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बारादरी: केदारनाथ सिंह- कविता से क्रांति नहीं आती

नरेंद्र मोदी पर जो लिखा जाएगा, उसे साहित्य नहीं मानूंगा मैं।
साहित्कार केदार नाथ सिंह।

केदारनाथ सिंह क्यों
आज जब बेस्ट सेलर जैसे जुमले के साथ हिंदी साहित्य को तौलने का प्रयास हो रहा है और गंभीर साहित्य पर बाजार का खतरा बताया जा रहा है, इस बारे में बात करने के लिए ज्ञानपीठ विभूषित हिंदी के एक वरिष्ठ कवि और भाषा को लेकर खासे सजग रहने वाले रचनाकार से उपयुक्त व्यक्ति भला कौन हो सकता है!

मनोज मिश्र : पहले कवियों, साहित्यकारों ने आजादी की लड़ाई में हिस्सा लिया, फिर चौहत्तर के आंदोलन में भी उनकी बड़ी भूमिका देखी गई। अब ऐसी क्या वजह है कि उस तरह कवि-लेखक आंदोलनों में नहीं दिखाई देते?
केदारनाथ सिंह : नए लोग नहीं आ रहे हैं, यह सही बात है। आजादी की लड़ाई बहुत सारे लोगों ने मिल कर लड़ी थी। पुराने जाते रहे, नए आते रहे। उसके बाद पार्टियों का बनना शुरू हुआ। फिर लोग अलग-अलग पार्टियों में जगह बनाते गए। वह प्रक्रिया अभी रुकी नहीं है। चल रही है। यह अलग बात है कि हम उसे पसंद करें न करें। लोग पढ़-लिख कर बाहर आते हैं और कोई न कोई दल उन्हें पकड़ लेता है या वे खुद पकड़ लेते हैं। यह प्रक्रिया उस तरह तो नहीं है, क्योंकि तब लोग आजादी की लड़ाई में घुस कर आते थे और जो उस लड़ाई में आता था उसे पहचान लिया जाता था। अब वह प्रक्रिया नहीं है। प्रक्रिया बदल चुकी है। अब वे सीधे दलों में आते हैं, राजनीति में आते हैं। नेता के रूप में उन्हें पहचानने में समय लगता है।
जहां तक साहित्य की बात है, वहां भी प्रक्रिया थोड़ी बदली है। साहित्य अपने आप बनता है, उसके लिए पढ़ाई-लिखाई भी जरूरी नहीं है। फिर अब साहित्य केवल कागज तक सीमित नहीं है। अब दूसरी कई जगहें बन गई हैं और वहां बहुत कुछ लिखा-पढ़ा जा रहा है। मगर दिक्कत क्या है कि हम जैसे लोगों तक वह साहित्य पहुंच नहीं पाता। इसलिए व्यक्तिगत रूप से मैं इस प्रक्रिया को पसंद नहीं करता। हालांकि वहां कुछ अच्छा भी लेखन हो रहा है। हालांकि कभी-कभार ही ऐसा हो पाता है। इसके अलावा कागज पर छपने वाले और परदे पर दिखने वाले साहित्य के बीच संबंध नहीं बना है। छपा हुआ साहित्य लोक तक नहीं पहुंच पा रहा है। विदेशों में जो चीजें छप कर लोगों तक पहुंचनी चाहिए, वे पहुंच जाती हैं। हालांकि इसमें भी दो बातें हैं। टीएस ईलियट और गिन्सबर्ग दो कवि हुए। गिन्सबर्ग का कहना था कि मुझे ईलियट से बड़ा कवि बनना है। तो गिन्सबर्ग मंचों पर अपनी कविताएं गाकर भी सुनाते थे। इस तरह वे ईलियट से कुछ अधिक लोकप्रिय हो गए।
सूर्यनाथ सिंह : हमारे यहां भी भूपेन हजारिका और गिर्दा जैसे कई लोग हुए हैं, अपनी कविताएं गाकर लोगों को सुनाया करते थे। मगर ऐसा क्यों हुआ कि हिंदी में गीत विधा सिर्फ सिनेमा तक सिमट कर रह गई?
