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तीरंदाज- आशा नहीं रही

आशा खत्म हो गई है। कुछ अरसे से बीमार चल रही थी। बीच-बीच में ऐसा लगता था कि शायद उसकी तबीयत सुधर जाएगी, पर साल खत्म होने से पहले ही उसने हाथ-पैर डाल दिए।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की फाइल फोटो।

आशा खत्म हो गई है। कुछ अरसे से बीमार चल रही थी। बीच-बीच में ऐसा लगता था कि शायद उसकी तबीयत सुधर जाएगी, पर साल खत्म होने से पहले ही उसने हाथ-पैर डाल दिए। शायद 2018 का मुंह नहीं देखना चाहती थी, लंबा घिसटना नहीं चाहती थी।… चल बसी। 2013 में उम्मीद से हुए थे हम लोग और उस समय से लेकर मई, 2014 की पैदाश तक उसके आने की आहट को हमने खूब धूमधाम से दर्ज किया था। बड़ा भाई विकास ताऊजी के लालन-पालन से पहले ही हट्टाकट्टा हो गया था। हमने उसे कभी देखा तो नहीं था, पर ताऊजी संदेशों में अक्सर उसकी सेहत और फितरत के बारे में तफ्सील से बताते थे। अपना मोर जंगल में नाच रहा था, सुन कर तसल्ली होती थी। यही काफी था हमारे लिए- औरों की ‘किसने देखा’ वाली बात फिजूल थी। ताऊजी पर हम कैसे शुबह कर सकते थे? क्या धृतराष्ट्र ने महाभारत सुनते समय संजय पर संदेह किया था? वैसे भी अंधों के पास आखों देखा हाल की जांच करने की गुंजाइश कहां है?  हमको विकास पर भरोसा था। सुना था उसके आने का वक्त हो गया था। ताऊजी की जमींदारी से निकल कर रिश्तेदारों के घर-देहात जाने की तैयारी कर रहा था। उसको मालूम करा दिया गया था कि चूंकि फसलों को कच्चे किसानों ने बेतरतीब ढंग से बोया था, इसलिए घर-पतवार खेतों में पसर गए थे। ताऊ ने भरोसा दिलाया था कि विकास के पास मेढ़ें बनाने का पूरा अनुभव था, खेत में नाली काटने का कौशल था और घर-पतवार तो उसके लिए घास-फूस माफिक थी।

विकास नए बीज भी ला रहा था और उनको बोने के लिए फावड़ा, कुदाल, टोकरी और हल भी। हल का जिक्र आते ही हम लोग उत्साहित हो गए थे। सालों-साल बीत गए थे फावड़ा चलाते हुए, पर अब तक हल नहीं देखा था। विकास अब हल लेकर आ रहा था, ठीक वैसे ही जैसे त्रेता में बलराम लेकर आए थे- शेषनाग अवतार बलराम, भगवान कृष्ण के बड़े भाई। वैसे राम हों या बलराम, हमको तो हल से मतलब था। लगता था कि उसको खोंसने से खेत की गहरी निराई हो जाएगी और विकास के बीज जम जाएंगे। साथ ही खर-पतवार से भी निजात मिलेगी, जिन्होंने पुश्तैनी धरोहर को जबरन ढक रखा था और हर उम्र की हर फसल का सत्यानाश कर दिया था।विकास के आने की कोलाहल से उद्वेलित होकर हम उम्मीद से हो गए थे। वह चल चुका था और अभी आ रहा था का भंगड़ा पा रहे मन में आशा अंकुरित हो रही थी। चांद की सोलह कलाओं की तरह धीरे-धीरे खुल रही थी। अमावस्या से आशा की पूर्णमासी की तरफ बढ़ रही थी।  विकास आंख ओझल था, पर आशा जनम चुकी थी। सुंदर, स्वस्थ और सुशील सरीखी दिखती थी। आशा की किलकारी दूर से सुनाई पड़ जाती थी। वह अबोध थी और उसके साथ हम भी अबोध बन गए थे। अच्छा लगता था आशा के साथ जीना, उसके साथ आंख-मिचौली खेलना या फिर आशा को गोद में उठाए घर-घर घूमना- उसकी नुमाइश करना।

