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बाखबर- रजा का वंदेमातरम्

राष्ट्रप्रेम से ओतप्रोत एंकर पूछता है: लेकिन राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत लाउड स्पीकर पर बजाना कहां तक ठीक है? इतने में दूसरा पोल खोल देता है: वह भाजपा के पांच-छह लोगों से कहता है- जरा वंदे मातरम् गाकर दिखाइए। आश्चर्य कि किसी को भी सही सही वंदे मातरम् नहीं आता! एक तो उसे शोकगीत की तरह ही गाने लगता है।

Author November 5, 2017 05:15 am
भाजपा पार्षदों का कहना है कि वंदे मातरम गाने का फैसला पिछले साल ही लिया गया था लेकिन अखिलेश यादव सरकार की वजह से वो रुक गया था।

राहुल अब पप्पू नहीं रहे। वे बदल गए हैं। वे भारत को लीड कर सकते हैं!’ शिव सेना के एक नेता के मुख से निकले ये बोल कई देशभक्त चैनलों को परेशानी में डाल देते हैं।जवाब में एक प्रवक्ता आकर पुराना रिकार्ड बजाने लगता है कि लोग जानते हैं कि राहुल को किस तरह लिया जाय?
नहीं सरजी! सावधान! ये वाला राहुल कुछ नया है! सीरियसली लीजिए इसे!
और राहुल को सचमुच कुछ हो गया है। नहीं तो शरमा कर भरी सभा में अंदर की बात कह कर ताली न बटोरते!
एक सभा में पहलवान विजेंद्र ने ‘टू इन वन’ वाला सवाल पूछा कि एक तो ये बताओ सर जी कि आप शादी कब करोगे? (और कब हमें बारात में ले चलोगे?) दूसरा पूछा कि नेता लोग खेल नहीं खेलते। खेलों के बारे में भी नहीं जानते। क्या आप कोई खेल खेलते हो या जानते हो?
राहुल शरमाए और उनके गाल पर ये बड़ा डिंपल पड़ा। फिर बोले मैं भाग्य में यकीन करता हूं, शादी जब होगी तब होगी, लेकिन क्या ‘आइकेडू’ के बारे में जानते हो?आइकेडू एक जापानी मार्शल आर्ट है। मैं उसमें ‘ब्लैक बेल्ट’ हूं। सामने बैठी पब्लिक ने प्रसन्न होकर जोर से ताली मारी!
एक दिन बाद एक चैनल ‘ब्लैक बेल्ट’ पहने राहुल की फाइट वाला वीडियो दिखाता है, जिसमें उनका प्रतिद्वंद्वी जरा-सी देर में धराशायी नजर आता है!
इस राहुल से सावधान! पता नहीं कब कैसा दांव लगा दे!
कट टू गुजरात।

