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तीरंदाज: संवाद का राजधर्म

अगर देखा जाए तो महाभारत के सौ कौरव और पांच पांडव प्रतिभावान लोग थे। मिल कर या फिर अलग-अलग भी उनमें प्रजाहित करने की बहुत क्षमता थी, पर दुर्भाग्यवश उन्होंने संकीर्णता को अपने पर हावी होने दिया।
देश को “सांस्कृतिक प्रदूषण” से मुक्ति दिलाने और युवाओं में “मूल्यों” का संचार करने के मकसद से केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार स्कूलों और कॉलेजों के पाठ्यक्रम में जल्द ही महाभारत, रामायण और गीता के पाठों को शामिल करेगी।

आजकल खामोश रह कर ही अपनी बुद्धिमत्ता प्रकट की जा सकती है।  कहे गए बोल और खामोशी में लील लिए गए बोल अभिव्यक्ति के दो प्रकार हैं। दोनों का अपना-अपना असर है। इन दोनों में से हम किसी को भी अपना सकते हैं, क्योंकि अगर हम बोलने के लिए स्वतंत्र हैं, तो न बोलने के लिए भी उतने ही स्वतंत्र हैं। खासकर तब जब हम मानने लगें कि न बोलना, बोलने से ज्यादा बड़ा और बेहतर विकल्प है।  वैसे बोलना प्राकृतिक क्रिया है और उसमें अपने आप में कोई दोष नहीं है। समाज में मेल-मिलाप यानी समाजीकरण बोलचाल से ही होता है। संवाद इस प्रक्रिया का अहम हिस्सा है, जिससे एक से एक मिल कर ग्यारह बनते हैं और उन व्यवस्थाओं की नींव पड़ती है, जिनकी वजह से हम एक मजबूत मंच पर खड़े हो सकते हैं। वास्तव में संवाद हर दृष्टि से एक मूलभूत सामाजिक मानवीय प्रक्रिया है और उससे जब भी हम हटते हैं, तो अपना बड़ा नुकसान करते हैं।

संवाद कैसे हो और किनसे हो? क्या हर व्यक्ति की इसमें हिस्सेदारी जरूरी है? क्या संवाद की शुरुआत मूल मुद्दों को चिह्नित करके हो, जिसमें पहली और जरूरी भूमिका उन कुछ लोगों की हो, जो विषय-विशेष की जानकारी रखते हों या फिर कहीं से सिरा पकड़ कर बहस शुरू कर दी जाए, जिसमें सबसे ऊंचा बोलने वाले को ही तर्कसिद्ध मान लिया जाएगा?
इतिहास बहुत सारी मिसालें देता है। पूर्व वैदिक और वैदिक काल से ही कई तरह के नियम प्रचिलित हैं, जिनमें सबसे पहला नियम यह है कि कुछ लोग ही सबके कल्याण के लिए विचार करें। ये लोग आपस में वाद-प्रतिवाद के माध्यम से वे मूल्य सिद्धांत बनाएं, जिनके जरिए लोक-व्यवस्था कायम हो और उस व्यवस्था से लोक कल्याण हो। इस संदर्भ में वैदिक काल की सबसे बड़ी और दीर्घकालीन उपलब्धि धर्म को परिभाषित कर के सर्वमान्य आदर्शों की स्थापना करना था, जो सुलभ और सहज हो और प्राकृतिक नियमों पर जरूर टिका हो। वैदिक काल के शास्त्रियों का मानना था कि कोई भी आचरण या विधा, जो प्राकृतिक नहीं है, सनातन नहीं हो सकती।

वास्तव में अगर देखा जाए तो वैदिक और पूर्व वैदिक काल का छोटा-सा समाज आज के विशाल समाज से कही अधिक विविधता भरा था। अलग-थलग पड़े हुए सैकड़ों समुदाय आपस में जुड़ रहे थे। हर का अपना एक तौर-तरीका था, अपनी जीवन-शैली थी, जिसको सम्मान पूर्वक एक धागे में पिरोना था। इसके लिए एक बड़ी संकल्पना का होना जरूरी था- एक ऐसा बड़ा विचार, जिसकी छतरी तले जीवन शैलियों के विरोधाभास लगभग खत्म हो जाएं या फिर उनको आसानी से संचालित किया जा सके। ऋषि-मुनियों ने धर्म की धारणा स्थापित की, जिसका कोई एक सर्व शक्तिमान प्रचारक नहीं था। उन्होंने उसकी कोई जरूरत भी नहीं, समझी क्योंकि अंतिम सत्य जानने के लिए हर व्यक्ति अपनी-अपनी प्रकृति के अनुसार स्वतंत्र था।  धर्म सिर्फ रीति-रिवाज और प्रार्थना का तरीका नहीं माना गया था। वह एक मूल सिद्धांत था, जिसकी बुनियाद पर समाज की हर जरूरत को परिभाषित किया गया था। रामायण में श्रीराम का चरित्र रोजमर्रा की परस्पर क्रियाओं के आदर्श स्थापित करता है- व्यक्तिगत रिश्तों से लेकर राजपाट की विषमताओं तक का मूल संदेश वह सहज और प्राकृतिक रूप से देता है। यही वजह है कि राम और रामराज आज तक प्रासंगिक है।

