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चर्चा- भारतीय साहित्य विश्व साहित्य क्यों नहीं

माना कि बांग्ला, कन्नड़, मलयाली, मराठी, गुजराती आदि भाषाओं में अच्छा साहित्य रचा गया, मगर प्रश्न यह है कि वह विश्व स्तर पर स्थापित क्यों नहीं हुआ। एक रवींद्रनाथ ठाकुर के बाद किसी भी भाषा में दूसरा रवींद्रनाथ क्यों नहीं हुआ?

Author November 26, 2017 04:59 am
चित्र का इस्तेमाल प्रतीक के तौर पर किया गया है।

यह सवाल अक्सर पूछा जाता है कि हिंदी या फिर भारतीय साहित्य में ऐसे रचनाकार क्यों नहीं पैदा हो पाते, जिन्हें विश्व साहित्य में मान-सम्मान हासिल हो पाता हो। उन्हें विश्व साहित्य के रचनाकारों के बरक्स रख कर देखा जाता हो। फिर यह भी कि हमारे रचनाकार बार-बार पश्चिम की तरफ देखने पर क्यों मजबूर होते हैं। क्या वहीं सब कुछ श्रेष्ठ लिखा जा रहा है? खासकर हिंदी आलोचना में यह प्रवृत्ति घर कर गई लगती है कि बिना किसी पश्चिमी विद्वान की बात का उद्धरण दिए, वह अपनी बात पूरी कर ही नहीं पाती। इसके पीछे क्या वजहें रही हैं, इस बार की चर्चा इसी पर। – संपादक

भारतीय जन का मूल मनोविज्ञान है उसका अतीत प्रेम। अतीत अनुकूल न हो, खराब हो, तब भी वह हमें पसंद है, हमें मधुर लगता है। यही कारण है कि हमारा साहित्यकार भी अतीत के ही तहखाने में विचरता रहता है। माना कि वेद, उपनिषद, रामायण, महाभारत और अन्य पौराणिक काव्य, नाटक हमारे पूर्वजों की प्रखर बौद्धिकता के प्रमाण हैं, मगर उनसे चिपक कर हजारों साल के प्राचीन काल में जीते रहने से क्या वर्तमान के प्रति हम उदास बने रह कर ऐसा साहित्य रचना छोड़ दें, जो भारत को नई पहचान दे, नया संभावनाशील भविष्य दे? आज हम जिस समय में हैं, वह साहित्यकार के सृजन की कठिन चुनौती का समय है। भले तकनीकी विकास से आधुनिकता के नए-नए गलियारे बना भी रहे हों, लेकिन तकनीकी में शब्द मर रहा है, भाषा मूर्छित है और सृजन की श्रेष्ठता शून्य में भटक रही है। जो लिख रहे हैं, वे पढ़ते नहीं और जो पढ़ रहे हैं, वे लिखते नहीं। पढ़ने और लिखने की जिस आधुनिकता को अज्ञेय, निर्मल वर्मा, कमलेश से लेकर कुछ मुट्ठी भर लोगों ने अपनाया था, वे अतीत से समृद्ध थे, वर्तमान से संवेदित थे और भविष्य की संभावना से युक्त थे।

हिंदी आज देश की सबसे बड़ी भाषा है। माना कि बांग्ला, कन्नड़, मलयाली, मराठी, गुजराती आदि भाषाओं में अच्छा साहित्य रचा गया, मगर प्रश्न यह है कि वह विश्व स्तर पर स्थापित क्यों नहीं हुआ। एक रवींद्रनाथ ठाकुर के बाद किसी भी भाषा में दूसरा रवींद्रनाथ क्यों नहीं हुआ? कहने को सार्त्र की तरह हम नोबेल पुरस्कार को आलू का बोरा कह सकते हैं, लेकिन यह मात्र कुंठा है। सार्त्र अपवाद हो सकते हैं, लेकिन दुनिया का कोई सतर्क साहित्यकार ऐसा नहीं है, जो नोबेल पुरस्कार के लिए छटपटाता न हो। सच पूछा जाए तो हमने अपनी भाषाओं का सम्मान करना छोड़ दिया है और उन्हें उपेक्षा से देखना हमारी मनोग्रंथि बन गई है। हिंदी अगर साठ, सत्तर और हजार करोड़ लोगों की सक्रिय भाषा है, तो उसमें सात-आठ साहित्यकार ही ऐसे पैदा क्यों नहीं हुए, जो विश्व-साहित्य के श्रेष्ठतम के बराबर होते? हमारे पास पांच-सात भाषाएं तो ऐसी हैं, जिनके पांच करोड़ से अधिक लोग मूल-भाषी हैं। इन भाषाओं में प्रचुर साहित्य भी लिखा गया, लेकिन अधिकतर तो छपे हुए कचरे से अधिक कुछ नहीं। हर दिन गीत-संग्रह, कविता, कहानी संग्रह, उपन्यासों का लोकार्पण करवाने वाले साहित्यकार एक दिन के साहित्यकार बन कर रह जाते हैं। ऐसा क्यों है?

