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बाखबर: कभी खुशी कभी गम

‘हिंदी हार्टलैंड’ के तीनों राज्यों में भाजपा की हार चर्चा का सबसे बड़ा विषय बनी रही। कुछ चैनल ‘हिंदी हार्टलैंड’ को ‘मोदी हार्टलैंड’ भी कहने लगे! अंग्रेजी एंकरों को क्या मालूम कि हिंदी हृदय क्षेत्र जब अपनी पर आता है तो बड़े-बड़ों को धरती सुंघा देता है।

भाजपा-कांग्रेस का प्रतीकात्मक फोटो, फोटो सोर्स- इंडियन एक्सप्रेस

एक बार फिर सिद्ध हुआ कि मीडिया किसी का सगा नहीं। कल तक जो हिज मास्टर्स वॉयस की तरह भौं-भौं करता रहता था, ग्यारह दिसंबर के चुनाव परिणामों के बाद अपने मास्टर्स की भी हंसी उड़ाने लगा। इस दिन की शायद सबको उम्मीद थी, इसलिए लगभग हर चैनल के स्टूडियो में एक खुशी-सी बिखरी दिखती थी। ऐसा लगता था कि एंकरों को उनकी खोई हुई आवाज मिल गई हो। एक अंग्रेजी एंकर ने भाजपा प्रवक्ता के आत्मविश्वास पर चुटकी लेते हुए कहा- ‘आदरणीय प्रवक्ता जी! जरा जमीन पर लोगों के बदले हुए मूड को तो देखिए। कांग्रेस को उखड़ने में साठ साल लगे, आप पंद्रह साल में उखड़ गए।’ एक अन्य एंकर की हिम्मत इतनी बढ़ी कि कह उठा- ‘क्या भाजपा को अपने नेतृत्व में परिवर्तन की जरूरत होगी? जीत का श्रेय नेताओं को जाता है तो हार का श्रेय भी उनको दिया जाना चाहिए।’ एक ने कटाक्ष किया कि चाणक्य जी को क्या हुआ? योगेंद्र यादव ने इस परिणाम के चार फलागम गिनाए- ‘मोदी जी का जादू उतर रहा है। मंदिर ने काम नहीं किया। मुंबई से पनचानबे फीसद चंदा अब नहीं मिलने वाला और मीडिया की आवाज खुल जाएगी।’ एक बहस में एक कांग्रेस समर्थक ने चोट की- ‘राहुल को जितना पप्पू बनाआगे, उतना तुम्हारा गप्पू बनेगा।’ एक चैनल पर कपिल सिब्बल आकर बोले कि ये चुनाव स्थानीय समस्याओं के अलावा केंद्रीय नीतियों, जैसे नोटबंदी और जीएसटी के खिलाफ भी गए हैं

अपने चैनलों की चर्चा में न मिजोरम में कांग्रेस की हार चर्चा का बड़ा विषय रही, न तेलंगाना में केसीआर की जीत बड़ी खबर रही। बल्कि ‘हिंदी हार्टलैंड’ के तीनों राज्यों में भाजपा की हार चर्चा का सबसे बड़ा विषय बनी रही। कुछ चैनल ‘हिंदी हार्टलैंड’ को ‘मोदी हार्टलैंड’ भी कहने लगे! इन अंग्रेजी एंकरों को क्या मालूम कि हिंदी हृदय क्षेत्र जब अपनी पर आता है तो बड़े-बड़ों को धरती सुंघा देता है। चार राज्यों के परिणाम तो दोपहर तक तय हो गए थे, लेकिन मध्यप्रदेश के परिणाम बहुत धीमी गति से आए। वहां के चुनाव अधिकारी माइक पर बार-बार घोषणा करके बताते रहते थे कि अभी पोस्टल बैलेट गिने जा रहे हैं, अब मशीनों की बारी है और हर मशीन को अच्छी तरह चेक करके गिनती की जा रही है। जब सभी पक्ष संतुष्ट हो जाते हैं, तभी आगे बढ़ते हैं। ऐसा लगता था कि हम क्रिकेट मैच की लाइव कमेंटरी सुन रहे हैं। एक एंकर ने चुनावों को ‘ट्वेंटी 20’ मैच की संज्ञा दी!