’भूपेन हजारिका मेरे सहपाठी थे। मेरे साथ बीए में थे। उस समय वे गाते नहीं थे। …हमारे यहां कवि सम्मेलन की परंपरा है। बरसों से है। उसमें आजकल गंभीर लिखने वाले नहीं जाते। बोलने वाले जाते हैं। मैंने निराला को देखा है। जितना सुंदर कविता पाठ वे करते थे, वैसा मैंने किसी और को पढ़ते नहीं सुना। उनके बाद की पीढ़ी में दिनकर और बच्चन तक कवि सम्मेलनों में जाया करते थे। उनके बाद की पीढ़ी ने जाना बंद कर दिया। इसकी वजह शायद यह है कि एक खास तरह की कविता लिखी जाती है, जो कवि सम्मेलन में चलेगी ही नहीं। अब आगे क्या होगा, कह नहीं सकता। इस तरह कविता की दो धाराएं बन गर्इं। एक मंचों पर जाने वाले कवि, जिसका वे अभ्यास भी करते हैं। दूसरे, वे जो धीरे कविता पढ़ते हैं। इस तरह पूरी पीढ़ी बदल गई। अब यह परिवर्तन कायम हो गया है, इसे हम बदल नहीं सकते। कवि सम्मेलन हालांकि खत्म नहीं होगा, पर मैं कवि सम्मेलन नाम की चीज को अच्छा नहीं मानता हूं। आज जो कवि सम्मेलन का रूप है, उसे तो कतई अच्छा नहीं मानता। आज की कविता पढ़ी जाएगी, मगर विशाल मंच से नहीं, छोटी-छोटी गोष्ठियों में पढ़ी जाएगी।

मृणाल वल्लरी : पहले और आज की कविता में आप क्या अंतर पाते हैं?
’कविता का प्रतिमान पूरी तरह बदल चुका है। प्रतिमान बदलता रहता है। भारतेंदु या दिनकर जिस तरह की कविता लिखते थे, उस तरह की कविता तो हम लिखते नहीं। अज्ञेय और उनके बाद की पीढ़ी ने जो कविता लिखी, वह गाकर नहीं, बोल कर लिखी गई है। वह मुक्त कंठ कविता है। हालांकि ये कविताएं भी गोष्ठियों में पढ़ी जाती हैं, पर उसमें कवि सम्मेलन वाला श्रोता या पाठक नहीं आता। कवि सम्मेलन वाली कविता का संबंध बाजार से है। यह जो गंभीर कविता है, उसे सुनने वाला बाजार से उठ कर नहीं आता। वह कुछ पढ़ता-लिखता है। वह अपना पढ़ना-लिखना छोड़ कर आता है।
पहले और आज की कविता में बहुत अंतर है। जमीन आसमान का अंतर है। पहले कविता गाकर लिखी जाती थी, आज बोल कर लिखी जाती है। यह गाने और बोलने का अंतर तो रहेगा, वह स्थापित हो गया है।
मुकेश भारद्वाज : क्या कविता से क्रांति संभव है?
’कविता से क्रांति दुनिया में कहीं नहीं आती। यूरोप में भी नहीं हुई है, भारत में भी नहीं हुई है। कविता क्रांति के लिए जमीन बना सकती है, नहीं भी बना सकती है, लेकिन वह क्रांति लाएगी, यह दावा नहीं किया जा सकता। उस तरह की कविता कोई लिखे वह अलग बात है। क्रांति वाली कविताएं हो सकती हैं, मगर उनसे क्रांति कहीं हुई है, मैं नहीं जानता।
मृणाल वल्लरी : अगर कविता या साहित्य से क्रांति नहीं होती, तो क्या वजह है कि सरकारें कहीं गोदान को पाठ्यक्रम से निकाल देती हैं तो कहीं पाश की कविता निकाल दी जाती है?
