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यमुना की गति-दुर्गति

तीन दशक से भी ज्यादा वक्त हो चुका है इसकी सफाई के बारे में सोचते-विचारते, फिर भी कोई पुख्ता इंतजाम नहीं हो पाया है। अरबों रुपए स्वाहा हो चुके हैं और यमुना की गंदगी खत्म होने का नाम नहीं ले रही है। इसका जायजा ले रही हैं पूजा मेहरोत्रा।

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गंगा की साफ-सफाई को लेकर पूरे देश में बहुत चर्चा है बल्कि कहना चाहिए कि चर्चा ही ज्यादा है, काम बहुत कम है। मगर, देश की राजधानी से गुजरनेवाली यमुना की तो कहीं चर्चा भी नहीं होती। जबकि यमुना देश की सबसे प्रदूषित नदियों में शामिल है। लगता है कि जैसे यमुना आखिरी सांस ले रही हो। बरसात के कुछ दिनों को छोड़ दें तो दिल्ली में यह घट कर किसी गंदे नाले या कहीं-कहीं गंदले तालाब जैसी हो जाती है। इस गंदगी का नतीजा यह है कि यमुना में आॅक्सीजन नाम मात्र को भी नहीं बचा है। इसके कारण इस पावन नदी में जलीय जीव-जंतु समाप्त हो चुके हैं। इसकी सड़ांध ने इसके तट पर बसी बस्तियों के लोगों का जीना दुश्वार कर रखा है। कई शोधों में यह बताया गया है कि यमुना के कछार में उगाई जा रही सब्जियां और दूसरी फसलें जहरीली हो चुकी हैं। इसके किनारे पर रहने वालों में भी विभिन्न प्रकार की गंभीर बीमारियां हो रही हैं। यमुना की बदहाली को लेकर किसी के मन में कोई संदेह नहीं है। तीस साल से भी ज्यादा समय से सभी सरकारें इसकी सफाई का राग अलापती रही हैं। इस मुद्दे पर अपनी-अपनी राजनीति चमकाती रही हैं। सफाई के नाम पर हजारों करोड़ रुपए बहा दिए गए हैं। इसके बावजूद इस नदी में पानी की स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ है बल्कि साल दर साल पानी और जहरीला होता गया है। बेहतरी तो दूर की बात है, कोई मामूली बदलाव भी दिखाई नहीं देता।

यमुना के उद्धार के लिए दिल्ली सरकार ने यमुना एक्शन प्लान वन, टू और थ्री जैसी कई योजनाएं लागू कीं, लेकिन इसके पानी की किस्म में कोई सुधार नहीं हुआ। स्थिति जस की तस बनी हुई है। यह स्थिति तब है जब यह यह मामला देश की राजधानी का है । यहां केंद्र सरकार, संसद, राज्य सरकार, सुप्रीम कोर्ट यानी बड़े-बड़े शक्तिकेंद्र हैं। राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण (एनजीटी) ने यमुना में गंदगी फेंकनेवालों पर पांच हजार रुपए तक जुर्माना लगाने का आदेश दिया है, लेकिन इस आदेश की जरा भी परवाह किसी को नहीं है। एनजीटी का आदेश लागू करनेवाली एजेंसियों का कहीं अता-पता तक नहीं रहता। एनजीटी का यह फैसला भी कई अन्य फैसलों की तरह बस अखबारों और खबरिया चैनलों की सुर्खियां बटोरने तक सीमित हो कर रह गया। आज कभी भी यमुना के घाटों पर जाकर देख सकते हैं कि कोई फूल डाल रहा है तो कोई मीठा चढ़ा रहा है। कोई अपने घर की पूजन सामग्री लाकर यमुना में विसर्जित कर रहा है। मूर्तियों का विसर्जन तो मानो हर किसी का जन्मसिद्ध अधिकार है। वजीराबाद बैराज से महज सौ मीटर की दूरी पर नजफगढ़ नाला यमुना में गिरता है। लगभग आधी दिल्ली की गंदगी लिए यह नाला साफ-सुथरी यमुना के पानी को विषैला और गंदला करता रहता है। एनजीटी के आदेश का पालन होता कहीं नहीं दिखाई देता है। यमुना की सफाई की जिम्मेदारी केंद्र और राज्य सरकार, दोनों पर है।

