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चर्चा- संकटग्रस्त लोक

भारतीय समाज पश्चिमी दुनिया से भिन्न बहुसांस्कृतिक समाज है। शुरुआती दौर में शहर भी उसी तर्ज पर विकसित हुए।
Author November 5, 2017 04:57 am
प्रतिकात्मक चित्र।

राजकुमार

एक राजनीतिक अवधारणा के रूप में ‘बहुसांस्कृतिकता’ या ‘सांस्कृतिक बहुलवाद’ का उभार पिछली सदी में सत्तर के दशक में जोर पकड़ा। दर्शन के रूप में इसका इतिहास और पीछे जाता है। कनाडा में यह शब्द ‘विस्थापितों’ के लिए प्रयोग में लाया गया। जब आस्ट्रेलिया, अमेरिका, यूनाइटेड किंगडम आदि पश्चिमी राष्ट्रों में दुनिया के अलग-अलग हिस्सों से आकर लोग बसने लगे और वहां की नागरिक समरूपीकरण (हेमोजेनाइजेशन) की अवधारणा को चुनौती मिलने लगी तब सांस्कृतिक बहुलतावाद को नीतिगत रूप से स्वीकर कर लिया गया। एक समूह के रूप में विस्थापितों ने अपने अधिकारों की लड़ाई भी लड़ी। यह केवल राजनीतिक अधिकारों की लड़ाई नहीं, बल्कि सांस्कृतिक-धार्मिक अधिकारों, प्रतीकों और मान्यताओं की भी थी। राजनीतिक दृष्टि से विचार करें तो दुनिया के हर क्षेत्र और महानगरों में कमोबेश ऐसे आंदोलन चलते रहे हैं। इस अवधारणा ने पूरे विश्व में ‘नागरिक समूहों के अधिकारों’ और उसकी सांस्कृतिक अस्मिता को पुनर्परिभाषित किया। ‘सांस्कृतिक बहुलता’ को मान्यताएं भी मिलीं। लेकिन सामाजिक-सांस्कृतिक रूप में इसकी उपस्थिति की जो कल्पना थी, वह कई तरह की चुनौतियों और अंतर्विरोधों से घिरी है। मसलन, आप अधिकार या कानून का उपयोग कर अपनी आस्थाओं, धार्मिक-सांस्कृतिक प्रतीकों का इस्तेमाल कर सकते हैं। लेकिन उस ‘लोक’ या सामूहिकता को कहां से हासिल करेंगे, जो आपने पीछे छोड़ दिया या छूट गया है? शहर की संरचना और बनावट ने व्यक्ति की स्थानीय/ क्षेत्रीय पहचान काफी हद तक छीन ली है। उसने उसकी संस्कृति, नृत्य, गीत, संगीत, भाषा और जीवन-शैली से धीरे-धीरे अलग कर दिया है। जिनकी स्मृति में लोक-संस्कृति टंगी भी है, उनसे उनका लोक छिटक गया है।

भारतीय समाज पश्चिमी दुनिया से भिन्न बहुसांस्कृतिक समाज है। शुरुआती दौर में शहर भी उसी तर्ज पर विकसित हुए। औपनिवेशिक दौर के बाद शहर केंद्रित आर्थिक विकास और आधुनिकीकरण ने जैसे-जैसे पैर पसारने शुरू किए, लोग शहरों में दाखिल होने और अपने लोक-समाज और संस्कृति से कटने लगे। यहां तक कि शहर के क्षेत्र में आने वाले गांव भी परंपरागत गांव से भिन्न शहरी गांव में तब्दील हुए। वहां से भी ग्रामीण संस्कृति लुप्त हुई। दिल्ली, मुंबई, कोलकाता जैसे महानगरों में अलग-अलग प्रदेशों के लोगों का जमावड़ा है। वे अपनी भाषा, संस्कृति, धर्म, जीवनशैली, व्यवहार, खानपान आदि के साथ महानगरों में मौजूद हैं, लेकिन धीरे-धीरे उसे खो चुके हैं या खो रहे हैं। संस्कृति अपने भीतर ‘लोक’ को समेटे रहती है। उस ‘लोक’ में उस समाज की अभिव्यक्ति होती है। वह अभिव्यक्ति व्यक्ति की नहीं, समूह की होती है। लेकिन शहरीकरण ने उसे निगल लिया। शहरी व्यक्तियों के पास उनके पर्व, त्योहार, धार्मिक-सांस्कृतिक चिह्न और प्रतीक तो मौजूद हैं, लेकिन उस लोक की सामूहिकता गायब है, जो उन्हें गांवों में अंदर से भरे रखती थी।
‘लोक’ की निर्मिति ‘लोकाचार’ से होती है। शहर की विडंबना है कि वह लोकाचार के लिए मुफीद माहौल उपलब्ध नहीं कराता। शहरी व्यक्ति के लोक का निर्धारण कई कारकों पर निर्भर करता है। आर्थिक हैसियत, पद, प्रतिष्ठा, शहर के कानून और नियमावली आदि। मसलन, शहर में सरकारी भूमि या फ्लैट आदि का आबंटन जहां होगा वहां उसे रहना होगा या वह अपनी आर्थिक हैसियत के मुताबिक जगह चुनेगा। वहां आपका समाज या ‘लोक’ उपलब्ध हो यह संभव नहीं। इसलिए लोकाचार के अभाव में वह लोक-अभिव्यक्ति को भूलेगा, यह संभव है। इसको यों समझा जा सकता है कि अगर कोई भोजपुरी क्षेत्र का व्यक्ति फाग गाना चाहता है, तो उसे सुनने के लिए उस समाज और भाषा के लोग चाहिए। अगर उसके मुहल्ले या सोसायटी में भोजपुरीभाषी नहीं हैं तो वह संस्कृति एक व्यक्ति या परिवार तक ही सिमटी रहेगी। शहरी परिवेश व्यक्ति के ‘लोक-संसार’ में बहुत बड़ी बाधा है। छठ सामूहिक लोकपर्व माना जाता है। उसे तालाब या नदी के किनारे मनाने का रिवाज है। दिल्ली जैसे महानगर में यह छठ पूजा ‘छत पूजा’ में बदल गया। लोग अपनी छतों पर बाथटब में पानी भर कर, उसी में खड़े होकर पूजा कर रहे हैं। इससे व्यक्तिगत संतुष्टि या धार्मिक आस्था जरूर तुष्ट होती हो, पर सामूहिकता की भावना, लोकधर्मिता या लोकउत्सव गायब है। सामूहिक पर्व व्यक्तिगत या पारिवारिक पर्व में बदल जाने को विवश हैं। इसी तरह आदिवासी लोकनृत्य और संस्कृति के लिहाज से ‘शहरी-स्पेश’ बिल्कुल मुफीद नहीं है। उनके पर्व बड़े समूह की मांग करते हैं।

