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पश्चिमी संगीत और युवा

पुरानी हिंदी फिल्मों में अक्सर गांव से आकर शहर में पढ़ने-लिखने वाले किसी लड़के को शहर के किसी धनीमानी परिवार की लड़की से प्रेम हो जाता है और उसका चरम होता है उस पार्टी में लड़के के अपमान से।

Author June 18, 2017 1:42 AM
प्रतीकात्मक चित्र।

मणींद्र नाथ ठाकुर   
पिछले कुछ दशक में संगीत सुनने का चलन काफी बढ़ा है। संगीत का बाजार व्यापक हुआ है। इसके साथ-साथ संगीत का स्वरूप भी काफी बदला है। खासकर भारत में इस क्षेत्र में बहुत तेजी से प्रयोग हो रहे हैं और युवा पीढ़ी का आस्वाद भी उसी तेजी से बदलता दिख रहा है। हाल के कुछ सालों में संगीत के क्षेत्र में रैप और हिपहॉप जैसे चलन से जैसी तोड़-फोड़ हुई है और युवाओं में इनकी लोकप्रियता दिनों-दिन बढ़ रही है उसे देखते हुए स्वाभाविक रूप से कुछ सवाल उठने लगे हैं। पूछा जाने लगा है कि क्या इससे हिंदुस्तानी संगीत का शास्त्रीय मिजाज बदलेगा? अभी तक जो फिल्मी गीत शास्त्रीय धुनों से सूत्र ग्रहण किया करते थे, अब उनका रुख भी रैप, हिपहॉप जैसे प्रयोगों की तरफ देखा जाने लगा है। संगीत की लय और भाषा में काफी टूट-फूट हुई है। यह कैसे और क्यों संभव हुआ? इस बदलते आस्वाद के पीछे क्या वजह है? यह संगीत युवा पीढ़ी में क्यों लोकप्रिय हो रहा है। इस बार इन्हीं पहलुओं पर चर्चा। – संपादक

क्या संगीत की धुनों, उसके बोलों का कोई प्रभाव व्यक्ति के जीवन दर्शन, उसके व्यक्तित्व पर पड़ता है? अगर ऐसा है तो क्या भारतीय संगीत और पश्चिमी संगीत के प्रभाव में कोई फर्क है? या फिर क्या खास तरह के संगीत की पसंद का व्यक्ति के व्यक्तित्व से कोई लेना-देना है? कई वर्ष पहले मैंने किसी बच्चे से उसके दो दोस्तों में अंतर करने को कहा था। उसका जवाब बड़ा रोचक था। उसने कहा कि एक शांत है, आराम से बातें करता है, थोड़ा चुप-चुप रहता है, और अंगरेजी गाने पर भारतीय शास्त्रीय संगीत के तड़के की तरह है। दूसरा पूरा अंगरेजी गाने वाला है, उसमें भी पॉप म्यूजिक वाला- जोर से बोलता है, किसी भी बात पर हल्ला करेगा और मस्ती के चक्कर में रहता है। पहली बार मेरा ध्यान इस सवाल पर गया कि क्या सचमुच संगीत और जीवन दर्शन में, व्यक्तित्व में कोई संबंध है।  भारतीय ज्ञान परंपरा में तो ध्वनि विज्ञान काफी विकसित है। ध्वनि का प्रभाव इतना व्यापक है कि कहते हैं इससे प्रकृति के नियमों को भी प्रभावित किया जा सकता है। ध्वनि ऊर्जा है और इसका व्यापक प्रभाव संभव है। ज्ञान की देवी सरस्वती के हाथ में पुस्तक के अलावा वीणा है और वह भी दो हाथों में। इसका विश्लेषण यह हो सकता है कि इस ज्ञान परंपरा में ध्वनि का बहुत महत्त्व है। अगर यह सही है तो फिर निश्चित रूप से यह माना जा सकता है कि संगीत के शब्द और ध्वनि का प्रभाव मनुष्य के व्यक्तित्व और जीवन पर जरूर पड़ता होगा। और अगर ऐसा मान लें तो यह जानना भी रोचक होगा कि अलग-अलग तरह के पश्चिमी संगीत और भारतीय रागों का क्या प्रभाव होगा और प्रश्न को थोड़ा व्यापक करें तो यह समझना भी रोचक होगा कि समाज के व्यवहार और संगीत का क्या संबंध हो सकता है। इन सवालों को पटल पर रख देने मात्र से समाजशास्त्र के लिए एक नए शोध क्षेत्र का द्वार खुल जाता है। शायद गांधी के भजन और उनकी अहिंसा की उनकी राजनीति में भी संबंध खोजना संभव हो सके।
संगीत के मनोविज्ञान पर काम करने वाले शोधकर्ता एड्रीयन नॉर्थ ने लगभग छत्तीस हजार लोगों का अध्ययन कर निष्कर्ष निकाला है कि किसी के संगीत की पसंद से उस व्यक्ति के बारे में बहुत कुछ जाना जा सकता है। मसलन, पश्चिमी शास्त्रीय संगीत सुनने वाले लोग शांत और रचनात्मक होते हैं, जबकि हिपहॉप पसंद करने वाले ज्यादातर लोग पार्टी पसंद करने वाले धूम-धड़का करने वाले होते हैं।

