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तीरंदाज- भाषण के आका

वास्तव में नेहरू की सोच की खास बात यह थी कि वह व्यक्ति से निकल कर सामाजिक इंद्रधनुष को मुखरित करती थी, उसके आसमानों को बांधती और धरती के हर कण को रोशन करती थी।
भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू। (फाइल फोटो)

भाषण से ही शासन चलता है और शायद इसीलिए कोई बिरला ही ऐसा शक्तिशाली शासक होगा, जो प्रभावशाली वक्ता न रहा हो। नेतृत्व की पहली मांग ओजस्वी वाणी है, जो एक बड़े समुदाय के उन भावों और अकांक्षाओं को मुखरित करती है, जिनसे उसका सीधा सरोकार होता है। साथ ही वह उस दिशा का भी वर्णन करती है, जिसको ध्रुव मान कर समाज को आगे बढ़ने का सरल नक्शा हासिल हो सके। वास्तव में वक्तव्य दृष्टिपत्र यानी ‘विजन डॉक्यूमेंट’ की तरह होता है, जो वर्तमान समाज से निकल कर आने वाले समाज का प्रेरणा सूत्र बनता है।  समकालीन इतिहास में बहुत सारे नेता ऐसे हुए हैं, जिन्होंने अपने समय को परिभाषित करके आने वाले कल को सिर्फ रेखांकित नहीं किया, उसके लिए योजनागत रूपरेखा भी तैयार की। हिंदुस्तान में महात्मा गांधी इसके बड़े उदाहरण हैं, जिन्होंने सामाजिक कुरीतियों से लेकर समग्र आर्थिक विकास तक का विश्लेषण करके समाज की प्राथमिकताओं को चिह्नित किया था।  उनके साथ और बाद में भी जवाहरलाल नेहरू ने भारत की दशा और दिशा पर अपना गंभीर और मौलिक चिंतन देश के सामने रखा था और प्रधानमंत्री के रूप में उस पर यथाशक्ति कार्य किया था। भारत के इस प्रथम प्रधान सेवक के किसी भी भाषण को अगर हम पढ़ या सुन लें, तो साफ हो जाता है कि वे जिस मुद्दे पर बात कर रहे थे, उस पर उन्होंने व्यापक परामर्श और विश्लेषण के बाद अपनी राय बनाई थी और फिर वक्तव्य दिया था। वास्तव में नेहरू की सोच की खास बात यह थी कि वह व्यक्ति से निकल कर सामाजिक इंद्रधनुष को मुखरित करती थी, उसके आसमानों को बांधती और धरती के हर कण को रोशन करती थी।

नेहरू के समय में ही दुनिया भर में ऐसे राजनायक हुए- जैसे ब्रिटेन में विंस्टन चर्चिल, फ्रांस में चार्ल्स दि गॉल, अमेरिका के जॉन एफ कैनेडी, यूगोस्लाविया के टिटो, इंडोनेशिया के सुकर्णो या फिर मिस्र के नास्सेर- जिन्होंने अपने वक्त को समझते हुए उन विचारों और नीतियों को प्रस्तुत किया, जो कि न केवल उनके देश के हित में थीं, बल्कि दुनिया को भी स्वहित की ओर ले गई थीं। अमेरिका और रूस के बीच जटिल शीत युद्ध के वक्त में उन्होंने पंचशील और गुट निरपेक्ष आंदोलन को स्थापित किया था और बहुत हद तक दुनिया को युद्ध की स्थिति से बचाने में कामयाब हुए थे।दूसरी तरफ लगभग इसी समय में इटली में जोसफ मुसोलीनी, जर्मनी में अडोल्फ हिटलर, रूस में स्टालिन और चीन में माओ भी हुए थे। मुसोलिनी और हिटलर राष्ट्रवाद, रंग भेद और मानव भेद के समर्थक थे। रोचक बात यह है कि दोनों ने अपने समय में व्याप्त आर्थिक और सामाजिक निराशावाद को भुना कर राष्ट्रवाद की नींव रखी थी, जिसकी वजह से दूसरे विश्वयुद्ध का कहर दो पीढ़ियों को झेलना पड़ा था।  हिटलर बहुत अच्छे वक्ता थे। वे अपने भाषणों के प्रति इतने समर्पित थे कि शायद ही उन्होंने कोई प्रमुख वक्तव्य बिना अभ्यास के दिया हो। वे भाषण लिखते थे और फिर शीशे के आगे खड़े होकर उसका अभ्यास करते थे। उनका हर भाषण हल्के सुर से शुरू होकर पंचम सुर तक जाता था और उसका अंत चीख-चिल्लाहट से होता था। इसके दौरान उनकी भाव भंगिमा ऐसी होती जाती थी जैसे उन पर जुड़ी का बुखार चढ़ गया हो। वे आरोप लगाते थे, गुस्सा करते थे, भावुक हो जाते थे, बाल खींचते थे और हाथ-पैर भी पटकने लगते थे। वैसे भाषण का मसौदा हर बार एक ही होता था- जर्मन राष्ट्रवाद, जर्मन अस्मिता, जर्मन श्रेष्ठता- पर उनकी शैली का भंवर ऐसा होता था कि श्रोता उसमें डूबते ही चले जाते थे।

