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तीरंदाज- जहां जीवन का अर्थ खुलता है

लक्षद्वीप के साथ नाम बड़े और दर्शन छोटे वाली स्थिति नहीं है। इसके विपरीत यह एक ऐसी जगह है, जो लाखों में एक होने का दावा कर सकती है।
लक्षद्वीप यानी एक लाख द्वीप।

लक्षद्वीप यानी एक लाख द्वीप। यह नाम अरब सागर में स्थित द्वीप समहू के लिए परम अतिशयोक्ति है, क्योंकि लाख नहीं, हजार नहीं, सैकड़ों भी नहीं, बल्कि ये मात्र छत्तीस छोटे-बड़े टापू हैं जो सिर्फ बत्तीस वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल में फैले हुए हैं। इनमें से भी केवल दस द्वीपों पर आबादी है। बाकी सब खाली पड़े हैं। पर लक्षद्वीप के साथ नाम बड़े और दर्शन छोटे वाली स्थिति नहीं है। इसके विपरीत यह एक ऐसी जगह है, जो लाखों में एक होने का दावा कर सकती है। लक्षद्वीप भारत गणराज्य का केंद्रशासित प्रदेश है। चौंसठ हजार जनसंख्या वाले इस द्वीप समूह में मलयाली मूल के लोग रहते हैं, और सभी इस्लाम के अनुयायी हैं। ये कट्टरपंथी नहीं हैं, पर उनकी अपनी एक जीवन-शैली है जिसे वे पूरी शिद्दत से जीते हैं। रोचक बात यह है कि लक्षद्वीपी समाज महिला प्रधान है। मर्द अपनी मां के घर में रहते और उसका कामकाज देखते हैं। शादी होने पर वे अपनी होने वाली बीवी के घर में अपने खर्च से एक कमरा बनवाता है, जिसमें शादी के बाद सिर्फ रातें गुजार सकता है। सुबह होते ही वह अपनी मां के घर लौट जाता है, जहां दिन गुजारता है और फिर शाम ढले बीवी के घर आकर रात्रिभोज कर सो जाता है। पिछले कुछ सालों में यह स्थिति बदली जरूर है, पर यहां की रीति यही है। महिलाओं का दर्जा इसलिए विशेष है।

लक्षद्वीप अपराध और प्रदूषण विहीन है। शराब और तंबाकू से भी अपने को बहुत दूर रखे हुए है। सभी बच्चे स्कूल जाते हैं, जहां यूनिफार्म से लेकर किताबें और भोजन तक मुफ्त मिलता है। चौबीसों घंटे बिजली और पानी है और स्वास्थ सेवाएं किसी भी बड़े शहर से ज्यादा प्रभावी हैं। तबीयत नाजुक हो जाने पर लक्षद्वीप प्रशासन कोच्चि तक मुफ्त हेलीकाप्टर सेवा प्रदान करता है। द्वीपों के बीच आवागमन के लिए छोटे सरकारी पानी के जहाज हैं, जिनमें यात्री सुविधा शताब्दी ट्रेन की वातानुकूलित एग्जीक्यूटिव चेयर कार से बेहतर है। सौर ऊर्जा का भरपूर इस्तेमाल हो रहा है। पर्यावरण को लेकर यहां के निवासी सजग और सतर्क ही नहीं, बल्कि अपनी भूमिका निभाने के लिए कटिबद्ध हैं। यहां मूंगा पत्थर खूब हैं, पर इस इलाके के समुद्र या समुद्र तट से एक भी मूंगा उठाना नामुमकिन है। आपको फौरन टोक दिया जाएगा। लोग पर्यावरण की महत्ता समझते हैं।पर इन सबसे हट कर सबसे बड़ी और आकर्षक उपलब्धि होड़ की गैरहाजिरी है। लोग शांत और संतुष्ट हैं। किसी प्रकार की आपाधापी नहीं। जीवन प्राकृतिक रीति से लयबद्ध है। व्यावसायिक लोभ से मुक्त है। भारत में कई इलाके हैं, जो दूर-दराज और आधुनिकता से कटे हुए हैं, जहां अभाव की वजह से प्रकृति पर निर्भर रहना पड़ता है, पर लक्षद्वीप में ऐसा आभाव नहीं है। सभी सुख-सुविधाएं उपलब्ध होने के बावजूद उनकी जीवनशैली आधुनिकता का ग्रास नहीं बनी है।