वजीराबाद बैराज से ओखला बैराज तक यमुना करीब बाईस किलोमीटर की दूरी तय करती है और शहर के बीच से बहती है। यह दूरी यमुना की कुल लंबाई यानी 1376 किलोमीटर का महज दो फीसद है। वैज्ञानिकों और जानकारों का कहना है कि यमुना जितनी बदहाल दिल्ली में होती है, उतनी अपने चौदह सौ किलोमीटर सफर में कहीं नहीं होती है। यहां प्रतिदिन औसतन 3800 मिलियन लीटर सीवेज निकलता है। दिल्ली में सीवेज ट्रीटमेंट करने वाले संयत्रों की क्षमता 2460 मिलियन लीटर प्रतिदिन है। इसमें से महज 1558 एमएलडी ही साफ हो पाता है। इस प्रकार औसतन करीब 2242 मिलियन लीटर सीवेज की गंदगी को बिना साफ किए हुए यमुना में प्रतिदिन बहा दिया जाता है। बारिश के मौसम को छोड़ कर वजीराबाद बैराज से पानी कभी भी यमुना में नहीं डाला जाता है। ऐसा इसलिए किया जाता है क्योंकि दिल्ली में पहले ही पानी की बहुत कमी है और यमुना ही पीने के पानी का सहारा है। इसका परिणाम यह होता है कि वजीराबाद के बाद यमुना में जो भी नाले गिर रहे हैं, वे केवल शहर की गंदगी ढोते हैं। अगर यमुना में नियमित साफ पानी छोड़ा जाए तो शायद वह गंदे नाले के पानी को बहा ले जाए। लेकिन, पानी वहां रोक कर पीने योग्य बनाया जाता है इसलिए यमुना वहीं शांत हो जाती है। पिछले तीस सालों में यमुना की सफाई के लिए कई योजनाएं बनाई गर्इं। दिल्ली जल बोर्ड ने 1998-99 में 285 करोड़ रुपए खर्च किए, जबकि 1999 से 2004 के बीच जल बोर्ड ने 439 करोड़ रुपए खर्च किए।

यमुना की सफाई के नाम पर डीएसआईडीसी ने लगभग 147 करोड़ रुपए खर्च किए है। यमुना सफाई अभियान के नाम पर दिल्ली में सार्वजनिक शौचालय और दूसरे मदों में 171 करोड़ रुपए खर्च किए गए। इस लागत में पूरी दिल्ली में कम कीमत के 558 सार्वजनिक शौचालय बनाए गए। आज इनमें से कई शौचालय प्रयोग में नहीं हैं, कई का कहीं अस्तित्व ही नहीं है। कुछ ऐसी जगहों पर बनाए गए हैं जहां कोई उसका कोई उपयोग नहीं है। बस्तियों को ध्यान में रखकर बनाए गए होते तो महिलाओं को खुले में शौच जाने की जरूरत नहीं होती। दिल्ली की सरकारी कॉलोनियों के इर्द-गिर्द बसी बस्तियों के आस-पास आज भी बच्चे हों या बड़े, शौच करते दिख जाएंगे। मलिन बस्तियों और झुग्गी-झोपड़ी वालों को शौचालयों केप्रति सरकार और एजेंसियों ने सजग नहीं किया। स्वास्थ्य की जानकारी भी नहीं दी। कहीं पानी की व्यवस्था नहीं है तो कहीं सफाई की। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने 1,376 किलोमीटर लंबे यमुना के फैलाव को भौगोलिक और पारिस्थितिक क्षेत्र के हिसाब से पांच भागों में बांटा है। हिमालयन सेगमेंट यानी यमुनोत्री से ताजेवाला तक 172 किलोमीटर फैलाव को स्वच्छ श्रेणी रखा गया है। जबकि अपर स्ट्रैच यानी ताजेवाला से वजीराबाद तक फैले 224 किलोमीटर को थोड़ा स्वच्छ और दिल्ली के बाईस किलोमीटर के फैलाव को यानी वजीराबाद से ओखला बैराज तक तक के क्षेत्र को ज्यादा प्रदूषित श्रेणी में रखा है।

