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ललित प्रसंग: अनर्थकारी विद्या का व्यवसाय

परिवार, समाज और राष्ट्र के साथ व्यक्ति के जो पारस्परिकता के संबंध सूत्र हैं, हमारी शिक्षा उसे विच्छिन्न करने वाली है

प्रतीकात्मक तस्वीर

अर्थकारी विद्या ही सुख और समुन्नति का साधन होती है, ऐसा हमारे शास्त्रों में बार-बार कहा गया है। हमारा दुर्भाग्य यह है कि हम बिल्कुल भूल चुके हैं कि अर्थ के मायने धन के अलावा कुछ और भी होता है। अर्थ के और भी अर्थ होते हैं, यह हमारी स्मृति में है ही नहीं। जीवन व्यवहार के लिए अविष्कृत भाषा का रूढ़ हो जाना, मनुष्य जाति के लिए जितना पीड़ादायक है उतना और कुछ भी नहीं। भाषा के व्यापक विस्तार का संकुचित हो जाना, हमारे जीवन विस्तार के संकुचन को ही प्रमाणित करता है। बहुस्तरीय अर्थव्यंजना के शब्दों का इकहरे अर्थ में सीमित होता जाना हमारे जीवन-बोध के निरंतर उथले होते जाने की करुण नियति का साक्ष्य है। हमारे पारंपरिक चिंतन में व्यक्ति अपनी संपूर्ण स्वतंत्रता की गरिमा के साथ समाज की इकाई है। राष्ट्र का तत्त्व है। शिक्षा, व्यक्ति को समाज और राष्ट्र द्वारा सुलभ कराई जाती है। वह समाज और राष्ट्र का अवदान है, व्यक्ति के लिए। एक शिक्षित व्यक्ति दूसरों की तुलना में अधिक ऋणी है, समाज का और राष्ट्र का। मगर हमारे समय में ऐसा नहीं है।

ऐसा क्यों नहीं है? यह बड़ा पीड़ादायक प्रश्न है। स्वतंत्रता के बाद हमने जिस शिक्षा-व्यवस्था का विकास किया है, उसके बड़े ही विस्मयजनक परिणाम हमारे सामने हैं। हमारे समय का हर शिक्षित आदमी सोचता है कि समाज और राष्ट्र उसका ऋणी है। किसी भी हालत में समाज और राष्ट्र से उसे अपना ऋण ब्याज सहित वसूलना है। इसका उसे जन्मजात हक है। हमारी शिक्षा का पहला काम आदमी को उसकी जड़ से काटना है। जहां आदमी जनमा है, जीवनरस पीकर बड़ा हुआ है, उस परिवार से, उस समाज से उसे उखाड़ कर आत्मकेंद्रित बनाने का काम शिक्षा का प्राथमिक काम है। कितना विस्मयजनक है- एक लोकतांत्रिक व्यवस्था के भीतर आत्मकेंद्रित मनुष्यों की बेशुमार आबादी का बढ़ते जाना। कैसा विपर्यय है व्यवस्था के आदर्शों के विपरीत व्यवस्था का परिणाम। हमारी समूची सामाजिक व्यवस्था अगर अपने आदर्शों के विपरीत परिणाम प्रगट कर रही है, तो क्या यह इस बात का स्वयं प्रमाण नहीं है कि हमारी पूरी व्यवस्था ही छद्म है। हम व्यवस्था में नहीं, व्यवस्था के छद्म में जी रहे हैं। आकाश पर्यंत फैले छद्म के वितान के नीचे जिंदगी कैसी दारुण यातना है, उसे हमारा समय सबसे अधिक जानता है।

परिवार, समाज और राष्ट्र के साथ व्यक्ति के जो पारस्परिकता के संबंध सूत्र हैं, हमारी शिक्षा उसे विच्छिन्न करने वाली है। इन्हीं आपसी संबंधों को अर्थ प्रदान करने वाली विद्या को हमारी परंपरा में अर्थकारी विद्या कहा जाता रहा है, धन हड़पने के हथकंडों को नहीं। विद्या केवल पेट पालने के कौशल और वैयक्तिक सुख-सुविधाओं के विस्तार का साधन नहीं है। शिक्षा व्यक्ति के साथ समाज और राष्ट्र की अभ्युन्नति का विवेक और शक्ति प्रदान करने वाला अपूर्व रसायन है। मगर यह बड़ा अजीब सच है कि हमारी स्वतंत्रता के बाद की समूची शिक्षा व्यवस्था हमारी पारस्परिकता को खंडित और विच्छिन्न करने वाली साबित हो रही है। ऐसा क्यों है? यह सबसे विचारणीय प्रश्न है, जिस पर विचार करने पर हमारा ध्यान ही नहीं जाता।
स्वतंत्रता के बाद जिस तरह के शिक्षित हमारे देश में तैयार हुए हैं, उनके विचार और व्यवहार में पारस्परिकता, सामाजिकता और राष्ट्रीयता का कोई मूल्यबोध ही नहीं है। हम आज भी यह मानते हैं कि हमारे विकास में अशिक्षा सबसे बड़ी बाधा है। मगर सच यह है कि हमारे विकास में हमारी शिक्षा सबसे बड़ी बाधा है। राष्ट्रीय विकास के संसाधनों को अपने निजी विकास का जरिया बनाने वाली जमात अशिक्षितों की नहीं, शिक्षितों की है। पता नहीं हमारी शिक्षा की कैसी विडंबना है कि हमें जो पढ़ाया, सिखाया जा रहा है, उसमें हमारी कोई रुचि नहीं है। जो नहीं पढ़ाया जा रहा, जो हमारे पाठ्यक्रमों के बाहर है, उसकी दक्षता में हम पूरे निपुण हैं। मसलन, हमें पढ़ाया जाता है, पुल बनाना, सड़क बनाना, भवन बनाना और हम सीख लेते हैं कमीशन बनाना। हमें पढ़ाई जाती है करुणा, हम सीख लेते हैं क्रूरता। हमें सिखाई जाती है, मानव शरीर की सर्जरी, हम सीख लेते हैं, जेब काटने की कला। हमारी शिक्षा बेहद स्वार्थी क्रूर, हिंसक और लोलुप नागरिक तैयार कर रही है। हमारी शिक्षा, समाज और राष्ट्र को कमजोर करके अपने को मजबूत बनाने का सपना देखने वाले मनुष्यों का उत्पाद बाजार में उतार रही है। सचमुच, यह कितना भयानक है। हमारे समय में देश सबका है, मगर देश का कोई नहीं है।