वास्तव में लक्षद्वीप एक अनुभव है। यह छोटा-सा द्वीप समूह कुछ दिन में ही सोचने के लिए मजबूर कर देता है कि हमारी जमाखोर संस्कृति हमें किस दिशा में ले जा रही है। यह बताता है कि जिंदगी की बेमुरव्वत, बेवजह बेगार से असल में हाथ पल्ले कुछ नहीं आ रहा है। हम भाग रहे हैं, क्योंकि सब भाग रहे हैं और इस भागमभाग में सुख, धैर्य और शांति को हमने कोहनी मार कर अलग कर दिया है। जरूरत से हट कर लोभ में फंस गए हैं। लोभ हमें लील चुका है। बदहवास से हम खुद अपना समय और क्षमता नष्ट कर रहे हैं।  आधुनिक जिंदगी से व्यक्तिगत तौर पर हमें क्या हासिल हो रहा है, इसका अच्छा दृष्टांत 1966 में किए गए एक अध्ययन से मिलता है। अफ्रीका की एक जनजाति में यह अध्ययन किया गया था। इसके अनुसार यह जनजाति हफ्ते में सत्रह घंटे अपना भोजन जुटाने और उन्नीस घंटे घर और परिवार संबंधी कामकाज में लगाती है। हर दिन वे तेईस सौ कैलोरी खाते हैं, जो शहरी जीवन का भी मानक है। इसके ठीक विपरीत विकसित देशों के लोग हर हफ्ते कम से कम चालीस घंटे खानपान, काम जुटाने में बिताते हैं और छत्तीस घंटे परिवार संबंधी क्रियाकलापों में खर्च करते हैं। दूसरे शब्दों में, शहरी लोगों को अपने आवश्यक रखरखाव के लिए जनजातियों से दो से तीन गुना ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है।

प्रसिद्ध अर्थशास्त्री जॉन मायर्ड कीन्स ने 1930 में अपने एक लेख में कहा था कि जैसे-जैसे हमारे पास उन्नत संसाधन विकसित होते जाएंगे, हम और अमीर होते जाएंगे, जिससे हमारा जीवन स्तर बेहतर होता जाएगा। इस प्रक्रिया के हर चरण में काम के घंटे कम होते जाएंगे और फुर्सत की अवधि बढ़ती जाएगी। फलस्वरूप, हम अपने जीवन का ज्यादा आनंद ले सकेंगे। पर क्या 1930 से 2017 के बीच ऐसा हुआ है? नहीं, हम मूलभूत जरूरतों को पूरा करने में व्यस्त और फिर अतिव्यस्त होते गए हैं। सुखी, संतुष्ट जीवन अब दुरूह, कल्पना मात्र है, क्योंकि लोभ और मोह हमारे सांस्कृतिक मूल्यों की प्राण वायु बन गए हैं। वैसे देखा जाए तो यह प्रवृत्ति केवल चार सौ साल पहले शुरू हुई है। 1600 तक राज्य और सम्राज्य जरूर थे, पर 99.5 प्रतिशत जनसंख्या इससे कटी हुई थी। लगान और कर भी सिर्फ आधा प्रतिशत के बीस से पच्चीस प्रतिशत लोगों से वसूला जा सकता था। बाकी सब अपनी जरूरत भर का उगा लेते थे या फिर आसपास से जुटा लेते थे। उनमें अति ग्रहण की लालसा नहीं थी। पर औद्योगिक क्रांति की शुरुआत होते ही विज्ञान को टेक्नोलॉजी के साथ जोत दिया गया और कुछ समय में ही अति-अर्जन जीवन का हिस्सा बन गया। आज यह सिर चढ़ कर बोल रहा है।

लक्षद्वीप ऐसे ही आधारभूत मुद्दे उठता है। सरल, सीधा, संतुष्ट जीवन भी हो सकता है, इसकी मिसाल पेश करता है। बताता है कि चांद पर पहुंचना मानव मात्र के लिए बड़ी उपलब्धि तो जरूर है, पर उसके एवज में जो हमने खर्च किया है, उसका हिसाब-किताब करना भी जरूरी है। साथ में यह भी प्रश्न उठाता है कि क्या हम आकाश से जुड़ कर अपनी धरती से तो नहीं कट गए हैं या फिर और इकट्ठा करने की होड़ में, बनने-बनाने के लालच में अपने आप को रेत तो नहीं कर रहे हैं? क्या हम लक्षद्वीपीय होने का लक्ष्य अपने सामने रखें या फिर एक और मकान खरीद कर उसकी किश्तों में उलझ कर चूहा दौड़ में लगे रहें? जवाब हम सबको मालूम है, पर उस पर अमल करने की फितरत और हिम्मत शायद हममें नहीं है। और इसीलिए हम अपने निजी लक्षद्वीप वास से वंचित हैं।

 

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