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पुस्तकायन : नैतिक उजास का मंजर

मदन कश्यप का पांचवां कविता संग्रह है- अपना ही देश। इसमें चालीस कविताएं हैं। ये सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक बेचैनी से उपजी कविताएं हैं, जो संवेदन तंत्र को आंदोलित करती हैं..

Author नई दिल्ली | December 20, 2015 12:05 AM

मदन कश्यप का पांचवां कविता संग्रह है- अपना ही देश। इसमें चालीस कविताएं हैं। ये सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक बेचैनी से उपजी कविताएं हैं, जो संवेदन तंत्र को आंदोलित करती हैं। इनमें वैयक्तिकता के लिए जगह बहुत कम है। जबकि आज का समय वैयक्तिकता का है। वे अनुभव का ऐसा लोक निर्मित करते हैं, जिसका यथार्थ वास्तविक और स्पष्ट रूप से साफ-सुथरा दिखाई देता है, सृष्टि के उजास, धूप और बारिश की तरह सब कुछ दृश्यमान।

इस संग्रह में ‘पुरखों का दुख’, ‘बड़ी होती बेटी’, ‘हवाई थैली’, ‘हलफनामा’ और ‘उदासी के बीच’ कविताएं थोड़ी-सी वैयक्तिक परिधि को छूती हैं। बाकी का बड़ा हिस्सा समाज और राजनीति का यथार्थ है। मदन कश्यप सामाजिक संरचना में विकसित ताकत की हिंसा की व्याप्ति और उसके शिकार बच्चे, स्त्री, दलित, आदिवासी और अल्पसंख्यकों की पीड़ा को समझते हैं और उसे प्रतिरोधी सर्जनात्मक व्याप्ति देते हैं।

‘अपना ही देश’ की कविताएं एक ऐसे लोकतांत्रिक समाज की रचनात्मकता है, जिसमें पारंपरिक व्यवस्थाजनित समाज की विसंगतियों का समकालीन यथार्थ है। ‘बड़ी होती बेटी’ इस संग्रह की श्रेष्ठ कविताओं में एक है। सामाजिक मूल्यों, मान्यताओं और लोकाचारों के भेदभावों/ पक्षपातों के मध्य ही बेटी बड़ी होती है। उसकी चिंता स्वाभाविक है: ‘मां की करुणा के भीतर फूट रही है बेचैनी/ पिता की चट््टानी छाती में/ दिखने लगे हैं दरकने के निशान/ बड़ी हो रही है बेटी!’ बेटे की तरह बेटी भी एक जैविक मानवीय अस्तित्व है। फिर भी बेटियों के लिए ही प्रतिकूल और पक्षपातपूर्ण सामाजिक स्थितियां और ग्रंथियां हैं, जिससे वे यातनाग्रस्त हैं। कवि की बेटी के प्रति चिंता और मानवीय संवेदनशीलता समाज के पक्षपातपूर्ण रवैयों से ही उपजी है, जो एक मानवीय जीवन को अपनी सर्जनात्मकता की अभेदमूलकता से ‘एप्रोप्रिएट’ करता है।

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इसी क्रम में ‘छोटी लड़की’ के सपने और उसकी जरूरतें हैं। वह छोटे शहर के परिवार से बड़े शहर में आकर अपनी उस सीमित उपस्थिति का विस्तार करती है। बहुत सारी लड़कियों/ स्त्रियों के लिए बंद सामाजिक ‘बज्र किवाड़’ अब भी नहीं खुला है। यह पारंपरिक सामाजिक संरचना की भेद-मूलकता से उपजी बेबसी है, जहां से ये मानवीय पुकारें टकरा-टकरा कर लौट आती हैं। काल की आंधी भी इस बज्र किवाड़ को नहीं हिला सकी है, जैसे मनुष्यता यहां बंद हो! मदन कश्यप इसे खोलने की उम्मीदों को बनाए रखते हैं।

