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बाख़बरः एक कविता जो सबकी है

हमारी बहसें कहां पहुंच गई हैं? ऐसी बहसों में शुरू से आखिर तक एक प्रकार का धार्मिक ध्रुवीकरण अपने आप उग आता है। हर तर्क हिंदू-मुसलमान हुआ जाता है। देखते-देखते हर मुद्दे के दो असहिष्णु ध्रुव बन जाते हैं और इनके बीच सच के शेष अनंत रंग अनुपस्थित मान लिए जाते हैं!

फ़ैज़ की नज्म ‘हम देखेंगे’ गाई गई और यह नज्म अचानक ‘खतरनाक’ हो उठी!

इतिहासकार को गुस्सा आ गया। वे उठे। राज्यपाल की ओर बढ़े। राज्यपाल के एडीसी ने उनको बढ़ने से रोका, तो वे दूसरी ओर से राज्यपाल की ओर बढ़े, लेकिन वहां भी एक वीसी ने उनको रोक लिया!

चैनलों ने इस सीन को बार-बार बजाया और जगजाहिर हो गया कि जिस असहिष्णुता से इतिहासकार लड़ते आए, वे स्वयं कितने असहिष्णु नजर आए!
क्या गजब का वर्ग संघर्ष और कैसा बौद्धिक दंभ! राज्यपाल का कुछ न बिगड़ा। जो बिगड़ा, सो इतिहासकार की छवि का ही बिगड़ा! दर्शकों की हमदर्दी राज्यपाल को मिली!
जनतंत्र की ऐसी-तैसी करके आप किस जनतंत्र की रक्षा कर सकते हैं कामरेड! आपने यह कैसा इतिहास बनाया? इतना गुस्सा आपकी सेहत के लिए ठीक नहीं!
पंद्रह सेकेंड की अमरता कमाने के कंपटीशन में एक तमिल विद्वान भी उतरे। उन्होंने अपना गुस्सा हंसते हुए निकाला और कुछ ऐसा कह उठे कि लगा कि वे अल्पसंख्यकों को एक बड़े नेता के खिलाफ हिंसा के लिए उकसा रहे हैं।

प्रथम दृष्टया तो मजाहिया शैली में मजा आया। उनकी व्यंग्य-वक्रता पर आजू-बाजू बैठे लोग ठठा कर हंसते दिखे। साफ हुआ कि घृणा कभी-कभी हंसते हुए भी व्यक्त की जा सकती है।
लेकिन टीवी की यह अमरता उनको फ्री में नहीं मिली। भाजपा वालों ने उनके घर के आगे धरना दिया। उन पर एफआइआर हुई और अब वे ग्यारह दिनों के लिए कस्टडी में हैं!
निर्मल हास्य और विषैले हास्य में फर्क होता है श्रीमान!

एक शाम एक एंकर को नागरिकता कानून के विरोध के प्रदर्शनकारियों में पीएफआई के कई काडर नजर आए! एंकर के पास दो वीडियो थे, जो मेरठ की पुलिस ने दिए थे, जो बताते थे कि किस तरह पीएफआई के लोग पुलिस पर गोली चला रहे हैं।

बार-बार रिपीट किए जाते सीसीटीवी के फुटेज में चेहरे को ढंकने वाला काला स्कार्फ बांधे नीली जैकेट पहने एक आदमी अपनी जेब से पिस्तौल निकालता है, कुछ आगे बढ़ता है, गोली चलाता है और फिर पीछे की एक गली में भाग जाता है। दूसरा उसी गली के किनारे से पुलिस पर गोली दागता है और भाग जाता है।
तब भी, बहसों में एक पक्ष ऐसे वीडियोज पर संदेह करता है, तो दूसरा पक्ष इसे यकीन के योग्य बताता है। ऐसे वीडियोज की प्रामाणिकता का कोई स्वतंत्र परीक्षण हो चुका है? यह नहीं बताया जाता!

एक शाम एक और वीडियो कई लोमहर्षक और उत्तेजक नारों से भरा था, जैसे कि : ‘नारा ए तकबीर, अल्लाहोअकबर’, ‘हिंदुस्तान की कबर खुदेगी, एएमयू की धरती पर’, ‘सावरकर की कबर खुदेगी, एएमयू की धरती पर’, ‘से इट इन लाठीचार्ज, ला इलाहा इल्लल्लाह’, ‘तेरा मेरा रिश्ता क्या, ला इलाहा इल्लल्लाह’!