भारत में पश्चिमी संगीत को पसंद करने वाले ज्यादातर शहरी उच्च मध्यवर्गीय लोग होते हैं। केवल पूर्वोत्तर राज्य इसके अपवाद हो सकते हैं। खासकर शिलांग शहर में पश्चिमी संगीत को किसी खास वर्ग से जोड़ना सही नहीं भी हो सकता है। शेष भारत में पश्चिमी संगीत का सुनिश्चित वर्गीय आधार है। इसके विस्तार का एक कारण अंगरेजी माध्यम के पब्लिक स्कूलों में इसका फैशन होना और स्टेटस सिंबल होना भी है। इन विद्यालयों में हिंदी भाषा, साहित्य या सिनेमा के बारे में बातें करना स्तरहीनता का प्रतीक माना जाता है। इसके साथ ही हिंदी गानों का यहां चलन न के बराबर है। मामला किसी एक के बेहतर या खराब होने का नहीं, बल्कि समाज के बदलते स्वरूप का है। समाज के मूल्यबोधों में जो अंतर है, वही अंतर संगीत के मूल्यों में भी हो तो आश्चर्य की बात नहीं। संगीत समाज के आदर्श मूल्यों का वाहक होता है और शायद इसके माध्यम से समाज अपने मूल्यों को नई पीढ़ियों तक पहुंचाने का प्रयास करता है। इसलिए अगर भारतीय संगीत पसंद करने वाले पिता और पश्चिमी संगीत की थाप पर नाचने वाले पुत्र के बीच पीढ़ियों का अंतर जरूरत से ज्यादा लगे, तो संगीत की पसंद से उसे जोड़ कर देखना अनुचित न होगा। कई घरों में पिता और पुत्र के बीच की इस दूरी को आसानी से महसूस किया जा सकता है। पिता को जल्दी सोने की आदत है और पुत्र दोस्तों के साथ पश्चिमी संगीत की धुन पर देर रात तक नाचना चाहता है। मां उनके बीच समझौता कराती पाई जाती है। यह भारत के शहरी समाज में घर-घर की कहानी है।