अब सोचने की बात यह है कि जिस देश की पुस्तक-संस्कृति, पाठक-संस्कृति और ज्ञान-संस्कृति किसी पुरातत्त्व का खंडहर बन कर पड़ी हो, जहां नया सोचने, नया पढ़ने की आदत ही खत्म हो गई हो, वहां नया और अच्छा लिखा ही कैसे जाएगा? हमारे पास उत्कृष्ट रचना नहीं है, तो उत्कृष्ट आलोचक भी नहीं। आलोचना रचना की मापक शक्ति है। यह मापक शक्ति हम खो बैठे हैं। अब तो आलोचना का कोई रामचंद्र शुक्ल, हजारी प्रसाद द्विवेदी, नंददुलारे वाजपेयी, रामविलास शर्मा हमारे पास नहीं हैं। जो हैं, वे या तो अपवाद हैं या विचारधारा की जंजीर से इस कदर जकड़े हुए हैं कि उनका स्वतंत्र विवेक विदेशीजन के जंगल में भटक रहा है और जो स्वदेशी राष्ट्रभक्त हैं वे इतिहास, साहित्य, संस्कृति सबकी चट्टान में भारतीयता की नकली नक्काशी देख रहे हैं। जब हमने अपने दिमाग का ही फिरंगीकरण कर लिया है या उसे धर्म-मजहब के नाम पर सांप्रदायिक बना लिया है, तो हम संकीर्णता से साहित्य की श्रेष्ठता कैसे रचेंगे?
आज देश का मानस ओछी राजनीतिक ग्रंथियों का शिकार है। जिस देश की राजनीति में मनुष्य की जगह इमारतें, मंदिर-मजिस्द के पत्थर, खंडहर ही विचार बन कर हमारे पूरी बौद्धिकता को लहू-लहान कर रहे हों, वहां साहित्य में वह विश्व दृष्टि कैसे पैदा होगी, जो दुनिया के छोटे-छोटे देशों ने विकसित कर अपने साहित्य को बड़ा बनाया है? हम कई तरह से विभाजित राष्ट्र हैं। जाति के नाम पर धर्म के नाम पर, इतिहास और भूगोल के नाम पर, राजनीति के नाम पर, तरह-तरह की विचारधाराओं से पैदा होती वाम-दक्षिण कट्टरता के नाम पर हमारा यह जातीय विभाजन क्या हमें बड़ा बनाता है? छोटी-छोटी बातों पर फतवे, अप-संवाद क्या हमें अठारहवीं सदी के अंधकार युग में नहीं ले जा रहे? ऐसे में हम महज साहित्य कैसे रचेंगे?

संगीत, नृत्य और अन्य शिल्प कलाएं हमारे गौरव का एकमात्र उदाहरण इसलिए हैं कि वे गुरुमार्गी हैं- गुरु-संस्कृति ने उन्हें अभ्यास या रियाज से तराश कर श्रेष्ठ बनाया है। साहित्य में तो साहित्यकर अपना गुरु स्वयं होता है और अगर उसका कोई गुरु है भी तो वे हैं पुस्तकें, जिन्हें पढ़ कर उसमें भाषा संस्कार विकसित होता है, ज्ञान और विचार के अनेक अनुभवों से साक्षात्कार होता है, मगर अब तो विडंबना यह है कि पुस्तक-गुरु हमारे साहित्यकार के अज्ञान-परिसर से बहिष्कृत है, संपर्क, संवाद और साधना की त्रिवेणी धारा अब सूख गई है। अब तो टुच्चे, आरोपों के घटाटोपों से घिरे आयोजक-कवियों का एकमात्र धर्म यह है कि वे किसी अच्छे, विद्वान और स्वतंत्र चिंतन वाले रचनाकार को कभी कांग्रेसी, कभी कम्यूनिस्ट कि कभी भाजपाई कह कर यह बताने की कोशिश करते हैं कि वे स्वयं तो श्रेष्ठ हैं, शेष सब या तो निकृष्ट हैं या बुद्धिहीन।

हम विश्व इतिहास में आने का एक प्रयास कर रहे हैं अंगे्रजी भाषा को अपनी सृजन भाषा बना कर और बेस्ट सेलर कहला कर! तुलसीदास ने जो रामचरितमानस अवधी में लिखा, वह तो आज भी बेस्ट सेलर है और विश्वभर में उसका सम्मान है। मिलान कुंदेरा, बोर्खेज, मार्खेज, ओरहान पामुक आदि ने अपनी-अपनी भाषाओं में ही लिखा- भले ही उनके अनुवाद से वे नोबेल प्राइज पर दस्तक दे सके! तो क्या हम अपनी भाषा में वैसा श्रेष्ठतम नहीं लिख सकते? हमारी मजबूरी यह है कि हम श्रेष्ठ से श्रेष्ठ लिख भी दें, तो हमारे पास उत्कृष्ट अनुवादक नहीं हैं। हम पिछले दो सौ वर्षों से अंग्रेजी पढ़ और पढ़ा रहे हैं, आज हमे अपनी भाषाओं से घृणा और अंग्रेजी से इतना मोह है, तो एक-दो साहित्यकार तो ऐसे होंगे, जो अंग्रेजी में ही लिख कर विश्व साहित्य से टकरा जाते।
दरअसल, बात यह है हम हमने अपने भाषा-संस्कार की ही हत्या कर दी है। अखबार-पत्रिकाएं और संगोष्ठियों से जो संस्कार भाषा और सृजन के मिलते थे, उनकी जगह संकुचित हो गई, बल्कि साहित्य वहां से निष्कासित-सा है। हम अतीत पर कितना भी इतराएं, हम दुनिया भर का साहित्य पढ़ें, या न पढ़ें, मगर जब तक हम अपनी ही भाषाओं से समृद्ध नहीं होेंगे, हम साहित्य में भी श्रेष्ठता हासिल नहीं कर सकेंगे।

 

 

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