’यह भी बाजार का मामला है। आप किसको चुनते हैं, वे क्या करते हैं, वह अलग प्रक्रिया होती है। अखबारों में भी बहुत-सी चीजें आती हैं, चुनी जाती हैं, छपती हैं। उसकी क्या प्रक्रिया है, मैं नहीं जानता। जैसे, मैं जनसत्ता खरीदता हूं, पढ़ता हूं, उसमें जो कुछ छपता है, उसका विवेचन करता हूं। इसमें कविताएं भी छपती हैं। वह भी देखता हूं। उस पर मैं कुछ नहीं कहना चाहूंगा। पर उससे यह अनुमान जरूर लगाया जा सकता है कि कविता अच्छी कम लिखी जा रही है। पिछले चार-पांच सालों को याद करूं तो जनसत्ता में केवल एक अच्छी कविता छपी थी। ऐसी कविता, जो मैं नहीं लिख सकता। कविता तो दुर्लभ चीज है। अच्छी कविता कभी-कभी बनती है। अच्छी कविता लिखी कम जा रही है।
रामजन्म पाठक : अच्छी कविता का कोई मानदंड है?
’कोई मानदंड नहीं है। वह इतना बदलता जा रहा है कि उसका कोई एक मानदंड नहीं बनाया जा सकता। मगर मानदंड अपने आप बन जाया करता है। बहुत सारे लोग लिखते रहते हैं, उनमें से कोई एक अच्छा निकल गया तो लोग उसकी नकल करने लगते हैं। इस तरह एक ढर्रा बन जाता है। मगर ऐसा कम हो रहा है। क्यों हो रहा है, यह मैं नहीं जानता। अच्छी बात यह है कि अच्छी कविता की किताबें लगभग बिक जाती हैं।
पारुल शर्मा : भाषा को लेकर हमारी उम्मीदें धूमिल पड़ रही हैं। उसे सजाने-संवारने के क्या प्रयास होने चाहिए? बोलियों के खत्म होने के आंकड़े भी आते रहते हैं।
’ऐसा तो मैं नहीं कह सकता कि भाषा को लेकर उम्मीदें धूमिल पड़ रही हैं। भाषा को लेकर बहुत कुछ हो रहा है। उस कविता को भी न भूलें जो परदे पर आ रही है। उसमें कुछ अच्छा भी आ रहा है। पकड़ने की बात है। अगर दस पंक्ति की कविता है और उसमें दो पंक्तियां अच्छी हैं तो वे दो पंक्तियां काफी हैं।
जहां तक बोलियों के खत्म होने की बात है, मैं बोली को महत्त्व देता हूं। केवल हिंदी नहीं रहेगी। हिंदी रहेगी, पर वह प्रमुख नहीं रहेगी। होना भी यही चाहिए। इतना बड़ा आदिवासी समाज है, बंगाल से लेकर महाराष्ट्र तक फैला हुआ, वह कहां जाएगा! वह लिख रहा है, पर छप नहीं रहा। उनको भी जगह दी जानी चाहिए। मेरी बोली भोजपुरी है। भोजपुरी क्षेत्र करोड़ों का है। अब भोजपुरी में काफी लिखा जा रहा है। लिखा जाना चाहिए। पर मैं अकेली भोजपुरी की बात नहीं कर रहा, दक्षिण की भी कई बोलियां हैं, उनको जगह मिलनी चाहिए।
आर्येंद्र उपाध्याय : अंग्रेजी की गुलामी, उसका दबदबा आज भी बहुत है। ऐसा क्यों है?
