भी, नहीं कहें/ सच्चे दर्द की सच्ची शर्त यही है/ और ये बात उसने कही है/ जिसने अपरंपार पीड़ा सही है/ सच कहूं तो शायद सच यही है/ कि पीड़ा का कोई अनुवाद नहीं है/ सिर्फ वही एक सगी है।’

बुद्ध को बीते बरस बीते : राजकुमार कुंभज; प्रकाशन संस्थान, 4268-बी/3, अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली; 150 रुपए।

ब्ल्यूचिप की अंधेरी तह

इला कुमार की कहानियां अपनी सुदृढ़ भाषा और जीवंत विवरणों के साथ बड़ी सहजता से ऐसे लोक में ले जाती हैं, जहां एक ओर मानवीय संवेगों के सुदृढ़ भित्ति चित्र हैं और दूसरी ओर निर्मम प्रशासनिक आचार के कठोर बिंब। इन कथानकों के केंद्र में ईमानदाराना कशमकश और संबंधों का भावनाजनित संसार साथ-साथ चलता है। सभी कहानियां लगभग दो विपरीत ध्रुवों के बीच एक किस्म की समन्वयता रखते हुए समानांतर रूप से आगे बढ़ती हैं और कथ्य के प्रति अनूठा न्याय बरतती हैं। इला कुमार की कहानियों को पढ़ना एक किस्म के प्रबुद्ध विचार के साथ आगे बढ़ना है, जहां आसपास स्थिति रोजमर्रा के साधारण दृश्यों में अंतर्निहित सौंदर्य अनजाने ही अपने पट खोल कर सामने आ खड़ा होता है। लेखिका की कलम की वक्र दृष्टि में किसी भी परिवेश में निहित सुंदरता को ताड़ कर उसे मूर्त बना देने की कारीगरी आश्चर्य जगाने के साथ मोहित करती है। सभी पन्नों पर अनोखे उपमा-उपमान निर्बाध रूप से प्रवाहित हैं, जिनमें बोझिलता नहीं है, बल्कि पाठक-मन को बांध लेने का कौशल है। इस संग्रह में कुल चौदह कहानियां संकलित हैं।

ब्ल्यूचिप की अंधेरी तह : इला कुमार; अनामिका पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर्स (प्रा.) लिमिटेड, 4697/3, 21 ए, अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली; 400 रुपए।

बामियान में बुद्ध

राजेंद्र राजन की कविताएं अपनी अभिव्यक्ति, भाषा, बनावट ही नहीं, कविता में निरंतर सक्रिय गहरी अंतर्दृष्टि और सामाजिक-मानवीय सरोकारों के कारण अपनी ओर जोरों से ध्यान खींचती हैं। कभी ब्रेख्त, कभी रोजेविच, कभी जगायेव्स्की और कभी निकोनार पारा और कभी विजयदेव नारायण साही, धूमिल और मुक्तिबोध की प्रज्ञा की याद दिलातीं ये कविताएं हमारे समय की जरूरी और कीमती सूचनाएं हैं। इन कविताओं में शब्दों की किफायत और किसी वैज्ञानिक जैसी, धातु-सी ठंडी वस्तुपरकता हिंदी कविता में भाषा के फिजूलखर्च और बड़बोले कवियों के सामने एक चुनौती की तरह हैं। इन कविताओं में हमारे समय की सबसे बेचैन और ईमानदार आवाजें हैं। कविता की अब तक की समूची स्मृति, संवेदना और समझ के साथ कह सकता हूं कि वे इस समय के सबसे जरूरी, मूल्यवान कवि हैं। एक गहरी लोकसंपृक्ति, मुक्तिबोध के शब्दों में ‘आत्मचेतस’ भी और ‘विश्वचेतस’ भी। दावे के साथ कहा जा सकता है कि राजेंद्र राजन की कई कविताएं हमारे समय और यथार्थ की उन अव्यक्त या दमित आवाजों को व्यक्त करती हैं जो सत्ताओं की चाकरी में हाकिमों की पिटी-पिटाई, बासी क्लीशेड भाषिक पुनरुक्तियों को कविता मनवाने के लिए संस्थानों और राजनीतिक लेखक संगठनों का सहारा लेती हैं और उनके असहमति रखने वाले लेखक को हर तरह से समाप्त करने का खेल खेलती हैं। सच तो यह है कि ये कविताएं अमूल्य हैं। इसका अंदाजा इस कविता से लगाया जा सकता है: ‘हर राह पर/ जैसे ही बढ़ने लगते हैं वे/ उन्हें सताने लगता है भय/ कहीं निकल न जाए कोई उनसे आगे/ फिर रुक जाते हैं वे बीच राह में/ देखना बंद कर देते हैं आगे/ देखने लगते हैं पीछे या दाएं-बाएं/ और दूसरों के लिए/ बाधाएं खड़ी करने में जुट जाते हैं/ भूल जाते हैं कहां जाना था उन्हें/ हर राह में मिलेंगे वे बहुतायत में/ दूसरों की राह रोकने की कोशिश में/ लहूलुहान।’

बामियान में बुद्ध : राजेंद्र राजन; साहित्य भंडार, 50 चाहचंद (जीरो रोड), इलाहाबाद; 250 रुपए।

इति दुविधा कथा
ओड़िया कथाकार प्रीतीश आचार्य की कहानियों में ओड़िया जीवन और समाज का अपनी खुसूसियत के साथ मौजूद होना लाजिम है। लेकिन उनकी कहानियों में जिस मध्यवर्ग से हमारा परिचय होता है वह किसी एक भाषा-समाज में बंधे होने के बजाय वृहत्तर भारतीय मध्यवर्ग का अंग है और अपनी वासना, क्षुद्रता, कुंठा के साथ समस्त आचार-विचार में समारधर्मा है। इस कथा-संसार में कुछ निराले चरित्र हैं, जिन्हें हमारी सफलताकामी दृष्टि तुच्छ और हेय मानती है, लेकिन जिनका वजूद बेरंग होती दुनिया में कुछ रंग भरता है। इन कहानियों के जरिए दारिद्र्य का जो रूप हमारे सामने प्रकट होता है, उसके पीछे लिजलिजी भावुकता और दया-भावशाली लेखकीय निगाह नहीं, बल्कि यह जानना है कि वहां जीवन का मतलब यंत्रणा निगलते जाना है। यह सब सुनाते-बताते हुए कथाकार लगातार अपने को कठघरे में रखता, खुद का मजाक उड़ाता, अपने आत्म की परीक्षा करता चलता है, जिस परीक्षा में पास-फेल का प्रावधान नहीं, उसमें से गुजरना ही महती होता है।

इति दुविधा कथा : प्रीतीश आचार्य; रोशनाई प्रकाशन, 212 सीएल/ए, अशोक मित्र रोड, कांचरापाड़ा, उत्तर 24 परगना, पश्चिम बंगाल; 100 रुपए।

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