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वक्त की नब्जः पाकिस्तान में नया निजाम

भारत के लिए सवाल यह है कि पाकिस्तान के भावी प्रधानमंत्री का इस्लामी झुकाव उनकी विदेश नीति को कितना प्रभावित करेगा। चुनाव अभियान शुरू होने से पहले इमरान ने कई बार कहा कि कश्मीर का मसला हल किए बगैर भारत के साथ अमन-शांति लाना मुश्किल है।

Author July 29, 2018 4:48 AM
इमरान खान

इमरान खान को मैं एक अरसे से जानती हूं। पहली बार पाकिस्तान के भावी प्रधानमंत्री से मैं तब मिली थी, जब सत्तर के दशक में वे दिल्ली आए थे क्रिकेट का बेनीफिट मैच खेलने, वरिष्ठ भारतीय क्रिकेटर अब्बास अली बेग के लिए। उस समय वे क्रिकेट के चमकते सितारे नहीं थे, लेकिन दो या तीन साल बाद इतने बड़े सितारे बन गए कि जब दोबारा भारत आए पाकिस्तान की क्रिकेट टीम के सदस्य बन कर, तो मुझे संडे मैगजीन के संपादक एमजे अकबर ने उनसे इंटरव्यू करने का काम सौंपा। ऐसा हुआ कि मैं दफ्तर में अपने काम में मसरूफ थी एक दिन, कि अकबर को यह कहते सुना कि किसी भी हाल में उनको इमरान खान का इंटरव्यू चाहिए। मैंने जब पूछा कि क्या वे क्रिकेटर इमरान खान की बात कर रहे हैं, तो अकबर ने कहा कि संडे मैगजीन के कवर पर इंटरव्यू छापने को तैयार हैं अगर मिल जाए, क्योंकि इमरान ‘सेक्स सिंबल’ बन गए हैं भारतीय उप-महाद्वीप के।

मैंने जब उनसे कहा कि मैं इमरान को जानती हूं अच्छी तरह, लेकिन क्रिकेट के बारे में मेरी जानकारी कमजोर है, तो उन्होंने कहा कि इंटरव्यू फिर भी उन्हें चाहिए। उसी शाम को मैं इमरान से मिली और जब मैंने उनसे कहा कि मुझे उनका इंटरव्यू करना है संडे मैगजीन के लिए, तो मजाक समझ कर वे इंटरव्यू के लिए राजी हो गए। हंसी-मजाक में इंटरव्यू दे भी दिया, जिसमें मेरे सारे सवाल इसको लेकर थे कि उनको क्या महसूस होता है जब उन्हें ‘सेक्स सिंबल’ कहा जाता है। इंटरव्यू संडे मैगजीन के कवर पर छपा और मैगजीन की यह प्रति इतनी बिकी कि अकबर ने मुझे पाकिस्तान के पूरे क्रिकेट टूर को कवर करने का काम सौंप दिया, यह कहते हुए कि मुझे खेल के मैदान के बाहर जो कुछ होता है उसके बारे में लिखना होगा। इस मकसद से मुझे बंगलुरु और मुंबई भेजा गया और उस दौरे में मैंने अपनी आंखों से देखा कि किस हद तक अपने देश की औरतें इस पाकिस्तानी क्रिकेटर पर फिदा थीं।

उस समय अगर मुझे कोई कहता कि इमरान आगे जाकर राजनेता बनेंगे, तो मैं उनको पागल समझती, क्योंकि न समाजसेवा में इमरान की कोई रुचि थी और न ही राजनीति में। समाजसेवा में उनको रुचि तब शुरू हुई जब उनकी मां को कैंसर हो गया और उनको बचाना नामुमकिन था, क्योंकि पाकिस्तान में अच्छे कैंसर अस्पताल नहीं थे। सो, क्रिकेट का विश्व कप पाकिस्तान के लिए जीतने के बाद जब इमरान ने कप्तानी छोड़ी, तो उन्होंने ठान लिया कि अपनी मां के नाम से एक कैंसर अस्पताल बनाएंगे लहौर में और ऐसा उन्होंने करके दिखाया।

