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मिथक और सिनेमा

भारतीय सिनेमा पहली बार मिथक और संस्कृति को समेटे हुए परदे पर झिलमिलाया। दादा साहेब फालके लोकजीवन में प्रसिद्ध ‘राजा हरिश्चंद्र’ की कथा के साथ अवतरित हुए।

Author January 14, 2018 05:23 am
चित्र का इस्तेमाल प्रतीक के तौर पर किया गया है।

राजकुमार 

भारतीय सिनेमा पहली बार मिथक और संस्कृति को समेटे हुए परदे पर झिलमिलाया। दादा साहेब फालके लोकजीवन में प्रसिद्ध ‘राजा हरिश्चंद्र’ की कथा के साथ अवतरित हुए। उसके बाद रामायण, महाभारत और अन्य मिथकीय-धार्मिक महाकाव्यों, चरित्रों पर फिल्म बनाने का सिलसिला चल पड़ा। रामलीला, रासलीला, पंचतंत्र के साथ अन्य लोककथाएं और लोकनाट्य तथा फैंटेसी वाचिक-मौखिक परंपराओं के माध्यम से भारतीय मानस में पहले से मौजूद थे। नए माध्यम के दृश्यात्मक प्रभाव ने इसे जीवंत कर दिया। नतीजतन, मिथकीय कथाएं फिल्म का अनिवार्य हिस्सा हो गर्इं। सैकड़ों फिल्में मिथकीय कथाओं पर बनीं। भारत ही नहीं, दुनिया के सभी देशों में मिथ कथाएं रजत पट का हिस्सा बनी हैं।
समस्या तब उत्पन्न होती है जब इतिहास और मिथक एक-दूसरे के साथ लिपटे होते हैं। कुछ लोग मिथक को ही इतिहास मान लेते हैं और कुछ लोग इतिहास के साथ मिथक की तरह व्यवहार करते हैं। जरूरत इस बात की होती है कि इतिहास और मिथक के बीच के बारीक फर्क को समझा जाए। अपने इतिहास और धार्मिक मान्यताओं, मिथकों के साथ कोई भी वर्ग, जाति, संप्रदाय, समुदाय या राष्ट्र छेड़छाड़ नहीं चाहता है। उनके साथ उनकी सदियों की आस्थाएं और भावनाएं जुड़ी होती हैं। इसके तंतु इतने नाजुक होते हैं कि मामूली फेरबदल या छेड़छाड़ से ही समुदाय या वर्ग विशेष की भावनाएं भड़क उठती हैं। आहत भावनाएं अपनी अस्मिता के साथ खिलवाड़ मानती हैं। जबकि जरूरत इस बात की होती है कि उसे तर्क या विवेक की कसौटी पर कसा जाए। समझा जाए कि एक ही चरित्र या कथा के कई अलग-अलग रूप अलग-अलग समाजों या एक ही समाज में मौजूद हैं। कलाकार, लेखक, फिल्मकार के साथ कथाएं बदलती हैं। उस पर अपने समय के दबावों की निशानियां मौजूद होती हैं। कई बार कथा की मूल भावनाएं और कथ्य भी बदल जाते हैं। कथा के ढांचे या अंतर्वस्तु में क्रांतिकारी परिवर्तन होता है, तो उसे स्वीकृति मिलने में बहुत वक्त लगता है। क्योंकि अमिट छाप की तरह पड़ी कथाओं को समाज की मानसिक संरचना में फिर से टंकित करना जोखिम भरा काम होता है। समुदाय या वर्ग विशेष की भावनाएं इसी बिंदु पर उभरती हैं।