यों अपने मीडिया की आवाज एक्जिट पोलों के साथ ही खुल गई थी। वे नौ एक्जिट पोल का औसत निकाल कर बताते रहे कि तीनों राज्यों में कांग्रेस को बढ़त मिलती दिखती है। एक्जिट पोलों तक तो प्रवक्ता दम लगाते रहे कि एक्जिट पोल तो पहले भी हमें हरा चुके हैं, लेकिन जितना एक्जिट पोल हमें हराते हैं, उतना ही हम जीता करते हैं। इस बार भी ऐसा ही होगा। मध्यप्रदेश के परिणाम इस कदर इधर-उधर होते रहे कि उनको बताना एंकरों तक के लिए मुश्किल हो गया। एक पल भाजपा 109 पर रहती, अगले पल कांग्रेस 110 पर आ जाती। फिर इसका उलटा होने लगता। क्षण-क्षण के सीधा प्रसारण में दिखती आंकड़ों की ऐसी चंचल ऊंच-नीच अपने आप में किसी सट्टा बाजार की उछाल और गिरावट से कम न थी। एक पल जो जीतता दिखता, अगले पल लुढ़कता दिखता। एक पल जो खुश होता, अगले ही पल दुखी दिखने लगता। मध्यप्रदेश के परिणाम पूरी तरह स्पष्ट नहीं हुए थे। सिर्फ क्षणभंगुर लीड थी, तब भी एक छोटी पे्रस कॉन्फ्रेंस राहुल ने दी। राहुल ने कहा कि मुझे पीएम के लिए दुख है कि उन्होंने इतने बड़े बहुमत को खो दिया। 2014 के बाद मैंने यह सीखा कि नेता को चाहिए कि लोगों को सुने। एक अन्य अंग्रेजी चैनल पर एक पुराने सेफोलॉजिस्ट बोले कि लगता है कि देश का मूड बदल रहा है। अगर ऐसा ही रहा तो 2019 में हिंदी के इन तीन राज्यों की कुल बासठ सीटों में से आज के मूड के हिसाब से भाजपा को कुल अठारह और कांग्रेस को चौवालीस सीटें मिलेंगी।

एक चैनल ने लाइन लगाई- ‘ब्रांड राहुल और भी बड़ा हुआ!’ लेकिन अगले ही रोज कांग्रेसी कार्यकर्ता अपनी पर आ गए। अचानक मिली जीत शायद पची नहीं। जयपुर, भोपाल और रायपुर तक कांग्रेस के कार्यकर्ता अपने-अपने नेताओं के लिए आमने-सामने थे कि हमारा सीएम कैसा हो, हमारे नेता जैसा हो। चैनल मजे लेते रहे- जयपुर में कौन? गहलोत या सचिन? भोपाल में कौन? सिंधिया या कमलनाथ? छत्तीसगढ़ में कौन? सिंहदेव या बघेल? रिपोर्टर पूरे दिन कारों के पीछे दौड़ते रहे कि ये देखिए उनके समर्थक टायर जला रहे हैं। उनके पक्ष में नारे लगा रहे हैं। ये गहलोत निकल गए। जयपुर पहुंचे ही थे, फिर बुला लिए गए। राहुल ने सात लाख कार्यकर्ताओं से अपनी आवाज में ट्वीट कर पूछा कि छत्तीसगढ़ में वे किसे सीएम चाहते हैं। भाजपा प्रवक्ता कहते- ये सब ढकोसला है। तय तो इनका हाईकमान ही करेगा। दो दिन बाद कमलनाथ का नाम तय हुआ। गहलोत का होना था कि इस बीच राफेल केस को लेकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने कांग्रेस की सारी खुशियों पर पानी फेर दिया। कोर्ट ने राफेल डील की प्रक्रिया आदि पर सरकार के पक्ष को सही पाया और कांग्रेस की जीत का उल्लास खल्लास हो गया! एक चैनल पर एक प्रवक्ता ने यह तक कहा कि अगर ये फैसला कुछ दिन पहले आया होता तो ये चुनाव परिणाम क्या होते? इसे ही कहते हैं- कभी खुशी कभी गम!

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