मदन कश्यप की कविता अपनी संवेदना, विचार और नैतिक पारदर्शिता में ही व्याख्यायित होती हैं। ‘हलफनामा’ और ‘उदासी के बीच’ ऐसी ही कविताएं हैं, जो पौरुषता, अहंकार और ताकत की क्रूरता के सहज स्वीकार के बावजूद उनसे मुक्त निश्छल प्रेम है- ‘तुम्हारी संवेदना, ममता और भावना की/ छांव और फैलाव को तो पहले स्वीकार कर लिया था/ तपते मरुथल में तड़पते पांव की तरह मेरा बेचैन मन/ सदा तुम्हारे संवेगों के सुकुमार स्पर्शों का भूखा था/ पहाड़ी नदी सा उछलता-कूदता मेरा पौरुष भी/ कहां कर पाता था पार/ पृथ्वी से शांत तुम्हारे स्थिर तुम्हारे स्त्रीत्व को/ हर बार बिला जाता था अतृप्ति की रेत में/ बस केवल ताकत के खेल में मैं तुम पर भारी था/ और ताकत भी क्या/ एक क्रूरता थी, जो ताकतवर दिखती थी।’ संस्कृति और जीवन में जो कुछ भी श्रेष्ठ है, उसमें मूल्यों, भावों और विचारों की संवेदनशीलता का योग है, पर ताकत की क्रूरता इसे नष्ट कर जीवन में एक निरीहता और उदासी को रोप देती है।

‘उदासी के बीच’ कविता बदल रही दुनिया के प्रेम की सच्चाई है और यह पिछले प्रेम की सच्चाई से कितनी अलग है, जो अनपेक्षित, असहज और असहाय दिखती है: ‘साठ के दशक के फिल्मी गीतों के सहारे/ भला कब तक टिका रहता हमारा प्यार/ हम इश्क के लिए दुनिया बदलना चाहते थे/ और इधर इश्क की ही दुनिया बदल गई।’

‘बिजूका’, ‘करीम भाई’, ‘बहुरूपिया’, ‘सड़क किनारे तीन बच्चे’, ‘गांव आदमी और सांप’, ‘मध्यवर्ग का कोरस’ और ‘उदासी का कोरस’ में समाज और जीवन की वास्तविक सच्चाई है और स्मृतियों में जिन बिंबों को रचती है वह हमारे जीवन का उत्कट यथार्थ है। इन्हीं यथार्थ चित्रों के कारण ये कविताएं प्रासंगिक बनी रहेंगी।

इस संग्रह की कविताएं जिस यथार्थ से निर्मित हैं उसे वे बिना किसी लाग-लपेट और भाषिक जटिलता के सीधे-सादे ढंग से बयान करती हैं। यथार्थ की स्पष्ट और सहज अभिव्यक्ति ही उनकी कविता को विशिष्ट बनाती है। सादगी का शिल्प है। उनकी प्रखर राजनीतिक चेतना संपन्न कविताएं उनकी सरोकारी चिंताओं, विचारों और परिवर्तन के उपक्रमों की ही अभिव्यक्ति हैं। वे समाज के जिन शोषित, वंचित लोगों की तकलीफ और यातना को अपना-सा बना कर प्रस्तुत करते हैं, उसे वे अपने कवि कौशल के माध्यम से प्रामाणिक और सार्वजनिक ही नहीं बनाते, बल्कि हमारे संवेदन में एक ऐसे ‘काव्य तत्त्व और सरोकार’ को रच कर उसे अविस्मरणीय बना देते हैं, जो अपनी निर्मिति में सार्थक और प्रासंगिक बनी रहती है।