राहुल गुजरात के भरुच में बोल रहे हैं। आश्चर्य कि इस बार कई चैनल उनके भाषण को देर तक लाइव दिखाते हैं। यह एक बड़ी सभा है, दूर तक लोग बैठे हैं। वे बार-बार गुजरात मॉडल की हवा निकालते हैं: यह मॉडल पांच-दस उद्योगपतियों के लिए काम करता है, गुजरात की जनता के लिए नहीं करता। गुजरात का मॉडल गरीब से लेता और अमीर को देता है।
यह दूसरा गुजरात है। राहुल का गुजरात, जो राहुल के अनुसार बहुत ‘नाराज’ है।
जब राहुल माल्या पर कटाक्ष करते हैं, तो ताली पड़ती है। जब नोटबंदी और जीएसटी का मजाक उड़ाते हैं तो ताली पड़ती है।
एक चैनल तुरंत बैलेंस करता है। आधे में मोदी के सुधारों पर विश्व बैंक की रिपोर्ट दिखाता है, जो कहती है कि ‘ईज आफ डूइंग बिजनेस’ के हिसाब से भारत बहुत आगे आया है। उधर राहुल ‘ईज आॅफ डूइंग’ बिजनेस को ही ठोंकते हैं। जीएसटी को गब्बर सिंह टैक्स कह कर ताली लेते हैं।
और, गालिब के शेर की पैरोडी को ट्वीट कर राहुल जेटली साहब पर कटाक्ष करते हैं(जिसे रिपब्लिक दिखाता है):
‘सबको मालूम है ‘ईज आफ डूइंग बिजनेस’ की हकीकत लेकिन, खुद को खुश रखने के लिए डॉक्टर जेटली ये खयाल अच्छा है!’
यह राहुल कुछ नया है। वह एक खिलाड़ी का चेहरा है। छवियों के युद्ध में यह युवाओं को लुभाता है। एनडीटीवी दिखाता है कि किस तरह बहुत सारे युवा राहुल से मिलने के लिए बस तक आए हैं। एक लड़की उनके साथ सेल्फी लेने के लिए गाड़ी के ऊपर तक चढ़ी है।
राहुल दूसरा गुजरात बना रहे हैं, जो उनकी आलोचना को हाथोंहाथ लेता है! छविशास्त्र के हिसाब से यह कुछ तो भारी पड़ना है!
कई चैनल राहुल के पिद्दी-प्रेम को दिखाते हैं और कंट्रास्ट में हिमंत विस्वशर्मा की टिप्पणी को दिखाते हैं कि वे अपने पिद्दी पिल्ले को तरजीह देते हैं। यह कहानी तो घिस चुकी है सर जी!

चैनल कहानी बदलते हैं। श्री श्री मंदिर को लेकर बातचीत कर रहे हैं। जल्दी ही कुछ सकारात्मक परिणाम आने वाला है। भाजपा के एक मंत्री इसका स्वागत करते हैं। कि इतने में राजस्थान रास्ता दिखाने लगता है और चैनल लाइन देने लगते हैं: देखो देखो!राजस्थान के नेताओं ने रास्ता दिखाया! जयपुर नगर निगम ने रास्ता दिखाया! राष्ट्रगान अनिवार्य किया। एक प्रवक्ता संभालता है: नहीं अनिवार्य नहीं है। चॉयस की बात है। आदेश है कि सभी कर्मचारी सुबह साढ़े नौ बजे राष्ट्रगान गाएंगे, शाम को दफ्तर बंद करते वक्त वंदेमातरम् गाएंगे! सुबह गाने से काम करने में मदद मिलेगी! जो देशभक्त हैं उनको गाना चाहिए! (यानी, जो नहीं गाएंगे वे देशभक्त नहीं कहलाएंगे। ये कैसी चॉयस है, जो आदेश की तरह नजर आती है?)
राष्ट्रप्रेम से ओतप्रोत एंकर पूछता है: लेकिन राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत लाउड स्पीकर पर बजाना कहां तक ठीक है? इतने में दूसरा पोल खोल देता है: वह भाजपा के पांच-छह लोगों से कहता है- जरा वंदे मातरम् गाकर दिखाइए। आश्चर्य कि किसी को भी सही सही वंदे मातरम् नहीं आता! एक तो उसे शोकगीत की तरह ही गाने लगता है।
कट टू एनडीटीवी। निधि राजदान ‘राजस्थान के रास्ता दिखाने’ पर लंबी बहस के बाद संघ के विचारक जी से आग्रह करती हैं: आप वंदे मातरम् गाकर दिखाइए। विचारक जी हां हां करते रहते हैं, लेकिन गाकर नहीं दिखाते कि इतने में निधि आमिर रजा हुसैन से पूछती हैं कि क्या आप गा सकते हैं? और आमीर रजा बिना देर लगाए पूरा वंदेमातरम् सही-सही सुना देते हैं!
तो भाई जी! पहले अपने भाइयों को सही गाना सिखाओ, फिर दूसरों से कहो कि गाओ!

 

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