’मैं उसे अंग्रेजी की गुलामी नहीं कहूंगा। अंग्रेजी का एक ढर्रा बना था, आजादी के पहले, और वह आॅफिस में बना था। वहां जो बाबू बैठा था, उसने बनाया था। वह ढर्रा आज भी इसलिए चल रहा है कि वह बाबू और उसका बच्चा उसी ढर्रे में ढले हुए हैं। क्योंकि उसमें काम करना उन्हें आसान लगता है। हिंदी में बात सब कर लेते हैं, पर काम अंग्रेजी में करना आसान लगता है। अंग्रेजी को हमने-आपने आत्मसात नहीं किया है, बाबू ने किया है, दफ्तर ने किया है। अंग्रेजी में एक बना-बनाया ढर्रा है, उसे सीखना आसान है और बाबू को वह आसान लगने लगता है। हिंदी ने अभी वह जगह नहीं बनाई है।
मनोज मिश्र : क्या लेखक का किसी विचारधारा से जुड़ाव होना जरूरी है?
’लेखक का किसी विचारधारा से जुड़ा होना मैं जरूरी नहीं मानता, लेकिन विचारधारा होनी चाहिए। पर आज इतनी विचारधाराएं हैं, किससे जुड़ाव हो, यह टेढ़ा सवाल है। आज विचारधारा के आधार पर साहित्य का मूल्यांकन नहीं होता। आज से पंद्रह-बीस साल पहले तक होता था। तब विचारधारा चल रही थी। लेकिन अब विचारधारा के नाम पर न आज की सत्ता कुछ करना चाहेगी, न पाठक करना चाहेगा।
आर्येंद्र उपाध्याय : क्या आज कोई विचारधारा न होने के पीछे वजह बाजार की अर्थव्यवस्था है?
’बाजार का प्रभाव काम करता है, मगर बाजार का काम विचारधारा नहीं, पैसा बनाना है। पर विचारधारा साहित्य और जीवन में नहीं आ रही है। जो सरकार आज काम कर रही है, उसकी विचारधारा है, मगर वहां भी एक नहीं, कई विचारधाराएं हैं। विचारधारा का मामला टेढ़ा है। आज कोई एक विचारधारा नहीं है। अब आप देखिए, कम्युनिस्ट विचारधारा कहां है! दुनिया में कहां है! रूस हो आया मैं, वहां भी नहीं है। चीन हो आया, वहां भी दिखाई नहीं देती। है तो वहां कम्युनिस्ट पार्टी ही, पर कम्युनिस्ट विचारधारा वह नहीं है। उसे बाजार ने प्रभावित किया है। इसलिए विचारधारा का स्वरूप बदल चुका है। अभी जो विएतनाम में हो रहा है, वह भी विचारधारा नहीं, एक प्रकार की सनक है।
अरविंद शेष : कुछ दिनों पहले पुरस्कार वापसी का जो अभियान चला था, क्या उसके पीछे भी कोई विचारधारा नहीं थी?
’वहां विचारधारा नहीं अर्थवाद काम करता है। मैं भी कहीं-कहीं पुरस्कार समितियों में जाता हूं। मगर कभी विचारधारा को आधार बना कर पुरस्कार नहीं देता। यह मेरी अपनी विचारधारा है। हो सकता है, कहीं कुछ लोग करते हों। मगर मैं नहीं करता। मेरी दृष्टि में अगर रचना अच्छी है, तो उसे तरजीह देता हूं।
रामजन्म पाठक : क्या कविता बाजार से लड़ पाएगी?