इस दृष्टि से निठारी की घटना पर ‘निठारी की बच्ची’, ‘निठारी एक अधूरी कविता’ और राजनीतिक विचार दृष्टि से ‘मेटाफर’, ‘धर्मनिरपेक्ष हत्यारा’, ‘प्रवंचक’, ‘गुबरैले’, ‘हत्यारा रो रहा है’, ‘तानाशाह और जूते’, ‘सुशासन में आपदा’, ‘दिल्ली में गैंडा’, ‘लोकतंत्र का राजकुमार’, ‘आदिवासी’, ‘सलवाजुडूम’, ‘माफीनामा’, ‘अपना देश’, ‘नए युग के सौदागर’ और ‘निंदा से पहले’ आदि महत्त्वपूर्ण कविताएं हैं। इस संग्रह की बहुत-सी अच्छी कविताओं में ‘रंग’ एक है। अपने देश के रंग से इस ‘रंग’ को मिला कर देखें: ‘कुछ ऐसा चल निकला रंगों का खेल/ कि बेरंग जिंदगियों को भी बदरंग करने लगे हैं रंगों के सतरंगे सौदागर/ सादगी को सादगी के साथ अलग किया जा रहा है/ मौसम से/ जीवन से/ काल से/ अब हमारी आकांक्षा/ हमारे संघर्ष/ हमारी करुणा पर/ कालिख नहीं रंग बिरंगे रंग पोते जाते हैं/ हमारे समय के शब्दों ने कुछ इस तरह बदले हैं रंग/ कि खुशी का अर्थ है दुख का रंगीन हो जाना/ विचार का अर्थ है मूर्खता में चमक आ जाना।’

मदन कश्यप के पास न केवल भाषा, विचार और स्वप्न हैं, बल्कि नैतिक साहस, प्रतिरोध और उम्मीद भी है। इस संग्रह की कविताएं अपनी वैचारिक, रचनात्मक, नैतिक स्वप्न (बेहतर दुनिया) के धूप (विचार) की उजास से परिपूर्ण हैं और अनुभव, विचारदृष्टि, भाषा और शिल्प की दृष्टि से बहुत साफ-सुथरी हैं। (दुर्गा प्रसाद गुप्त)

अपना ही देश: मदन कश्यप; किताबघर प्रकाशन, 4855-56/24, अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली; 200 रुपए।

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एक दिन मराकेश

प्रत्यक्षा निजी अनुभूतियों की कहानी कहती हैं। उनके कथानक एब्सट्रेक्ट के निकट चले जाते हैं। पर उस एब्सट्रेक्ट में मनुष्य जीवन के कई रूपक साफ उभरते हैं। उन रूपकों में, उदाहरण के लिए शीर्षक कहानी में, वे सुग्गे से संवाद कर पाती हैं और सुग्गा हिंदी में प्राचीन रूपक है। इस संग्रह की कहानियों के शीर्षक से लेकर कथानक तक एक अलग लहजे की बनक साथ रखते हैं- उनमें उत्तर-आधुनिक संसार के दृश्यबिंब हैं, उनके पात्र ग्लोबल और लोकल हैं, पर वे बहुत घरेलू आवाज में बोलते हैं। इनमें जड़ों की आवाज शामिल है, पर कुनकुनी भावनाओं के भीतर मनुष्य संसार की चहुं ओर दौड़ती आभा भी है, जो दरअसल एक समग्रता की निकट अभिव्यक्ति ज्यादा है। यहां टूटने-बिखरने के आख्यानों में जुड़ने-जुड़े रहने की उत्कट मानवीय इच्छा है।

इस कथा-संसार में एक अबूझ लगने वाले कैनवास से अचानक बहुत जाने-पहचाने आकार सामने आने लगते हैं, तस्वीर खुलने लगती है। वह जीवन सामने आने लगता है, जिसे अलग-अलग रूपाकारों में हम सभी जी रहे होते हैं। मिट््टी में दबे बीज जैसे प्रत्यक्षा के कथानक अपनी लिखत ही नहीं, पढ़त में भी एक आत्मीय गरमाहट और तंग करने वाली उमस की चाह रखते हैं- जैसे जीवन पनपता है, वैसे ही प्रत्यक्षा की कहानी। कथानक के परंपरागत अन्वेषक यहां हार जाएंगे। प्रत्यक्षा की भाषा काव्यात्मक होने के करीब है। इस संग्रह की कहानियां अपने भीतर कविता की आवाज रखती हैं।

