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पश्चिम की तरफ देखने की प्रवृत्ति

राजनीतिक गुलामी से तो हम सत्तर साल पहले मुक्त हो गए, पर सांस्कृतिक गुलामी की निरंतरता बनी हुई है।

Author November 26, 2017 05:05 am
चित्र का इस्तेमाल प्रतीक के तौर पर किया गया है।

सौ वर्षों की औपनिवेशिक गुलामी का सांस्कृतिक असर सर्वाधिक गहरा पड़ा है। राजनीतिक गुलामी से तो हम सत्तर साल पहले मुक्त हो गए, पर सांस्कृतिक गुलामी की निरंतरता बनी हुई है। आज भी भारतीय बुद्धिजीवियों और साहित्यकारों में अपने देश के साहित्य, संस्कृति और इतिहास को पश्चिमी नजरिए से देखने की प्रवृत्ति हावी है। हद तो तब हो जाती है जब पश्चिम में लिखे गए साहित्य और उस साहित्य के आधार पर विकसित साहित्य-सिद्धांतों के निकष पर भारतीय साहित्य को कसा जाता है। यह प्रवृत्ति अन्य भारतीय भाषाओं में कम और हिंदी में अधिक है। हिंदी में लिखे जा रहे अधिकतर आलोचनात्मक लेखों में विदेशी साहित्य और विद्वानों के उद्धरणों की भरमार होती है। कई बार तो लेख की शुरुआत ही उद्धरण से होती है। ऐसे उद्धरणों वाले लेखों को हिंदी में काफी प्रतिष्ठा भी मिल जाती है। यह प्रश्न कोई नहीं पूछता कि आखिर भारतीय परिस्थितियों में रचे गए साहित्य का मूल्यांकन, गैर-भारतीय परिस्थितियों में विकसित सिद्धांतों से कैसे हो सकता है? क्या भारतीय साहित्य परंपरा में कोई विचार सिद्धांत या रचना नहीं है, जिसके आधार पर किसी कृति या प्रवृत्ति का विश्लेषण किया जा सके? ऐसा क्यों होता है कि हिंदी का आलोचक अपनी स्थापनाओं के लिए पश्चिम से वैधता हासिल करता है?

अपने हर लेख में पश्चिमी साहित्य और साहित्यकारों को उद्धृत करने वाले हिंदी में दो तरह के लोग हैं। एक तो वे हैं, जिन्हें भारतीय चिंतन परंपरा और साहित्य परंपरा का बहुत ज्ञान नहीं होता और अपनी अज्ञानता के कारण वे यह मानते हैं कि यहां न तो कुछ बेहतर चिंतन हुआ है और न ही कुछ बेहतर साहित्य सृजित हुआ है। ऐसे लोगों में जबर्दस्त हीनता ग्रंथि होती है। वे किसी पश्चिमी कृति से साम्य दिखाए बिना, किसी कृति को महत्त्वपूर्ण मान ही नहीं सकते हैं। दूसरे तरह के वे लोग हैं, जिन्हें न तो भारतीय साहित्य और न ही पश्चिमी साहित्य का कोई ज्ञान होता है। वे अपने लेखों में सिर्फ नामों का उल्लेख करते हैं। इसे अंग्रेजी में ‘नेम ड्रॉपिंग’ कहते हैं। ऐसे लोग सुनी-सुनाई बातों को या इधर-उधर से दो-चार पंक्ति पढ़ कर अपने लेखों में विदेशी विद्वानों को जरूरत-बेजरूरत का ध्यान रखे बिना उद्धृत करते रहते हैं। इन दोनों तरह के लोगों का उद्देश्य मुख्य रूप से हिंदी पाठकों को आतंकित कर उनसे अपने को महान मनवाना होता है।
यह कितनी विचित्र बात है कि हिंदी में स्त्री विमर्श से संबंधित अधिकतर लेखों की शुरुआत सिमोन द बोउआ से होती है। सिमोन की परिस्थितियों और भारतीय स्त्री की परिस्थितियों में जमीन-आसमान का अंतर है। पश्चिम का नारीवाद भारतीय स्त्री के लिए बहुत प्रासंगिक हो ही नहीं सकता। भारतीय स्त्री के लिए स्त्री चिंतन के भारतीय स्रोत अधिक विश्वसनीय है। महादेवी वर्मा की पुस्तक ‘शृंखला की कड़ियां’ पढ़ने की फुर्सत किसी स्त्री विमर्शकार के पास नहीं है। आश्चर्य तो तब होता है जब आज की स्त्रियां भी पश्चिमी नारीवादियों को उद्धृत करती हैं, जबकि आजादी के बाद से ही स्त्री रचनाकारों की एक सशक्त परंपरा हिंदी में मौजूद है, जिन्होंने अपनी रचनाओं में स्त्री मुक्ति के लगभग सभी प्रश्नों को भिन्न-भिन्न नजरिए से उठाया है। स्त्री विमर्श से संबंधित अकादमिक लेखों में इन स्त्री रचनाकारों को बहुत कम उद्धृत किया जाता है। इस मामले में दलित विमर्शकारों की जरूर सराहना की जानी चाहिए कि उन्होंने अपनी वैधता के लिए पश्चिम का मुंह नहीं देखा। उन्होंने मुख्यधारा के रूप में स्वीकृत ब्राह्मण ज्ञान परंपरा को चुनौती देने के लिए भारतीय स्रोतों की ही खोज की।