पर मिथकीय चरित्रों और आख्यानों में ही लेखक या फिल्मकार सर्वाधिक छूट ले पाता है, क्योंकि रचनात्मक छूट के लिए सर्वाधिक संभावनाएं इसी शैली में होती हैं। रोलां बार्थ भी मानते हैं कि मिथक ‘कहन’ का ही एक प्रकार है। यह संदेशों को संप्रेषित करने की एक व्यवस्था है। जाहिर है, ‘संदेशों’ को सही परिप्रेक्ष्य में डिकोड किया जाए। परिप्रेक्ष्य गलत होने पर अर्थ संकुचित और गलत होने के खतरे बने रहते हैं। मलिक मुहम्मद जायसी के ‘पदमावत’ पर कई फिल्में भारतीय और विदेशी भाषाओं में बनीं। फिलहाल जसवंत झावेरी की बनी फिल्म ‘महारानी पद्मिनी’ (1964), मणि कौल की ‘द क्लाउड डोर’ (1994) और संजय लीला भंसाली की आने वाली फिल्म पदमावत पर विचार करें। भंसाली की फिल्म में मिथक और इतिहास के सवाल उलझ गए हैं। फिल्मकार का दावा है कि फिल्म मलिक मुहम्मद जायसी कृत ‘पदमावत’ पर आधारित है। अगर यह दावा सही है तो कवि के विचारों पर सर्वाधिक भरोसा करना चाहिए। जायसी का उद्देश्य इतिहास रचना नहीं था। वे ऐसी प्रेम कथा कहना चाहते थे, जिसे सुन कर लोगों में प्रेम की पीड़ा की अनुभूति हो। रत्नसेन, अलाउद्दीन, पदमावती सब मर गए- ‘कोइ न रहा जग रही कहानी’। सिर्फ कहानियां रह गर्इं।

हिंदी सिनेमा का स्थायी भाव प्रेम है। युद्ध और हिंसा इस स्थायी भाव के आजू-बाजू हैं। संजय लीला भंसाली की पूर्ववती फिल्मों पर नजर डालें तो देवदास, रासलीला, बाजीराव मस्तानी में प्रेम की त्रासदी है। विजयदेव नारायण साही ने भी ‘पद्मावत’ को त्रासदी ही माना है। भंसाली की कल्पनाशीलता बाजार, बजट, मनोरंजन, मुनाफा से तय होती है।
साही ने साहित्यिक पुस्तकों, इतिहासग्रंथों और तथ्यों की छानबीन के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला कि ‘पदमावत’ के कुछ पात्र ऐतिहासिक हैं, लेकिन कथा की ऐतिहासिकता संदिग्ध है। जायसी पूर्व पद्मिनी की कथा का कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं है। यह जायसी की मौलिक उद्भावना है। उनका कहना है कि ‘जायसी ने ऐसी कथा कही, जिसने लोकमानस और प्रबुद्ध जनों को इतनी जोर से पकड़ा कि पद्मावती-अलाउद्दीन की कथा काव्य-कृति के बाहर इतिहास का अंश बन गई।’ कहने का आशय यह कि पदमावत में इतिहास ढूंढ़ना गैरजरूरी है।
जसवंत झावेरी ने फिल्म ‘महारानी पद्मिनी’ में जायसी की मूल कथा से सर्वाधिक छूट ली। उन्होंने कथा को काफी हद तक तोड़-मरोड़ कर अपने समय के यथार्थ में टंकित किया। फिल्म में युद्ध-विरोधी अनुगूंजें हैं। संभवत: इस पर विश्वयुद्धों और तत्कालीन 1962 के युद्ध की छाया हो। तलवारें समस्या की तरह आती हैं। वह स्त्रियों और बच्चों के खिलाफ एक हिंसक मुहिम से ज्यादा कुछ नहीं है। बादल, अलाउद्दीन की गोद में दम तोड़ते हुए कहता है- युद्ध लड़ने वाला व्यक्ति अगर बच्चे को अपना बच्चा मान ले तो दुनिया में कोई बच्चा यतीम न रहे। पद्मिनी और अलाउद्दीन की मलिका दोनों एक-दूसरे के पति की रक्षा के लिए बगावत करती हैं और तलवारों के सामने अपने को खड़ा करती हैं। दोनों बहनापे के एक ‘नए रिश्ते’ में बंधी हैं। अलाउद्दीन पत्नी के कहने पर युद्ध रोकने निकलता है, लेकिन तब तक रत्नसेन मारा जाता है। वह अलाउद्दीन की बांहों में दम तोड़ता है। अलाउद्दीन उसे मित्र संबोधित करके कहता है- ‘हमारी यह फतह इतिहास की सबसे बड़ी शिकस्त है।’ जाहिर है यह फिल्म मध्यकालीन बर्बरताओं और अत्यचारों की नहीं, बल्कि उस कथा की खोल फाड़ कर आजाद भारत में बनते हुए नए रिश्ते और मानव मूल्यों की कथा कहती है। फिल्म में मौजूद मिथकेतिहास की व्याख्याएं धार्मिक कट्टरता और सांप्रदायिक सोच को तोड़ती नजर आती हैं। इंसाफ आवाजें उठती है। युद्ध की मर्दवादी सोच का प्रतिकार करती यह फिल्म स्त्रियों और बच्चों के हक में खड़ा रहने का संदेश देती है।