द्वापर युग से त्रेता युग के आते-आते समाज सरल से जटिल हो गया था। महाभारत उसी जटिलता का वर्णन करती है, जिसमें धर्म का आदर्श तो था, पर जोर उसके नियम पालन पर ज्यादा हो गया था। धर्म की जीवात्मा लुप्त होने लगी थी और उसकी जगह लकीर के फकीर परिपक्व होने लगे थे। द्रौपदी के चीर हरण में सारी सभा अपने-अपने कर्तव्यों से बंधी रही और नारी के स्वाभिमान की रक्षा के धर्म को भूल गई। बहस और प्रतिक्रिया असली मुद्दे पर नहीं थी, बल्कि संकीर्ण नियमों पर थी- जैसे हस्तिनापुर के प्रति निष्ठा या फिर चौपड़ में हारे हुए लोगों का कर्तव्य। राम के समय में ऐसा नहीं था। तब कर्तव्य निर्वाह से धर्म नहीं बनता था, बल्कि धर्म से कर्तव्य बनते थे।
श्रीकृष्ण ने शायद धर्म की पुन: स्थापन की बात इसीलिए महाभारत काल में की थी, क्योंकि वे जानते थे कि शीर्ष नेतृत्व सारगर्भित धर्म से हट कर संकीर्ण नियमों पर केंद्रित हो गया था। महाभारत के चरित्र धर्म को ठीक उसी तरह परिभाषित कर रहे थे, जैसे कि एक अंधा हाथी की पंूछ छूकर पूरे हाथी का वर्णन कर देता है। उनकी आंखें खोलना जरूरी हो गया था। श्रीमद्भगवद्गीता के उपदेश का उद्देश यही था।  अगर देखा जाए तो महाभारत के सौ कौरव और पांच पांडव प्रतिभावान लोग थे। मिल कर या फिर अलग-अलग भी उनमें प्रजाहित करने की बहुत क्षमता थी, पर दुर्भाग्यवश उन्होंने संकीर्णता को अपने पर हावी होने दिया। व्यापक प्राकृतिक धर्म को छोड़ कर वे अपने कृत्रिम अधिकार स्थापित करने में लग गए थे। ऐसी स्थिति में वाद या संवाद की संभावना बची ही नहीं थी। सिर्फ युद्ध होना था।

संवाद विहीनता युद्ध ही कराती है। भीड़ और भीड़ में वाद-विवाद भी युद्ध ही करवाता है। संवाद जानकार लोगों के बीच होता है, जिसका विनियमन उस काल का नेतृत्व करता है। नेतृत्व मुद्दे ही नहीं चिह्नित करता, बल्कि उन लोगों को भी चिह्नित करता है, जो बहसबाजी से हट कर सकारात्मक संवाद कर सकें। इन्हीं अराजनीतिक हिस्सेदारी से सामाजिक और फिर राजनीतिक हिस्सेदारी बनती है। राम ने भी यही किया था और कृष्ण ने भी। कृष्ण तो खुद दर्शनशास्त्री पहले थे और राजा बाद में थे।वास्तव में हर काल में सामाजिक और राजनीतिक नेतृत्व के लिए जरूरी है कि वह धर्म-विचार की विशालता को अपनाए और धर्म-आचार की संकीर्णता में न फंसे। पर हो उल्टा रहा है।विचार त्याग कर नित्यकर्मों में सबको लपेटा जा रहा है। लोकतंत्र में यह तरीका अपनाना शायद आसान है, क्योंकि लोक के नाम पर भीड़ जुटाई जा सकती है और फिर संवाद के लिए जानकारों को ललकारा जा सकता है। ऐसी स्थिति में बुद्धिमत्ता इसी में है कि खामोश हो जाया जाए और भीड़ उवाच को अंतिम सत्य तब तक माना जाए जब तक प्रत्याख्यान की गुंजाइश पैदा न हो या फिर भीड़ अपनी महाभारत में ही तहस-नहस नहीं हो जाती है।

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