आशा ने हमारी जिंदगी ही बदल दी थी। पैरों में पंख लग गए थे, दिल में नए-नए नगमे हिलोरें लेने लगे थे, चेहरे पर मुस्कराहट ऐसी तैरने लगी थी मानो दही पर रसीली जलेबी रखी हो। उधर ताऊ ने पलटी मार ली थी। विकास को भूल कर आशा से खलेने लगे थे। कहते थे आशा बनी रहनी चाहिए। हमें उसको सजों के रखना है, और जहां तक विकास की बात थी, वह कभी न कभी जरूर आएगा। जाएगा कहां? हो सकता है रास्ते में भटक गया हो, किसी ने फुसला लिया हो या फिर सालों-साल जमींदारी का बोझ उठाए रखने की थकावट को कहीं सोकर मिटा रहा हो। आशा कुछ बड़ी हुई, तो ताऊ ने उसको टीके लगवाने शुरू कर दिए थे। कहते थे टीके जरूरी हैं, क्योंकि संक्रामक रोग लंबे समय से हर तरफ फैले हुए थे और आशा को उनसे बचाना था। छोटी-सी आशा का मेदा अभी कमजोर था, उसको मजबूत करना था, क्योंकि नामाकूल दुश्मन हर तरफ घात लगाए बैठे थे। इसका यह मतलब नहीं था कि पड़ोसी पर धावा बोल दें, वह तो सिर्फ कहने की बात थी, या फिर अपने ही घर में साफ सफाई रखे। यह सब दृश्य था, इनसे हम कभी भी निपट लेंगे। पहले अदृश्य शक्तियों को हराना था, जो आशा में गांववाद को उतरने नहीं दे रही रही थी और धर्म तत्त्व को उसमे घुलने नहीं दे रही थी।

हम न-न में सर हिलाते रहे, पर ताऊ ने नजरंदाज कर दिया था। वे टीके पर टीके लगाने में लगे थे, जिससे आशा का हाजमा खराब होने लगा था। लगातार सुइयां लगने की वजह से उसके बदन पर बदनुमा दाग भी पड़ने लगे थे, पर ताऊ अपनी वैदगीरी पर अमादा थे। कहते थे तुम नोट किए जाओ, मैं बंदी कर दूंगा। स्वस्थ जीवन की लिए इतना टैक्स भी नहीं दोगे? चोरी ही करते रहोगे? विकास की उनको अब फिक्र नहीं थी, आशा ही जीवन थी। वे समझ गए थे कि विकास उनके हाथ से निकल चुका था, पर अगर आशा दिखती रहेगी तो उनका बेड़ा पर हो सकता था।पर आशा तो विकास के लिए थी। विकास का आश्वासन देकर आशा को कब तक बहलाए-जिलाए रखा जा सकता था? विकास के इंतजार में आशा पीली पड़ने लगी थी। उसका दिल बैठने लगा था। ताऊ को भी अपने नीम-हकीम इलाज पर शक होने लगा था, पर फिर भी उन्होंने किसी से सलाह नहीं ली। कहते थे हमने अपनी जमींदारी में बहुतों को ठीक किया है, चिंता मत करो, इसको भी ठीक कर देंगे। ताऊ अपनी धुन में थे और इधर आशा की सासें उल्टी चलने लगी थीं। दवा-दारू भूल कर ताऊ अब सबको कोसने में लग गए थे। कहते थे कि घर वालों ने ही जादू-टोना कर दिया था या फिर पड़ोसी ने आशा पर चुपचाप कीटाणु छोड़ दिए थे। उनका कोई दोष नहीं था। वे असली अभिभावक थे, आशा को पालना-पोसना चाहते थे, मारना नहीं। पर हमारी आशा नहीं रही। किलकारी भरने की उम्र में ही हमेशा के लिए शांत हो गई। उसकी मौत पर ताऊजी अपनी बिरादरी के सामने कई बार रोए थे, क्योंकि आशा का सहारा भी नहीं रहा था। पर हकीमगीरी से अब भी बाज नहीं आ रहे थे। शायद खुद बेईलाज हो गए थे। उधर आशा खत्म हो गई है, सुन कर विकास पागल हो गया था।

 

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