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दलित संवादः दलित चेतना की बंगीय भूमि

बांग्ला दलित साहित्य में इतिहास मुखर नहीं है। ऐसा लग सकता है कि बांग्ला दलित रचनाकार इतिहास के प्रति बेपरवाह रह कर लिखते हैं। मगर सच है कि बोध के स्तर पर इतिहास वहां अंतर्धारा के रूप में प्रवाहित है। इतिहास कई तरह से सहायता करता प्रतीत होता है। वह सबसे ज्यादा ‘सवर्ण छल’ को समझने की जमीन मुहैया कराता है।

एक विरोध प्रदर्शन में दलित। प्रतीकात्मक तस्वीर। (Express pic)

भारतीय दलित साहित्य की अवधारणा बांग्ला दलित साहित्य को शामिल किए बगैर पूरी नहीं होती। दिक्कत यह है कि हिंदीभाषी जनता के बीच बांग्ला के दलित साहित्य की चर्चा अभी ठीक से शुरू नहीं हुई है। बंगाल में दलित आंदोलन और लेखन की एक सशक्त परंपरा लंबे समय से गतिमान है। इस परंपरा के नायकों में अविभाजित बंगाल के श्रीहरिचांद ठाकुर, श्रीगुरुचांद ठाकुर और विभाजित बंगाल के महाप्राण जोगेंद्रनाथ मंडल के नाम लिए जा सकते हैं। हरिचांद ठाकुर द्वारा प्रवर्तित और उनके पुत्र गुरुचांद द्वारा विकसित मतुआ धर्म ने बंगाल के दलितों को संगठित करने में उल्लेखनीय भूमिका निभाई।

मतुआ धर्ममत में दलितों की उन्नति के तीन साधन बताए गए हैं- शिक्षा की प्राप्ति, संपत्ति का अर्जन और राजकार्य में हिस्सेदारी। आंबेडकर के उदय से पहले बांग्ला दलित चेतना का यह स्तर गौर करने लायक है। यों तो इस प्रांत के दलित समुदाय से जुड़े लेखक बहुत पहले से लिखते रहे हैं, लेकिन जिसे आज दलित साहित्य कहा जाता है उसकी शुरुआत यहां 1964 में हुई। सन 1987 में ‘बंगीय दलित लेखक परिषद’ के गठन के बाद दलित साहित्य आंदोलन सघन रूप से आगे बढ़ता है।
वर्चस्व और दासता को वैज्ञानिक दृष्टि से समझे बगैर वर्ण-जाति की कार्य-पद्धति का ठीक-ठीक विश्लेषण करना मुश्किल है। ऐसे विश्लेषण से जो समझ विकसित होती है वह रचनाकार को ‘याचना-भाव’ से मुक्त करती है।

पिछली शताब्दी के पांचवें दशक से पश्चिम बंगाल में कम्युनिस्ट आंदोलन का जो प्रसार हुआ उसने इस समझ के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। श्रमिकों की कक्षाएं लगनी शुरू हुर्इं। इन कक्षाओं में शोषण की प्रक्रिया और अर्थतंत्र की जानकारी दी जाती थी। श्रमिकों में दलित बहुसंख्यक थे। सवर्ण वर्चस्व का भौतिक आधार समझने के बाद मानसिक दासता के तंतुओं के टूटने-बिखरने का सिलसिला शुरू हुआ। इस बदलाव को तत्काल आंक पाना कठिन था। इसकी मुख्य वजह यह थी कि दलित अब भी आर्थिक रूप से अधीनस्थ स्थिति में ही थे।

उत्पादन के साधनों पर जब तक पारंपरिक कब्जा बना रहेगा तब तक चेतनागत परिवर्तनों की पूर्ण और अविकृत अभिव्यक्ति नहीं हो सकती। दलित समुदाय में आए इस आभ्यंतरिक बदलाव को दलित रचनाओं में जगह मिली। बांग्ला दलित साहित्य का स्वर और स्वरूप इसीलिए शेष भारत के दलित साहित्य से भिन्न और विशिष्ट है। उसके अ-शिकायती लहजे का यही आधार भी है। वह इसीलिए पौराणिक-धार्मिक आख्यानों में ज्यादा नहीं उलझा। पौराणिक संदर्भों को इतिहास की वैज्ञानिक समझ के साथ देखने के कारण बांग्ला का दलित लेखन अस्मितावाद की अतीतोन्मुखी रुझान में उलझने से बच गया है।
राष्ट्रवाद की अवधारणा के प्रति दलित साहित्य का आकर्षण कभी नहीं रहा। उग्र राष्ट्रवाद से तो उसका विकर्षण ही नजर आता है। उसके लिए जिंदगी की दुश्वारियां ही प्राथमिक रही हैं। इन दुश्वारियों से निपटने में इतनी मुश्किलें रहीं कि उन्नीसवीं शताब्दी के राष्ट्रवाद से लेकर इक्कीसवीं शताब्दी के वैश्वीकरण तक उसकी उदासीनता बनी हुई है।

