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बाखबर: जाने भी दो यारो- टू

टाइपराइटर बोला कि सर जी टाइपिंग की मिस्टेक हुई है। टाइपिंग में गलतियां तो हो ही जाती हैं। अब देखिए न कि एक गलती ने बात कहां की कहां पहुंचा दी! जो मतलब था वह तो न पकड़ा, जो नहीं था उसे पकड़ा! मतलब की बात अचानक बेमतलब हो गई।

नसीरुद्दीन शाह।

रफाल पर बड़ी अदालत का फैसला आते ही एंकर चिल्लाने लगे- सरकार की फतह। कांग्रेस की हार! कांग्रेस बैकफुट पर! दोपहर तक कांग्रेस पिटती रही। ‘राहुल माफी मांगें’ की मांग होती रही। दोपहर बाद राहुल ने प्रेस कॉन्फ्रेंस करके फैसले को डिकंस्ट्रक्ट कर दिया और सर जी, जीत हार में बदलने लगी। राहुल ने ‘कैग’ की रिपोर्ट के ‘रहस्य’ को खोलते हुए कहा कि कैग की रिपोर्ट है कहां? कैग रिपोर्ट नियम के मुताबिक पीएसी को आती है खड़गे जी पीएसी के अध्यक्ष हैं। इनको नहीं मालूम कि कैग रपट आई कि नहीं। इतना सुनना था कि पत्रकार हंस पड़े। राहुल ने यह भी कहा कि आप कितना भी भाग लें आप बच नहीं सकते।

इसी बीच टाइपराइटर बोला कि सर जी टाइपिंग की मिस्टेक हुई है। टाइपिंग में गलतियां तो हो ही जाती हैं। अब देखिए न कि एक गलती ने बात कहां की कहां पहुंचा दी! जो मतलब था वह तो न पकड़ा, जो नहीं था उसे पकड़ा! मतलब की बात अचानक बेमतलब हो गई। अब ठीक करने को कहेंगे अदालत से कि उसे इस तरह पढ़ें, जिस तरह हम पढ़ते हैं। टाइप का क्या है, गलती कर ही देता है। बस आप ठीक कर दें प्लीज! हाय! इतने अफसर और ठीक से मामूली अंग्रेजी तक नहीं जानते? इन दिनों खबरों के प्रसारण का एक-एक पल कयामत ढाता है। जब एंकर कहते हैं कि नई खबर बे्रक हो रही है तो दिल थाम कर बैठना पड़ता है कि अब कौन जीतने वाला है और कौन हारने वाला! एक-एक पल प्रलय लाता लगता है। इधर कुछ हुआ, उधर कोई ढेर हुआ। कोई बैकफुट पर हुआ, कोई जवाबदेह हुआ। लेकिन हाय री कांग्रेस की तकदीर कि प्रथम ग्रास में ही मक्षिका-पात हुआ। सत्रह दिसबंर की सुबह जयपुर से लेकर भोपाल तक शपथ-ग्रहण समारोह के बाजे बज रहे थे। जयपुर में महागठबंधन के सारे घटकों के नेताओं के साथ राहुल बैठे थे कि तभी दिल्ली की अदालत का फैसला आया कि चौरासी के दंगों में सज्जन कुमार को दोषी पाया गया है और आजीवन कारावास की सजा दी गई है।

इस लाइव खबर ने शपथ समारोह की जान निकाल दी! जयपुर से लेकर भोपाल तक सब ओर सन्नाटा फैल गया। गाजे-बाजे बंद हो गए! एंकरों ने कांग्रेस को जम कर कूटा कि सज्जन कुमार को कांग्रेस से निकालते क्यों नहीं कि कमलनाथ भी तो आरोपित हैं। उनको शपथ दिलाना कहां तक उचित है! कमलनाथ ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर कहा कि न कहीं मेरा नाम है, न मुझ पर कोई चार्जशीट है, न कोई केस है। कपिल सिब्बल ने जवाबी हमला बोलते हुए कहा कि अगर कमलनाथ का नाम लेंगे तो उनको क्या कहेंगे जो गुजरात के दंगों के आरोपित हैं और यहां टॉप पर बैठे हैं!

इस जवाबी हमले को देख कुछ देर के लिए सारी बहसें शांत हो गर्इं। इसके बाद इधर कलनाथ ने शपथ ली, उधर किसानों का कर्ज माफ हो गया। ऐसी चपलातिश्योक्ति एंकरों को नहीं पची! कल तक किसानों के आंदोलनों से हमदर्दी दिखाने वाले एंकर ही कहने लगे कि ये कर्ज माफी क्या तर्कसंगत है? पैसा कहां से आएगा? क्या यह किसानों की समस्या का हल है? लेकिन राहुल ने कर्जमाफी के तुरंता निर्णय को अपना हथियार बना कर भाजपा पर चला दिया कि देखा! कमलनाथ जी ने शपथ लेते ही कर्ज माफ कर दिया। जो दस दिन में करना था, उसे दस मिनट में कर दिया। हमारी सरकारें दस गुना तेज काम कर रही हैं। जब तक किसानों का कर्ज माफ नहीं करते, तब तक हम उनको चैन से सोने न देंगे! अरे भैया ये क्या अनर्थ करते हो! सोने तो दो! नहीं तो कोई काम कैसे करेगा! राहुल के इस ‘पर्सनल इज पोलिटिकल’ टाइप ‘पोस्टमॉडर्न’ वक्तव्य पर एक प्रवक्ता नाराज होकर बोले कि ‘ये है राहुल का ‘न्यू लो’! हिंदी में कहें तो ‘नया निम्न’! और जैसे ही बहसों में ‘नया निम्न-नया निम्न’ हुआ वैसे ही ‘नया निम्न नया निम्न’ गाने वाले प्रवक्ता आ जुटे और ऐसे उच्चकोटि के ‘नए-नए निम्न’ बरसे कि गिनना मुश्किल हो गया। आपके ‘नए निम्न’ ये ये ये ये… तो आपके नए निम्न ये ये ये ये..!

और भाई नसीरुद्दीन शाह! आपको क्या पड़ी थी कि कहते… कि आपको अपने बच्चोें के लिए डर लग रहा है… कि पुलिस इंसपेक्टर की जान से कीमती है गाय की जान… कि जिन्न बोतल से बाहर आ गया है..! क्या जानते नहीं कि आपके ‘डर’ कहने से ‘डर’ और अधिक फैलता है। डर लगता है तो डरते रहिए न! जानते नहीं कि आप ‘फीयर मोंगरिंग’ कर रहे हैं। सबको डरा रहे हैं। आपका ‘पब्लिसिटी स्टंट’ है। आप गद्दार हैं! डर कर देश को कमजोर कर रहे हैं! देखते नहीं कि कितनी आजादी है? आप डरने के लिए पूरी तरह आजाद हैं और सरकार आपसे डरने के लिए आजाद हैं। यह ‘जाने भी दो यारो- टू’ का जमाना है नसीर भाई!
देखते नहीं कि आपकी और देश की ‘सुरक्षा’ के लिए सरकार आपके कंप्यूटरों की जासूसी करने वाली है और कांग्रेस के संजय झा एक चैनल की बहस में इसे जॉर्ज ऑरवेल के ‘बिग ब्रदर’ का युग बता कर ‘कंडम’ कर रहे हैं!
कितनी आजादी है!

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