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प्रसंगवश- घर बाहर के बीच

घर के साथ नौकरी का जैसा दबाव महिलाओं पर होता है, पुरुष न तो वैसा दबाव झेलते हैं और न ही नियोक्ता से लेकर घर-समाज उनसे वह अपेक्षा करता है।

Author November 26, 2017 5:29 AM
इस तस्वीर का इस्तेमाल केवल प्रतीक के तौर पर किया गया है।

इधर कुछ सालों में महिलाओं को लेकर सरकार और समाज के नजरिए में कुछ फर्क आया है। घरेलू भूमिकाओं को छोड़ कर अध्यापन, बैंकिंग, आईटी और पत्रकारिता जैसे पेशों में उनकी मौजूदगी देखी जा सकती है, लेकिन नौकरी हो या व्यवसाय, दोनों क्षेत्रों में अभी लगता है कि खुद महिलाओं में कोई हिचक है। भले उनसे अपेक्षा है कि वे पुरुषों के कंधे से कंधा मिला कर काम करें, पर कई काम-धंधे हैं, जहां महिलाओं की उपस्थिति नगण्य है। यह बेवजह नहीं है। इसके पीछे सामाजिक दबाव हैं, असुरक्षा का माहौल है। इसी के मद्देनजर हाल में महिला और बाल विकास मंत्रालय ने दफ्तरों में यौन उत्पीड़न की शिकायत करने की एक व्यवस्था- शी बॉक्स के जरिए बनाई है।  दरअसल, कामकाज की स्थितियां स्त्रियों को नहीं, बल्कि पुरुषों को ध्यान में रख कर बनाई गई हैं। ऐसे में चाह कर भी महिलाएं कई नौकरियों और बिजनेस में नहीं आती हैं और अगर आती भी हैं, तो वहां ज्यादा टिकती नहीं हैं।

घर के साथ नौकरी का जैसा दबाव महिलाओं पर होता है, पुरुष न तो वैसा दबाव झेलते हैं और न ही नियोक्ता से लेकर घर-समाज उनसे वह अपेक्षा करता है।
इस संदर्भ में एक छोटी पहल हुई है। पिछले साल, दिल्ली स्थित पर्सनल केयर उत्पाद बनाने वाली एक कंपनी ने महिलाकर्मियों के लिए एक खास छुट्टी का प्रावधान किया था। इस कंपनी ने महीने में दो दिन ऐसी छुट्टियां महिला कर्मचारी को देने की नीति बनाई, जब वे मासिक चक्र से गुजर रही हों। भारत में ऐसी व्यवस्था करने वाली यह पहली कंपनी मानी गई, हालांकि दुनिया में भी कुछ ही विकसित देशों में ऐसे प्रावधान हैं। उल्लेखनीय है कि विश्व स्तर पर इन छुट्टियों का प्रावधान सबसे पहले जापान में 1947 में किया गया था, जो बाद में दक्षिण कोरिया, ताइवान और इंडोनेशिया जैसे कुछ देशों में कुछ कंपनियों द्वारा अपनाया गया।

महिला कर्मचारियों की जरूरतों में सबसे बड़ी मुश्किल तब आती है, जब वे विवाह करके अपना घर बसाती हैं और मातृत्व की ओर बढ़ती हैं। भारत जैसे विकासशील देशों में ही नहीं, अमेरिका जैसे विकसित देशों में भी स्त्रियों का रोजगार- खासकर किसी अच्छी कंपनी में नौकरी इस कारण खतरे में पड़ जाती है। वहां भी युवावस्था में नौकरी शुरू करने वाली स्त्रियां विवाह और मातृत्व के वक्त जब लंबी छुट्टियां लेती हैं तो इसकी गारंटी नहीं होती कि वे नौकरी में वापस आ पाएंगी। अगर वे लौटती हैं तो एक पिछड़ेपन के साथ। यानी या तो वे अपने ही सहकर्मियों से करिअर की रेस में पिछड़ जाती हैं या फिर उन्हें मातृत्व की अपनी योजना को लंबे समय तक टालना पड़ता है।

उल्लेखनीय है कि नौकरी या अध्ययन के दौरान मातृत्व से जुड़े सवालों पर भारत में भी कुछ दुविधाएं प्रकट होती रही हैं, जिन पर अदालत को दखल देना पड़ा है। सात साल पहले दिल्ली हाई कोर्ट ने दिल्ली यूनिवर्सिटी की लॉ फैकल्टी की दो विवाहित गर्भवती छात्राओं की याचिका पर दिए अपने फैसले में हाजिरी से छूट देने का आदेश दिया था। गर्भधारण के कारण इन छात्राओं की उपस्थिति निर्धारित संख