इसके आगे 490 किलोमीटर यानी ओखला से चंबल तक की दूरी को प्रदूषित की श्रेणी में रखा है। इस फैलाव में यमुना दिल्ली, मथुरा और आगरा से होकर गुजरती है। दिल्ली यमुना के किनारे बसे सभी शहरों में सबसे ज्यादा जनसंख्या वाला शहर है। दिल्ली में यमुना के दोनों किनारों पर क्षमता से अधिक आबादी बस चुकी है। यमुनोत्री से 425 किलोमीटर की दूरी तय करके दिल्ली के उत्तर में गांव पल्ला से यमुना प्रवेश करती है। ओखला के निकट जैतपुर में उत्तर प्रदेश की सीमा में से गुजरती है। दिल्ली में इसकी चौड़ाई एक किलोमीटर से लेकर 4.5 किलोमीटर तक फैली है। यमुना जैसे-जैसे आगे बढ़ती है, गंदगी से पटती जाती है। वह सात राज्यों से होकर गुजरती है। इसका सबसे लंबा सफर मध्य प्रदेश में तय होता है। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली, उत्तर प्रदेश, सोनीपत, रोहतक और गुड़गांव से घिरा है। यमुना दिल्ली की पूर्वी सीमा से होती हुई उत्तर दक्षिण की दिशा में बहती है। दिल्ली में यमुना की लंबाई लगभग 50 किलोमीटर है। नदी की चौड़ाई जगह के हिसाब से घटती-बढ़ती रहती है। यमुनोत्री से इलाहाबाद तक अगर इसकी लंबाई पर नजर डालें तो यह लगभग 1400 किलोमीटर है। यमुना में चंबल, हिंडन, केन और साहिबी नदी मिलती है। कहने को तो यमुना देश की सबसे पवित्र माने जाने वाली नदियों में से एक है। यमुना, गंगा की सबसे बड़ी सहायक नदी है। यमुना किनारे आने वाले दिल्ली के अलावा प्रमुख राज्य हैं उत्तरांचल, हिमाचल, उत्तर प्रदेश और हरियाणा।

यमुना में प्रदूषण हरियाणा के ताजेवाला से शुरू होता है। ताजेवाला से ही यमुना नदी से दो नहरें निकाली जाती है। एक नहर पश्चिमी यमुना कैनाल और दूसरी पूर्वी यमुना कैनाल कही जाती है। ताजेवाला के पास ही अब यमुना पर एक नया अधिक क्षमता का बांध बना कर बचे खुचे पानी को और भी अधिक व्यवस्थित तरीके से रोकने की व्यवस्था की गई है। इसका परिणाम यह हुआ है कि मानसून के तीन महीनों को छोड़ कर यमुना नदी का अधिकतर पानी इन्हीं दोनों नहरों के मार्फत हरियाणा और उत्तर प्रदेश में सिचाई और पीने के पानी के लिए उपयोग किया जाता है। पूर्वी यमुना कैनाल का पानी उत्तर प्रदेश के काम आता है जबकि पश्चिमी कैनाल का पानी हरियाणा होते हुए दिल्ली आता है। दिल्ली के हैदरपुर जल संयत्र तक पहुंचने के पहले पश्चिमी यमुना कैनाल यमुना नगर, करनाल से गुजरता हुआ आता है। पश्चिमी यमुना कैनाल से निकलने वाला नाला नंबर 2 और 8 से मिलने वाला पानी यमुना में जाकर मिलता है। इससे यमुना नदी में पानी की बढ़ोतरी होती है। पश्चिमी यमुना कैनाल से एक छोटी नहर निकलती है जो करनाल से करीब 80 किलोमीटर दूर वापस आकर इसीमें मिल जाती है। इस कैनाल से मिलने वाले पानी का इस्तेमाल हरियाणा में खेती-किसानी के लिए किया जाता है। यमुना नगर से निकलने वाली सारी गंदगी बिना किसी तरह से साफ किए इसी कैनाल में बहा दी जाती है।