इसके बाद ‘ला इलाहा इल्लल्लाह’ की व्याख्या को लेकर दो मुसलमान वक्ताओं में भिड़ंत तक हो गई। एक ने ज्यों ही कहा कि यह नारा अल्लाह को न मानने वाले को काफिर बताता है, तो जवाब में दूसरा बोल उठा कि तुम मुसलमान नहीं हो!

हमारी बहसें कहां पहुंच गई हैं? ऐसी बहसों में शुरू से आखिर तक एक प्रकार का धार्मिक ध्रुवीकरण अपने आप उग आता है। हर तर्क हिंदू-मुसलमान हुआ जाता है। देखते-देखते हर मुद्दे के दो असहिष्णु ध्रुव बन जाते हैं और इनके बीच सच के शेष अनंत रंग अनुपस्थित मान लिए जाते हैं! ऐसी बहसों को देख हम या तो हिंदू हो जाते हैं या मुसलमान, एक संवेदनशील इंसान हरगिज नहीं हो पाते!

इसके बाद फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की आफत आई। खबर चैनलों ने बताया कि कानपुर के आइआइटी छात्रों द्वारा नागरिकता कानून के विरोध के रूप में फ़ैज़ की नज्म ‘हम देखेंगे’ गाई गई और यह नज्म अचानक ‘खतरनाक’ हो उठी! एक चैनल ने उसकी पूरी इबारत दिखाते हुए साफ किया कि इसमें कुछ लाइनें आती हैं जैसे कि ‘सब बुत उठवाए जाएंगे… बस नाम रहेगा अल्लाह का…’ एक एंकर ने बताया कि भाजपा के लोगों को लगता है कि यह कविता हिंदू-विरोेधी है।… यूपी के एक मंत्री जी बोल उठे कि हम उस शायरी को ‘एलाउ’ नहीं करेंगे, जो ‘डिवाइड’ करे। हमने जांच बिठा दी है। किसी की कविता शायरी अगर मिलाने वाली है, तो हर्जा नहीं, लेकिन लड़ाने वाली है तो उसकी इजाजत उत्तर प्रदेश में नहीं मिलेगी!

एक अंग्रेजी चैनल पर सीपीएम की वृंदा करात ने बताया कि फ़ैज़ एक क्रांतिकारी शायर थे, उन पर रावलपिंडी षड्यंत्र केस भी चलाया गया था। सुभाषिनी अली ने कहा कि इस पर वहां की सरकार ने ‘बैन’ लगाया था। जावेद अख्तर ने समझाया कि फ़ैज़ आधी जिदंगी तो पाकिस्तान से बाहर रहे। यह नज्म उन्होंने जिया-उल हक के कठमुल्लावादी और सांप्रदायिक शासन के खिलाफ लिखी थी। उन्होंने इसके ‘सिंबल’ वहीं से लिए थे। ‘बुत’ का मतलब ऐसे ‘डिक्टेटर’ से है, जो ईश्वर की जमीन पर खुदा बन के बैठे हैं, यह उनके खिलाफ है। जावेद ने व्यंग्य से कहा कि शायरी समझने के लिए अक्ल की जरूरत होती है। एंकर ने खुद कहा कि जहां भी विरोध की चिंगारी होती है, यह नज्म उसको बाहर लाने का काम करती है। यह कविता सदाबहार है! सबकी है।

बहरहाल, शुक्रवार की सुबह एक चैनल पर एक लाइन लिखी दिखी कि फ़ैज़ विवाद से भाजपा ने अपने को अलग किया। फिर एक लाइन यह भी बताती रही कि एक केंद्रीय मंत्री फ़ैज़ की कविता पसंद करते हैं। चलो एक तो अक्लमंद निकला!

कोटा अस्पताल में सौ से अधिक बच्चों के मरने की दर्दनाक कहानी को गहलोत सरकार की संवेदनहीनता को खोल कर रख दिया। गहलोत स्वयं अंडबंड-सा बोलते रहे। इतनी बड़ी सरकार और ‘डैमेज-मैनेज’ करने वाला एक प्रवक्ता नहीं! एंकरों रिपोर्टरों ने सरकार की लापरवाही की जम कर खबर ली!

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