हिटलर की अपेक्षा स्टालिन और माओ शालीन थे। दोनों ही प्रभावशाली वक्ता थे। उनकी वाणी का जादू ही था कि रूस ने उफ भी न की जब स्टालिन ने अपने विपक्षियों की हजारों की संख्या में निर्मम हत्या करवाई थी। कम्युनिस्ट सरकार में सबका साथ, सबका विकास होगा के भाषणगत ओज के जरिए स्टालिन से लेकर गोर्वाच्येव तक रूस के लोगों के साथ अनगिनत अनिष्ट हुए थे। इसी तरह चीन में माओ के ‘लांग मार्च’ के इंद्रजाल में आकर लाखों गरीब चीनी बेमौत मारे गए थे। माओ चीनी अस्मिता और राष्ट्रवाद के सशक्त समर्थक थे, साम्राज्यवाद विरोधी थे और अपने देश में बड़ा परिवर्तन लाने के लिए कटिबद्ध थे। चीन जैसे बड़े और जनसंख्या बहुल देश को जल्दी से बदलना चाहते थे। उनकी दी ग्रेट लीप फॉरवर्ड की नीति- जिसके तहत वे कृषि प्रधान देश को औद्योगिक राष्ट्र में बदलना चाहते थे- का सीधा परिणाम लाखों ग्रामीणों की भुखमरी से मौत थी। माओ, हिटलर, स्टालिन और मुसोलिनी स्वयंभू राष्ट्रीय प्रवर्तक थे, स्वयंभू विचारक थे, जिन्होंने अपनी कोरी कल्पना का उपरोपन वाकशक्ति के माध्यम से जन के मानस में इस तरह किया था कि वह पहले विवेकहीन हो गया था और फिर लाचार हो गया था। माओ ने तीस साल तक प्रधान सेवक के रूप में चीन की सेवा की थी, स्टालिन भी तीस साल राष्ट्रीय समर्पण में लीन रहे थे, जबकि हिटलर सिर्फ दस साल फुहरर का कठिन कर्तव्य देश हित में निभा पाए थे।

हिटलर, माओ आदि तानाशाह थे, जबकि नेहरू, चर्चिल और कैनेडी प्रजातंत्रवादी थे। उन्होंने अपनी वाणी के ओज का प्रयोग आम सहमति बना कर मुद्दों और नीतियों को परिभाषित करने के लिए किया था, जबकि तानाशाहों ने इसका उपयोग अपने पूर्वाग्रहों को स्थापित करने के लिए किया था। उनको यकीन था कि हर मर्ज की दवा उनके पास है और इस दवा के अलावा कोई और इलाज संभव नहीं है। वे भावुक भाषणों और चतुर जुमलों के जरिए इस इलाज की दैनिक खुराक जनता के हलक में उतारने को अमादा थे।
ॉजनतंत्र में भाषण जरूरी है। जन संवाद शुरू करने और खत्म करने के दो सिरों की दूरी एकमात्र भाषण नापता है। वह जन आकांक्षाओं को परिलिक्षित करता है और साथ में जन संतुष्टि की जुबान भी बनता है। वास्तव में नेतृत्व का वक्तव्य आम सहमति का सूचक है, जिसको देश के बुनियादी मूल्यों पर हर बार और बार-बार खरा साबित होना चाहिए। इसमें किसी भी प्रकार की ढिलाई की संभावना नहीं है, क्योंकि नेतृत्व की बात गंभीर क्रियाशील विचार है, जोकि हर जन को लोकतांत्रिक प्रक्रिया से जोड़ती है, उसको सबल करती है, उसको प्रेरित करती है। लोक लुभावन जुमलेबाजी का इसीलिए इसमें कोई स्थान नहीं है।

 

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