इस अस्पताल के निर्माण के जरिए इमरान की रुचि राजनीति में होने लगी, क्योंकि उनको महसूस हुआ कि उनके देश के आम लोग कितने गरीब, अशिक्षित और बेहाल हैं। सो, जब पिछले हफ्ते चुनाव जीतने के बाद इमरान ने अपने पहले वक्तव्य में कहा कि वे प्रधानमंत्री निवास में नहीं रहेंगे, इसलिए कि जिस देश की आधी आबादी गरीबी की रेखा के नीचे रहती हो, वहां राजनेताओं को शाही महलों में रहने का कोई हक नहीं होना चाहिए, मुझे कोई आश्चर्य नहीं हुआ। न ही मुझे आश्चर्य हुआ कि इमरान भ्रष्टाचार को समाप्त करने की लड़ाई लड़ना चाहते हैं। आश्चर्य अगर है तो सिर्फ इस बात को लेकर कि वे इस हद तक कट्टरपंथी इस्लाम से प्रभावित हो गए हैं कि उनको तालिबान खान कहते हैं उनके आलोचक।

कट्टरपंथी इस्लाम से प्रभावित हुए हैं इमरान कुछ इसलिए कि राजनीति में आने के बाद उन्होंने खुल कर अमेरिका की उस जंग का विरोध किया है, जो 9/11 वाले हमले के बाद अफगानिस्तान और पाकिस्तान में लड़ा जा रहा है जिहादी तन्जीमों को खत्म करने के लिए। दूसरा कारण है कि जबसे उनकी मुलाकात उनकी वर्तमान और तीसरी बीवी से हुई है, वे और भी ‘अच्छे मुसलमान’ बन गए हैं, क्योंकि उनकी बीवी और उनकी धार्मिक मर्गदर्शक को लोग पिंकी पीरनी कहते हैं।

भारत के लिए सवाल यह है कि पाकिस्तान के भावी प्रधानमंत्री का यह इस्लामी झुकाव उनकी विदेश नीति को कितना प्रभावित करेगा। चुनाव अभियान शुरू होने से पहले इमरान ने कई बार कहा कि कश्मीर का मसला हल किए बगैर भारत के साथ अमन-शांति लाना मुश्किल है। ऊपर से यह भी कहा है अपने कई बयानों में कि नरेंद्र मोदी के दौर में मुसलमानों पर अत्याचार बढ़ गया है भारत में। समस्या यह भी है कि जिन लोगों को हम भारत में जिहादी आतंकवादी मानते हैं, उनको इमरान इस्लाम के मुजाहिद मानते हैं।
बिल्कुल इसी तरह की बातें करते हैं पाकिस्तान के जरनैल, जिन्होंने आज तक विदेश और रक्षा नीतियों के सारे फैसले किए हैं। जब भी कोई लोकतांत्रिक तरीके से चुना हुआ पाकिस्तानी राजनेता इन दोनों क्षेत्रों में दखल देने की कोशिश करता दिखा है, उसको निकाल दिया गया है। माना जाता है कि पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को हटाने का मुख्य कारण यही था कि उन्होंने भारत के साथ शांति बहाल करने की कोशिश की थी।

इमरान ने खुद चुनाव अभियान के दौरान अपने कई भाषणों में नवाज शरीफ की इस कोशिश को नकारा है। कहने का मतलब यह है कि इमरान खान के आने से न कश्मीर में आतंकवाद रुकने वाला है और न ही नए सिरे से पाकिस्तान के साथ रिश्ता जोड़ने की कोई बात होने वाली है। अमन-शांति लाने का काम रहेगा पाकिस्तानी सेनाध्यक्ष के हाथों में। पाकिस्तानी सेना के हित में नहीं है, शांति बहाल होना, इसलिए कि सेना की अहमियत और शक्ति कम होने लगेगी। सो, अमन-शांति का सपना फिलहाल सपना ही रहने वाला है।

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