हमारे लोकतंत्र का मूल आधार बंधुत्व है। बंधुत्व के साथ संयुक्त होकर ही स्वतंत्रता अर्थवान होती है। बंधुत्व के साथ ही समता का कोई अर्थ होता है। पारस्परिकता का विकास ही लोकतंत्र का अर्थ विस्तार है। कितना विस्मयजनक है लोकतंत्र के भीतर पारस्परिकता का क्षरण। क्षरण ही नहीं ध्वंस! हम अपने आदर्शों में लोकतंत्र का ढोल पीट रहे हैं और व्यवहार में पारस्परिकता का भयानक विध्वंस देख रहे हैं। परिवार से होकर राष्ट्र तक भयानक विघटन का विस्तार बराबर बढ़ता जा रहा है। बड़ा अद्भुत विपर्यय है कि जबसे हमने लोकतांत्रिक व्यवस्था लागू की है अपने देश में, परिवार में विघटन की बाढ़ आ गई है। अब तो संयुक्त परिवार नाम की चीज पुरातात्त्विक धरोहर जैसी रह गई है। यह क्या है? कुछ समझ में नहीं आता, ऐसा क्यों है? पारिवारिकता, पारस्परिकता, बंधुत्व का विकास तो दूर, उल्टे इनका समूल नाश ही हो गया। अब परिवार, परिवार नहीं है। पड़ोस, पड़ोस नहीं है। गांव, गांव नहीं है। देश, देश नहीं है। दुनिया, दुनिया नहीं है। अब बस केवल स्वार्थ है। अपने स्वार्थ के साथ आदमी अकेला खड़ा है। बिल्कुल अकेला। सबसे अलग। उद्भ्रांत-सा। बंधुत्व को तो गोली मारो, हम किसी भी तरह के संबंध से हीन होकर रह गए हैं। हमारी समूची शिक्षा सिर्फ स्वार्थ को उत्प्रेरित और पोषित करने वाली शिक्षा होकर रह गई है। स्वतंत्र भारत के विकास में शर्मिंदगी के जितने भी नायक मंच पर अभिनय कर रहे हैं, सभी शिक्षित हैं। शिक्षित ही नहीं, उच्च शिक्षित हैं। हमारी शिक्षा ने जिस नस्ल के आदमियों को निर्मित किया है, उनकी प्राथमिकता में समाज नहीं है, देश नहीं है, परिवार नहीं है। उनकी प्रतिबद्धता पारस्परिक उत्कर्ष के प्रति नहीं, आत्मिक उत्कर्ष के प्रति है।

हमारे मनीषियों ने कभी कहा था- परिवार के हित के लिए एक व्यक्ति को, गांव के लिए एक परिवार को, देश के लिए एक गांव को और विश्व समुदाय के कल्याण के लिए एक देश को त्याग देना धर्म है। आज हम अपने हित के लिए, व्यक्तिहित के लिए-गांव, समाज, देश और विश्व मानव के हित को नहीं देख पा रहे हैं। हम अपने सिवाय किसी को नहीं, कुछ को नहीं देख रहे हैं। हम अंधे हैं। हम अंधे हो गए हैं। हम पढ़े-लिखे हैं मगर अंधे हैं। हम अंधे हैं, मगर हमें पता नहीं है कि हम अंधे हैं। फिर क्या उपाय है? क्या उम्मीद है? हमारी शिक्षा हमें हमारे अंधेपन की खबर नहीं दे रही है। हमारी अर्थकारी विद्या की विरासत अनर्थकरी विद्या के व्यवसाय में डूब रही है। शायद हमें, पता नहीं है। शायद हमें, पता है।

 

 

 

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