हिंदी सिनेमा में भी इस सांस्कृतिक तनाव को आसानी से देखा जा सकता है। पिता-पुत्र के अलावा सिनेमा जगत में प्रेमी-प्रेमिका के बीच भी संगीत की संस्कृति से उपजे इस तनाव को देखा जा सकता है। पुरानी हिंदी फिल्मों में अक्सर गांव से आकर शहर में पढ़ने-लिखने वाले किसी लड़के को शहर के किसी धनीमानी परिवार की लड़की से प्रेम हो जाता है और उसका चरम होता है उस पार्टी में लड़के के अपमान से। इन पार्टियों में अक्सर पश्चिमी संगीत की धुन पर लड़की के पिता के समकक्ष वर्गीय चरित्र के घरों के बच्चे होते हैं, जिनके सामने कई बार लड़की अपने वर्गीय चरित्र के विरोध में खड़ी हो जाती है और कई बार ऐसा नहीं भी कर पाती है। इसी तरह हिंदी सिनेमा में पश्चिमी संगीत के माहौल का एक और स्वरूप दिखता है डिस्को क्लब में। यहां लड़के-लड़कियां सिगरेट से उठते धुएं के बीच नशे में धुत नाचते दिखते हैं। अक्सर यह होता है कि डांस करते-करते कुछ शोहदे लड़के ‘भारतीय संस्कृति’ की सीमा को पार कर जाते हैं और फिर लड़की विरोध करती है। इसी बीच उसका दोस्त जो भारतीय जैसा दिखता है उन शोहदों की खबर लेता है। फिर उन दोनों के बीच दोस्ती का नया दौर शुरू होता है। यहां से उस पश्चिमी-सी दिखने वाली लड़की का संगीत प्रेम भी बदल जाता है और अब दोनों मिल कर भावपूर्ण हिंदी संगीत से दर्शकों का मनोरंजन करते हैं। ऐसी कहानी अनगिनत हिंदी फिल्मों में मिल जाएगी। हालांकि जबसे मल्टीप्लेक्स का जमाना आया है, दर्शकों का स्तर भी बदल गया है। अब बहुत-सी फिल्में केवल शहरी मध्यवर्ग के लिए बनती हैं, जिसमें यह तनाव लगभग खत्म हो गया है। आखिरी बार यह तनाव अस्सी के दशक की एक फिल्म ‘स्वर संगम’ में दिखता है। गिरीश कर्नाड ने शास्त्रीय संगीत के विशारद की भूमिका निभाई है और बखूबी पश्चिमी संगीत से इसके अंतर को स्पष्ट किया है। शायद शास्त्रीय संगीत और पश्चिमी संगीत के तनाव का यह चरम रहा होगा, क्योंकि उसके बाद से ही पश्चिमी संगीत ने भारतीय मध्यवर्ग के युवा मानस पर अपना वर्चस्व स्थापित कर लिया है।

हाल में युवाओं के बीच भारतीय संगीत और संस्कृति में रुचि बढ़ाने के लिए एक स्वयं सेवी संस्था ने इस क्षेत्र में काफी काम किया है। ‘सोसाययटी फॉर द प्रोमोशन आॅफ इंडियन क्लासिकल म्यूजिक ऐंड कल्चर अमांग यूथ’ (स्पिक मैके) नाम की इस संस्था ने शिक्षण सस्थानों में कार्यक्रम आयोजित कर छात्रों को भारतीय संगीत की ओर आकर्षित करने का काम किया है। पिछले कुछ वर्षों से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने भी प्रतियोगिताएं आयोजित कर इस प्रयास को आगे बढ़ाया है। यह कहना कठिन है कि इस प्रयास का सामाजिक प्रभाव क्या होगा। लेकिन इतना जरूर है कि विद्यालायों ने जिस तरह हिंदी साहित्य और संगीत को खारिज कर दिया था, उसमें शायद कुछ अंतर जरूर आएगा।
इस तर्क का कि भारतीय संगीत का पश्चिमी संगीत की तुलना में सामाजिक प्रभाव ज्यादा शांतिदायक होगा, यह मतलब बिलकुल नहीं है कि इसे राष्ट्रवादी तर्क से जोड़ा जाए। यह संगीत के मनोवैज्ञानिकों और समाजशास्त्रियों के शोध का विषय होगा। सूफी संगीत और असमी लोकगीतों पर काम करने वाले शोधार्थी दीपांजलि डेका का मानना है कि संगीत से स्वास्थ्य का भी संबंध है। अलग-अलग लोगों के स्वभाव और मानसिक संरचना के हिसाब से अलग-अलग तरह के संगीत का प्रभाव देखा जा सकता है। इसलिए दुनिया भर के संगीत का संकलन होना चाहिए, ताकि विभिन्न तरह के लोगों पर उसके प्रभावों का अध्ययन किया जा सके। संगीत को राष्ट्र से बांध कर देखना उचित नहीं होगा। इसे तो संपूर्ण मनुष्य जाति की संपदा के रूप में देखा जाना चाहिए।

 

 

 

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