यह सारी गंदगी पश्चिमी यमुना कैनाल में मिल जाती है। इसी कारण कई बार हैदरपुल जल संयत्र उत्तरी और पश्चिमी दिल्ली के बहुत बड़े भाग को पीने का पानी सप्लाई करता है। इस नहर में पानी का स्तर गिरने या उसमें अधिक प्रदूषण होने के कारण कई बार पानी को साफ करना संभव नहीं हो पाता। उससे दिल्ली को पानी की आपूर्ति में भी बाधा पहुंचती है।
इसके अलावा पानीपत शुगर मिल और डिस्टिलरी से निकलने वाली गंदगी पुरानी कच्ची नहर में बहा दी जाती है। इस नहर के किनारे कच्चे हैं, इसलिए यही गंदगी बहकर पश्चिमी यमुना कैनाल में मिल जाती है। फिर यह पानी हैदरपुर जल संयत्र में पहुंचता है तो कई बार इस पानी को पूरी तरह साफ कर पाना असंभव हो जाता है। हरियाणा में खेती में बड़े पैमाने पर रासायनिक खादों और दवाओं का इस्तेमाल किया जाता है। इसके प्रभाव से भी यमुना में प्रदूषण बढ़ रहा है। हरियाणा में खेती किसानी की प्रगति के साथ-साथ इन रासायनिक खादों और दवाओं में भी साल दर साल बढ़ोतरी हो रही है और इसका प्रभाव भी यमुना में बढ़ते प्रदूषण में देखा जा सकता है।

यमुना के पानी पर देश के लगभग छह करोड़ लोग निर्भर करते हैं। यमुना में हर साल औसतन 10,000 घनमीटर पानी बहता है, जिसमें से 4400 घनमीटर पानी का इस्तेमाल हो पाता है बाकी बर्बाद हो जाता है। इस 4400 घनमीटर पानी का लगभग 96 फीसद पानी खेती के काम आता है। दिल्ली की 70 फीसद आबादी को पानी यमुना से मिलता है।
दिल्ली में पीने के पानी समेत आम जीवन के उपयोग के लिए लगभग 70 फीसद लोग यमुना के पानी पर निर्भर करते हैं। पानी की सफाई के लिए लगे वाटर ट्रीटमेंट प्लांट पानी में से पेस्टीसाइट नहीं निकाल पाते हैं। दिल्ली के बनाए गए जल संयत्रों में इस तरह की तकनीक का इस्तेमाल नहीं किया जा रहा है कि वह पानी में मिले हुए रासायनिक दवाओं के प्रभाव को हटा सकें। वाटरवर्क्स पानी में मिले पेस्टीसाइट को पहचान भी नहीं पाता है। हर साल इन शहरों में लाखों की संख्या में लोग हैजा, पीलिया जैसी बीमारियों से पीड़ित होते हैं। यह ऐसी बीमारियां है जो साफ पानी की आपूर्ति कर आसानी से रोकी जा सकती हैं। इस खराब पानी के इस्तेमाल करने का असर कमजोर और गरीब वर्ग के लोगों पर पडता है क्योंकि वही हैं जो इस नदी की तलहटियों में डेरा डाले हुए हैं। केंद्रीय प्रदूषण जांच बोर्ड ने यमुना के पानी की जांच के दौरान इसमें इंडोसल्फेन नामक जहरीले तत्त्व के प्रमाण पाए थे। इसके पहले दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर एचसी अग्रवाल द्वारा किए गए एक अध्ययन के दौरान यमुना के पानी में डीडीटी पाए जाने के भी प्रमाण मिले थे। यमुना नदी के पानी में पाए गए रासायनिक तत्त्वों के बाद इस बात की आवश्यकता है कि ताजेवाला से इलाहाबाद तक के पूरे रास्ते में इन रासायनिक तत्त्वों के बारे में जांच की जाए। यमुना की दुर्दशा देख कर यही प्रश्न पूछना बाकी बचता है कि आखिर कहां हैं यमुना के उद्धारक। ०

 

 

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