एक दिन मराकेश: प्रत्यक्षा; आधार प्रकाशन प्राइवेट लिमिटेड, एससीएफ 267, सेक्टर-16, पंचकूला (हरियाणा); 200 रुपए।

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स्त्री अध्ययन की बुनियाद

इस पुस्तक में स्त्री-विमर्श के शुरुआती इतिहास और विश्व में विभिन्न चरणों में उसका विकास कैसे हुआ, इसका तथ्यात्मक ब्योरा दर्ज किया गया है। अठारहवीं सदी में यूरोप में शुरू हुआ नारीवादी चिंतन कई धाराओं में विकास की मौजूदा स्थिति तक पहुंचा है। उदारवादी नारीवाद समाज के व्यापक सरोकारों को समेट कर चलता है, तो उग्रवादी नारीवादी सामाजिक संरचना में आमूल-चूल परिवर्तन का हिमायती रहा है। इसके साथ मार्क्सवादी तथा अश्वेत नारीवादी धाराएं भी रहीं, और समाजवादी नारीवाद भी देखने में आया। गरज कि उन्नीसवीं और बीसवीं सदी में जो चिंता समूचे विश्व में सबसे व्यापक रही, वह स्त्री की अस्मिता, उसके अधिकारों के इर्द-गिर्द स्थित रही और इसका परिणाम है कि आज कुछ चिंतक इक्कीसवीं सदी को स्त्रियों की सदी कह रहे हैं और नारीवादी विमर्श अलग-अलग समाजों में यौन-राजनीति के अलग-अलग पहलुओं को समझने के लिए जूझ रहा है। यह पुस्तक इस विमर्श के बनने-बढ़ने के इतिहास को जानने-समझने में बेहद सहायक होगी।

स्त्री अध्ययन की बुनियाद: प्रमीला के.पी.; राजकमल प्रकाशन, 1 बी, नेताजी सुभाष मार्ग, दरियागंज, नई दिल्ली; 350 रुपए।

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शून्यकाल में बजता झुनझुना

इस संग्रह में कवि की पिछले दस वर्षों में लिखी कविताओं में से चुनी हुई कुछ कविताएं संकलित है। इस बीच समाज में अनेक उतार-चढ़ाव आए हैं, जिनसे कवि का जीवन भी अछूता नहीं रहा है। बाजार, भ्रष्टाचार और महंगाई में निम्नवर्ग को दुख, पीड़ा और संत्रास से भर दिया है। किसानों की बढ़ती आत्महत्याएं और मजदूरों की छटपटाहट के बीच संवेदनाएं पीछे छूटती जा रही हैं। बाजार के तराजू पर संबंध तौले जा रहे हैं। मनुष्य प्रकृति से दूर होता जा रहा है। बावजूद इसके, कविता अनेक अवरोधों को पार करती हुई निरंतर आगे बढ़ रही है।

कवि प्रकृति को मनुष्य के सबसे करीब मानता है। हमारे चतुर्दिक प्रकृति के सुंदर बिंब बिखरे पड़े हैं। यह हमारी अंतदृष्टि, भाव प्रवणता, संवेदनशीलता और ग्रहण क्षमता पर निर्भर करता है कि हम उससे कब, कितना और कैसा ग्रहण करते हैं। जीवन की विद्रूपताओं के बीच रिश्तों के प्रति आत्मीयता, जल, जंगल और जमीन से गहरा लगाव कवि की इन कविताओं में सहज ही उभर आया है।

शून्यकाल में बजता झुनझुना: रमेश प्रजापति; बोधि प्रकाशन, एफ-77, सेक्टर-9, रोड नं.-11, करतारपुरा इंडस्ट्रियल एरिया, बाईस गोदाम, जयपुर; 100 रुपए।

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