इधर के कुछ वर्षों में जिस दलित मध्यवर्ग का उभार हुआ है उसकी दिलचस्पी बेशक राष्ट्रवाद में है और उनमें से कुछ का झुकाव तो हिंदू राष्ट्रवाद में भी है, मगर दलित साहित्य ने अब तक इनके प्रति आलोचनात्मक रवैया बनाए रखा है। इस आलोचनात्मक रवैए की देन है पारंपरिक भारतीयता के बरक्स नई भारतीयता का निर्माण। नई भारतीयता के निर्माण की प्रक्रिया आंबेडकर के चिंतन और कार्यों से आरंभ हुई थी, जो बाद के दलित आंदोलन और लेखन से आकार पाती गई। यह भारतीयता बुद्ध की करुणा से संबद्ध, सिद्धों के सहजयान से प्रेरित, संतों की समाज-चिंता से जुड़ी और आंबेडकर की विश्वदृष्टि से निर्मित है। बांग्ला दलित साहित्य ने इस भारतीयता की रचना में उल्लेखनीय योगदान किया है। बौद्ध धम्म से उसका प्रगट और सघन जुड़ाव है। सिद्धों की बानी की अनुगूंजें उसकी शब्द रचना में साफ सुनी जा सकती हैं। संतों की फटकार भरी भाषा का उसने सार्थक उपयोग किया है। मार्क्सवाद में परिव्याप्त मानव मुक्ति की सार्वभौमिक चिंता से उसका नाता है। आंबेडकर की आंदोलनधर्मिता और चिंतनशीलता उसका आदर्श है।

‘आक्रोश’ दलित साहित्य के स्थायी लक्षणों में गिना जाता है। बांग्ला दलित साहित्य भी आक्रोशपूरित है। लेकिन, यह आक्रोश शेष दलित साहित्य में प्राप्त आक्रोश से उल्लेखनीय भिन्नता लिए हुए है। जबकि अन्यत्र आक्रोश अपनी अभिव्यक्ति में सपाट हो जाता है, बांग्ला दलित साहित्य में वह व्यंजक ही बना रहता है। लक्ष्य पर सीधे प्रहार के बजाय वह व्यंग्य में घुल कर अपना काम करता है। जबकि प्राय: आक्रोश की प्रकृति एकमुखी होती है, बांग्ला दलित साहित्य में उसका अनेकमुखी विनियोजन दिखाई देता है। ऐसा आक्रोश चीख से नहीं, चिंतन से उद्भूत होता है। उसका टिकाऊपन भी इसीलिए अधिक रहता है। आक्रोश के शब्दांकन में नवाचारी प्रयोग भी रेखांकित किए जाने लायक है। बांग्ला दलित साहित्यकार दो (या दो से अधिक) स्थितियों को इस तरह आमने-सामने रखते हैं कि उनका अभीष्ट स्वयमेव व्यंजित हो जाता है। इस अभिव्यंजना में तल्ख व्यंग्य, अनदेखी विद्रूपताएं और संचित तथा सुचिंतित आक्रोश मौजूद होते हैं।

बांग्ला दलित साहित्य मुख्यत: कविता केंद्रित है। इन कविताओं में वेदना-व्यथा का चित्रण कम और नकार-आक्रोश की मात्रा ज्यादा है। यह आक्रोश और नकार भाव दार्शनिकता का स्पर्श लिए हुए है। इस दार्शनिकता का स्वभाव आमतौर पर समझे जाने वाले दार्शनिक वृत्ति से अलग है। यह दलित दार्शनिकता है, जो ठसपन और अमूर्तन से मुक्त रह कर विकसित हुई है। यह क्रियाशील और सर्जनात्मक है। लक्ष्योन्मुखी और भविष्योन्मुखी है। बांग्ला दलित गद्य में वस्तुवर्णन खूब है। दलित जीवन की अभिव्यक्ति वस्तुनिरूपण के विस्तार में जाकर ही हो सकती है। कहानी और उपन्यास वर्तमान और इतिहास के ब्योरों से समृद्ध हैं। आत्मकथाओं में बांग्ला दलित जीवन के भरपूर ब्योरे हैं।

इन सबके बावजूद स्थूल चित्रण बहुत कम मिलेंगे। कथातत्त्व की प्रबलता ब्योरों को अपने रंग में ढाल कर पेश करती है। यह प्रवृत्ति आत्मकथा में भी दिखाई देती है। उत्पीड़न के स्थूल चित्र शायद ही कहीं मिलें। आत्मकथाएं इतिवृत्तात्मक होने से अधिक दलित जीवन का संश्लिष्ट यथार्थ प्रस्तुत करती हैं। मनोहर मौलि विश्वास और मनोरंजन व्यापारी की आत्मकथाओं से इस कथन की पुष्टि की जा सकती है। इन आत्मकथाओं में कथातत्त्व प्रबल है और यथातथ्य प्रस्तुति का आग्रह न्यूनतम है। परिवेश को समग्रता में देखने और उसे जीवंत बनाने में आत्मकथाकार का मन अधिक रमता है। वैयक्तिक कार्यों का लेखा-जोखा देने में बांग्ला का दलित लेखक संकोच करता प्रतीत होता है।

बांग्ला दलित साहित्य में इतिहास मुखर नहीं है। ऐसा लग सकता है कि बांग्ला दलित रचनाकार इतिहास के प्रति बेपरवाह रह कर लिखते हैं। मगर सच है कि बोध के स्तर पर इतिहास वहां अंतर्धारा के रूप में प्रवाहित है। इतिहास कई तरह से सहायता करता प्रतीत होता है। वह सबसे ज्यादा ‘सवर्ण छल’ को समझने की जमीन मुहैया कराता है। नागवंश से लेकर पाल वंश तक इतिहास के कई पड़ाव दलित समुदाय में आत्मविश्वास भरने का काम करते हैं। सुदूर अतीत जहां संबल प्रदान करता है वहीं निकट अतीत तनाव, बेचैनी और आक्रोश का सबब बनता है।

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