’बाजार इतना विशाल होता जा रहा है कि उसे देख कर मुझे भी डर लगता है। जो कल तक खेत में काम करता था, आज वह दिल्ली में आकर नौकरी करने लगा है। मेरे गांव का एक व्यक्ति बहुत अच्छी खेती करता था, लेकिन एक दिन अचानक वह यहां मिल गया। मैंने उससे पूछा यहां कैसे! उसने कहा कि अब खेती से गुजारा नहीं हो पाता। इस तरह खेती पर भी बाजार का नकारात्मक असर पड़ रहा है। पूरे देश में असर पड़ रहा है। इस पर विचार करने की जरूरत है।
मुकेश भारद्वाज : बाजार साहित्य को प्रभावित कर रहा है, इससे साहित्य का क्या स्वरूप बनेगा।
’बाजार में क्या कितना बिकता है, इसका आंकड़ा मेरे पास नहीं है। बाजार में वे भी बिक जाते हैं, जो पाठ्यक्रमों में लगे हुए हैं। बिकना कई प्रकार का है। बिना पाठ्यक्रम में लगे आप बिक रहे हैं, पर आपको पैसा नहीं मिल रहा है। लेकिन पाठक सीधे पैसा दे रहा है। ऐसा भी होता है। बाजार साहित्य को कैसे प्रभावित करता है- बाजार अब साहित्य को निगलने के मूड में है। वह आपसे साहित्य को मांगेगा नहीं, पूरा का पूरा ले लेगा और बेचेगा। कैसे बेचेगा, हम नहीं जानते। हिंदी में साहित्यकार को कितना पैसा मिलता है! एक बार मैंने अपने गुरु हजारी प्रसाद द्विवेदी से पूछा था, तब उन्हें कुछ हजार रुपए मिलते थे। सुना है, ‘चित्रलेखा’ लाखों में बिकती थी, पर उसकी रायल्टी भी लाख में शायद ही मिलती होगी। हरिवंश राय बच्चन को किताब से लाख से ऊपर रायल्टी नहीं मिलती थी।
सूर्यनाथ सिंह : अभी बेस्ट सेलर की एक सूची जारी हुई है। कहते हैं किसी लेखक को पंद्रह लाख रुपए रायल्टी के तौर पर मिले हैं। क्या इससे साहित्य का रुझान बदलेगा और लोग साहित्य के बजाय बेस्टसेलर को प्रतिमान मान कर लिखने लगेंगे?
’देखिए, नरेंद्र मोदी पर जो लिखा जाएगा, उसे साहित्य नहीं मानूंगा मैं। और यह भी कि जो गंभीर साहित्य लिख रहा है वह इस तरह के लेखन की तरफ नहीं जाएगा। गंभीर लिखने वाले अचानक बदल जाएंगे, ऐसा नहीं होगा। हां, बाजार बढ़ रहा है तो हो सकता है, लेखक को थोड़ी और रायल्टी मिलने लगे। जो किताबें पाठ्यक्रम में लगी हुई हैं, उन्हें कमाई में मत शुमार कीजिए। उसका गणित दूसरा है।

केदारनाथ सिंह

’जन्म : 1934 में बलिया के चकिया गांव में।
’बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से 1956 में हिंदी में एमए और 1964 में पीएचडी की उपाधि प्राप्त की।
’अज्ञेय द्वारा संपादित ‘तीसरा सप्तक’ के कवि।
’समकालीन कविता के प्रमुख हस्ताक्षर। कविता में गांव और शहर का द्वंद्व साफ नजर आता है।
’वे जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के भारतीय भाषा केंद्र में आचार्य और अध्यक्ष रहे।
कविता संग्रह
’अभी बिल्कुल अभी’जमीन पक रही है’यहां से देखो’बाघ, अकाल में सारस ’उत्तर कबीर और अन्य कविताएं ’तालस्ताय और साइकिल ’सृष्टि पर पहरा
आलोचना
’कल्पना और छायावाद ’आधुनिक हिंदी कविता में बिंबविधान ’मेरे समय के शब्द ’मेरे साक्षात्कार
संपादन
’ताना-बाना (आधुनिक भारतीय कविता से एक चयन) ’समकालीन रूसी कविताएं ’कविता दशक ’साखी (अनियतकालिक पत्रिका) ’शब्द (अनियतकालिक पत्रिका)
’2013 काज्ञानपीठ पुरस्कार।
’मैथिलीशरण गुप्त सम्मान ’कुमारन आशान पुरस्कार ’जीवन भारती सम्मान ’दिनकर पुरस्कार ’साहित्य अकादेमी पुरस्कार ’व्यास सम्मान आदि।
प्रस्तुति: सूर्यनाथ सिंह / मृणाल वल्लरी

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