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किताबें मिलीं: कविता का शहर, समकालीन हिंदी पत्रकारिता और कहीं कुछ नहीं

‘खामोशी और कोलाहल के बीच की किसी जगह पर वह कहीं खड़ा है और इस खेल का मजा ले रहा है। क्या सचमुच खामोशी और कोलाहल के बीच कोई स्पेस था, जहां वह खड़ा था।’ ये पंक्तियां बहुचर्चित कथाकार शशिभूषण द्विवेदी की कहानी ‘काला गुलाब’ से हैं।

Author April 22, 2018 6:07 AM
समकालीन हिंदी पत्रकारिता बुक का कवर पेज।

कविता का शहर

कविता का नगर चाहे बहुत भिन्न हो, उसमें कल्पना का तत्त्व बहुत अधिक या कम हो, लेकिन बाहर स्थित नगर से उसकी शक्ल थोड़ी-बहुत तो मिलती है। पर हर बार कवि की शक्ल को वास्तविक नगर की शक्ल से मिला-जुला कर देखने की कवायद फिजूल है। कई बार कवियों को भी यह भ्रम हो जाता है कि वे अपनी कविता में वास्तविक शहर के यथार्थ को समेट रहे हैं। उन्हें लगता है कि वे कविता में शब्दों से वही शहर बना सकते हैं जो वास्तविक शहर है। लेकिन दोनों के निर्माण में लगने वाली सामग्री ही भिन्न है। जब भी वास्तविक शहर शब्दों में रूपांतरित होता है, उसका चेहरा-मोहरा वही नहीं रहता, जो उसका वास्तविक चेहरा है। यह शहर का पुनर्रचित चेहरा है। यह कविता का नगर है। लेकिन खुद को बसाना या बनाना भी कोई आसान काम नहीं है। खुद के भवनों, सड़कों, गलियों, नदियों और सरोवरों को बनाने के लिए एक कवि को भी जाने कितने शब्द, कितने वाक्य, बिंब, प्रतीक, छंद, लय, मिथक-कथाओं और कल्पनाओं की जरूरत होती है। कवि का श्रम किसी वास्तुशिल्पी या नगरशिल्पी से किसी बात में कम नहीं होता। कवि राजेश जोशी की यह किताब आपको वास्तविक नगर की भीड़ और शोर से निकाल कर कविता के नगर की भीड़ और शोर के बीच लिए चलती है।
कविता का शहर, एक कवि की नोटबुक: राजेश जोशी, राजकमल प्रकाशन, 1-बी, नेताजी सुभाष मार्ग, दरियागंज, नई दिल्ली; 295 रुपए।

समकालीन हिंदी पत्रकारिता

यह विजयदत्त श्रीधर की एक अनिवार्य प्रस्तुति है। यहां हिंदी पत्रकारिता के कल, आज और कल से उसके आचार-व्यवहार, बाजार की पत्रकारिता बनाम पत्रकारिता का बाजार, सांस्कृतिक पत्रकारिता, संपादक का पन्ना, दिल्ली की हिंदी पत्रकारिता, पूर्व भारत की हिंदी पत्रकारिता, दक्षिण, पश्चिम और उत्तर भारत की हिंदी पत्रकारिता के साथ-साथ उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश की पत्रकारिता पर भी सक्रिय और गंभीर पत्रकारों के विवेचनात्मक आलेख लिए गए हैं। नए समय के संवाद के रूप में सोशल मीडिया पर भी विचार किया गया है। कहना जरूरी है कि एक साथ इतने संजीदा पत्रकारों के सामूहिक प्रयास के कारण ‘समकालीन हिंदी पत्रकारिता’ अपने समय का एक आईना बन गई है।
जबसे पत्रकारिता की पढ़ाई शुरू हुई है, पत्रकारिता के विभिन्न पक्षों को लेकर किताबों का प्रकाशन बड़े जोर-शोर से होने लगा है। पर पत्रकारिता को महज सिद्धांतों के जरिए नहीं समझा जा सकता। उसके लिए पत्रकारों के अनुभवों और उनकी कार्यशैली से बहुत कुछ सीखने की जरूरत होती है। यह किताब न सिर्फ पत्रकारिता के सिद्धांतों पर केंद्रित है, बल्कि पत्रकारिता के अनुभवों को भी पेश करती है, इसलिए इसका महत्त्व सैद्धांतिक किताबों से अधिक हो जाता है।
समकालीन हिंदी पत्रकारिता: संपादक विजयदत्त श्रीधर, सामयिक प्रकाशन, 3320-21, जटवाड़ा, नेताजी सुभाष मार्ग, दरियागंज, नई दिल्ली; 495 रुपए।

कहीं कुछ नहीं

‘खामोशी और कोलाहल के बीच की किसी जगह पर वह कहीं खड़ा है और इस खेल का मजा ले रहा है। क्या सचमुच खामोशी और कोलाहल के बीच कोई स्पेस था, जहां वह खड़ा था।’ ये पंक्तियां बहुचर्चित कथाकार शशिभूषण द्विवेदी की कहानी ‘काला गुलाब’ से हैं। ये ‘काला गुलाब’ जैसी जटिल संवेदना और संरचना की कहानी को ‘डिकोड’ करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। लेकिन उसके लेखक शशिभूषण द्विवेदी की रचनाशीलता को समझने का सूत्र भी उपलब्ध कराती हैं। वाकई शशिभूषण की कहानियां न तो यथार्थवाद और जीवन का शोर मचाती हैं, न ही वे कला की चुप्पियां चुनती हैं। शशिभूषण इन दोनों के बीच हैं और खामोशी के साथ जीवन के यथार्थ की चहल-पहल, उसकी रंग-बिरंगी छवियों को पकड़ते हैं। साथ ही वे जीवन के कोलाहल के बीच भी उसकी अदृश्य रेखाओं की खोज करते हैं- उसकी चुप ध्वनियों को सुनते हैं। ‘काला गुलाब’ से ही एक अन्य उदाहरण- ‘लिखना आसान होता है। लिखते हुए रुक जाना मुश्किल। इसी मुश्किल में शायद जिंदगी का रहस्य है।’ लिखते-लिखते रुक जाने की मुश्किल उन्हीं रचनाकारों के सामने दरपेश होती है जो खामोशी की आवाज सुनते हैं और कोलाहल की खामोशी भी महसूस करते हैं। लेखक के लिए यह एक कठिन सिद्धि है, लेकिन सुखद है कि शशिभूषण इसे हासिल करते हुए दिखते हैं।
कहीं कुछ नहीं: शशिभूषण द्विवेदी, राजकमल प्रकाशन, 1-बी, नेताजी सुभाष मार्ग, दरियागंज, नई दिल्ली; 295 रुपए।

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