शहरी शादियों में गीतों का प्रचलन काफी कम होता गया है। जब तक शादी वाले घर में रिश्तेदारों का जमावड़ा नहीं होता, तब तक गीत नदारद रहते हैं। शहरी रिश्तेदार भी इन गीतों का हिस्सा नहीं बन पाते। विवाह संगीत के नाम पर फिल्मी गीतों ने जगह बना ली है। मजेदार दृश्य या शहरी विडंबना कहें कि दक्षिण भारतीय परिवारों में होने वाली शादियों में भी थिरकने के लिए पंजाबी गीत होते हैं। दूल्हा या दुल्हन का ड्रेस कोड शेरवानी या लहंगे में तब्दील हो गया है, चाहे वह राजस्थान, बंगाल, बिहार या हरियाणा का हो। सामूहिक खानपान की संस्कृति भी एक जैसी होती जा रही है। वर्चस्वशाली संस्कृतियां अन्य संस्कृतियों पर दबाव बनाती हैं कि या तो वे उन जैसी हो जाएं या उसके प्रभाव में हों। गांव के भोज में भी शहरी व्यंजनों ने जगह बना ली है। पूरे गांव को खिलाने के लिए लोग सामूहिक रूप से पूंड़ियां तलते थे, अब भाड़े पर खाना बनाने वाले आते हैं। इसने लोगों के बीच सहभाव को काफी कम किया है। सांस्कृतिक मिश्रण से भी सामुदायिक भावना विकसित हो सकती है, लेकिन अपनी परंपरा से कट कर संभव नहीं है। डोमनिक ने ‘मल्टीकल्चरल सिंफनी’ में संस्कृतिहीन होते जाने की विडंबना को यों दर्ज किया है- ‘अपने गांवों को शहरों में बदल दो/ और बनते जाओ अधिक से अधिक सभ्य/ पर कम से कम सुसंस्कृत।’

यह सामूहिकता की भावना और जुटान गांवों में भी खत्म हो रही है। पहले गांव के मंदिरों में, चौपालों, धार्मिक कथाओं या पर्व-त्योहारों में लोग जुटते थे और गीत-संगीत, नृत्य के माध्यम से अपनी लोक अभिव्यक्ति को स्वर देते थे। जैसे-जैसे कृषि संस्कृति और परंपरागत किसानी सभ्यता का क्षरण हो रहा है, लोक-संस्कृति और लोक-समूह विलुप्त हो रहे हैं। काफी हद तक आधुनिक तकनीक भी इसके लिए जिम्मेदार है। किसान ‘मुंह अंधेरे’ अपने अनाज बैलगाड़ी पर लाद काफिलों में मंडी का रुख करता था, तो बिरहा की तान छेड़ता था। धीरे-धीरे कतार में चलते बैलों के गले में लटकी घंटियां उन गीतों को स्वर देती थी। अब यह ट्रैक्टर के शोर में संभव नहीं है। चैती, कजरी आदि तो लोक से बिछड़ ही गए हैं। मशीनों से धान रोपा जा रहा है, इसलिए रोपनी के गीत गायब हो गए। जंतसार तो बहुत पहले लुप्त हो गया। इन लोकगीतों का श्रमिक संस्कृति के साथ गहरा रिश्ता था। किसानी संस्कृति के टूटन के साथ ही हमारी संस्कृति या सांस्कृतिक बहुलता के भीतर से उसकी अंतरात्मा में टूटन पैदा हो रही है। वैश्वीकृत सभ्यता में भले दुनिया सिमट कर मुट््ठी में आ गई हो और एक नया आभासी लोक रच रही हो, लेकिन यह लोक क्षणिक और आभासी सुख ही दे सकता है। वास्तविक दुनिया में हमारा लोक किस हद तक हमसे छीन रहा है इसकी त्रासदी निर्मला पुतुल के शब्दों में सुनें- ‘संथाल परगना/ अब नहीं रह गया संथाल परगना!/ बहुत कम बचे रह गए हैं/ अपनी भाषा और वेशभूषा में यहां के लोग’ … ‘कायापलट हो रही इसकी/ तीर-धनुष-मांदल-नगाड़ा-बांसुरी/ सब बटोर लिए जा रहे हैं लोक संग्रहालय/ समय की मुर्दागाड़ी में लादकर’।

 

 

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