यहां एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न यह है कि आखिर हिंदी आलोचना में हिंदी साहित्य पर विचार करते हुए पश्चिमी आलोचकों और उनके सिद्धांतों को इतना उद्धृत क्यों किया जाता है? इसके कारणों पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है। राष्ट्रीय आंदोलन के चरम दौर में आचार्य शुक्ल ने हिंदी साहित्य का इतिहास लिखा। वे अपनी आलोचकीय स्थापनाओं के समर्थन के लिए पश्चिमी आलोचकों और सिद्धांतों के पास नहीं जाते। वे भारतीय काव्यशास्त्र को फिर से संदर्भवान बनाते हैं। वे रहस्यवाद को विदेशी भाव भूमि का मानते हैं और इसलिए छायावाद की आलोचना करते हैं। जयशंकर प्रसाद लंबा लेख लिख कर रहस्यवाद को भारतीय परंपरा में दिखाते हैं। यानी उस दौर में आलोचना का एक आधार देशी-विदेशी होना था। आचार्य शुक्ल इस बात के उत्तम उदाहरण हैं कि पश्चिमी सिद्धांतों से परिचित होना अलग बात है और उसके वर्चस्व को स्वीकार करना अलग। आगे आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी भी अपने आलोचकीय निष्कर्शों के लिए भारतीय स्रोतों की ही तलाश करते हैं। गड़बड़ी प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना और मार्क्सवादी सिद्धांतों से नाभि-नालबद्ध प्रगतिशील आलोचना के प्रवेश से शुरू हुई। प्रगतिशील लेखक संघ के आरंभिक घोषणा पत्रों में भारत की समूची साहित्य परंपरा को प्रतिक्रियावादी घोषित कर दिया गया। मार्क्सवादी सिद्धांतों के आधार पर हिंदी की रचनाशीलता का मूल्यांकन होने लगा और बाहरी मार्क्सवादी सिद्धांतकारों को उद्धृत किया जाने लगा। दूसरी तरफ अज्ञेय और ‘परिमल’ ने मार्क्सवादी सिद्धांतों का विरोध करने के लिए पश्चिम के ही मार्क्सवाद विरोधी रचनाकारों और साहित्य सिद्धांतों को आधार बनाया। देखते-देखते पूरी हिंदी आलोचना ही विदेशी सिद्धांतों की शरण में पहुंच गई। छठे दशक में यह पहली बार घटित हुआ कि पक्ष-विपक्ष दोनों के आलोचनात्मक मानदंड बाहरी थे। इन दोनों धाराओं को हम आज भी किसी न किसी रूप में मौजूद पाते हैं। आज भी जो मार्क्सवादी है वह बाहरी मार्क्सवादियों को उद्धृत करता है और जो मार्क्सवाद विरोधी हैं वे भी विदेशियों को उद्धृत करते हैं।