मणि कौल की ‘द क्लाउड डोर’ की चर्चा प्राय: नहीं होती। जायसी के ‘क्लासिक’ के बरक्स एक ‘आर्टिस्टिक सेलुलॉयड क्लासिक’ है। उन्हें न खलनायक अलाउद्दीन की जरूरत पड़ी, न युद्ध की, न तो किसी के सती होने की। उन्होंने काव्यभूमि से सिर्फ मानसरोदक और पद्मावती-रत्नसेन मिलन खंड चुना। पहले खंड में निर्वस्त्र सरोवर में नहाती पदमावती और उसकी सखियां हैं, जो स्त्री स्वाधीनता और आजादी की प्रतीक हैं। और दूसरे खंड में दोनों का प्रेमातुर मिलन। जायसी ने इस प्रेमातुर मिलन को राम-रावण युद्ध की संज्ञा दी है। मणि कौल ने इसे बेहद शास्त्रीय अंदाज में परदे पर उतारा। उनका उद्देश्य बाजार में बेचना और मुनाफा कमाना नहीं, बल्कि एक उत्कृष्ट कलात्मक प्रेमाख्यान के बरक्स एक दृश्यात्मक प्रेमाख्यान रचना रहा होगा। विजय भट्ट ने वाल्मीकि रामायण पर आधारित ‘रामराज्य’ (1943) बनाई, तो उसके राजनीतिक-वैचारिक मंतव्य बहुत स्पष्ट थे। गांधी स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान भारतीय जनतंत्र में रामराज्य की संकल्पना को साकार करना चाहते थे, जिसका प्रतिनिधित्व यह फिल्म करती है। यह फिल्म गहरे अर्थों में सामाजिक यथार्थ से भी जुड़ी है। पति-पत्नी के बीच झगड़े और स्त्री के परित्याग के साथ ही फिल्म शुरू होती है और यह प्रसंग मिथक से टकराती है। गांधी ने अपने जीवन में सिर्फ यही एक हिंदी फिल्म देखी थी।  मिथकेतिहास, धार्मिक ग्रंथों या मान्यताओं को फिल्माने से संबंधित विवाद तर्कशील पश्चिमी समाजों में भी होते रहे हैं। ‘द लास्ट टेंपटेशन आॅव क्राइस्ट’, ‘सबमिशन’, ‘द दा विंची कोड’, ‘द पैशन आॅव द क्राइस्ट’, ‘लॉर्ड्स आॅव रिंग्स’ आदि ऐसी ही फिल्में हैं। फिल्म ‘आॅफसाइड’ की वजह से जफर पनाही को ईरानी सरकार ने जेल में डाल दिया।  मिथकेतिहास चुनते वक्त फिल्मकार का दायित्व बनता है कि वह व्यापक सामाजिक भावनाओं को उत्तेजित करने से बचे और दर्शकों या नागरिक की जिम्मेदारी होती है कि फिल्मकार की मौलिक कल्पनाशीलता, कथा चयन, उपयोग की स्वतंत्रता का सम्मान करे।

 

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