पश्चिम में साहित्य-सिद्धांत का निरंतर विकास होता गया। वहां आलोचना के ‘स्कूल’ विकसित हुए। हिंदी में सैद्धांतिक आलोचना पर कोई काम ही नहीं हुआ। सभी व्यवहारवादी होते गए। हिंदी आलोचना के लिए ‘पद’ और अवधारणाओं को विकसित करने की तरफ आलोचकों ने ध्यान ही नहीं दिया। आचार्य शुक्ल के बाद थोड़ा-बहुत प्रयास मुक्तिबोध ने सैद्धांतिक आलोचना के क्षेत्र में किया। फिर कुछ प्रयास मैनेजर पांडेय ने किया। तात्पर्य यह कि आधुनिक रचनाशीलता के मूल्यांकन के लिए कोई सिद्धांत ही विकसित नहीं किया। ऐसे में लोगों को मजूबूरी में भी साहित्य के पश्चिमी सिद्धांतों के पास जाना पड़ता है।  ‘कविता के नए प्रतिमान’ पुस्तक द्वारा जब नामवर सिंह मार्क्सवादी आलोचना के दायरे को विस्तृत कर रहे थे तब उन पर कट्टर मार्क्सवादियों द्वारा मार्क्सवाद से विचलन का आरोप लगाया जाने लगा। पुस्तक की भूमिका में इस आरोप का जवाब उन्होंने ब्रिटेन के मार्क्सवादियों के हवाले से ही दिया है। आगे आलोचना में उन्होंने मार्क्सवादी आलोचकों, साहित्य के समाजशास्त्र को आगे बढ़ाने वाले विद्वानों के लेखों का अनुवाद छाप कर हिंदी के मार्क्सवादियों को परिचित कराया कि पश्चिम में मार्क्सवाद का विकास किस तरह से हो रहा है। मार्क्सवादी आलोचना के भीतर नामवर सिंह जो लड़ाई लड़ रहे थे, उसकी वैधता भी वे बाहर से ग्रहण कर रहे थे।

हम कह सकते हैं कि हिंदी आलोचना में पक्ष और विपक्ष दोनों के वैचारिक स्रोत बाहरी हैं। शीतयुद्ध के वैचारिक वातावरण में प्रगतिशील आलोचना और गैर-प्रगतिशील आलोचना के इस समान धरातल को पहचानने ही नहीं दिया। इसका एक बड़ा नुकसान यह हुआ कि हिंदी में भारतीय चिंतन परंपरा के अनुरूप देशज भाव-बोध को वहन करने वाली आलोचना विकसित ही नहीं हो पाई। इसके कारण उन रचनाकारों का उचित मूल्यांकन नहीं हुआ, जो भारतीय यथार्थ को उसकी समग्रता में अभिव्यक्त कर रहे थे या जो इन दोनों के खांचे में फिट नहीं होते थे। यह कितना दुर्भाग्यपूर्ण है कि आज भी हिंदी आलोचना पश्चिम की आलोचना का उपनिवेश बनी हुई है। अपने यहां लिखे जा रहे साहित्य के अनुरूप मानदंड विकसित करने की जगह हम पश्चिम से पैदा हो रहे नए-नए मानदंडों पर अपनी रचनाशीलता को न सिर्फ कस, बल्कि उसके आधार पर रच भी रहे हैं। साहित्य चिंतन के क्षेत्र में यह दरिद्रता की स्थिति है।

 

 

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