ताज़ा खबर
 

आदिवासी विमर्श: बदलते मंजर की कसक

मीणा-मुंडा-संथाल जैसे कुछेक आदिवासी समुदाय आरक्षण का लाभ लेकर अपने अस्तित्व को बेहतर बनाने में कामयाब रहे हैं।

Author December 18, 2016 2:20 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर ।

केदार प्रसाद मीणा

आदिवासी समाज सदियों से समतामूलक और लोकतांत्रिक रहा है। इसमें संसाधनों के असीमित अधिग्रहण या कहें कि लूट के बजाय इनके समान वितरण को तरजीह देने की संस्कृति रही है। गांव में कोई बच्चा अनाथ न हो और कोई भूखा न रहे, यह इसका पहला सामाजिक मूल्य माना जाता है। बेटा-बेटी को एक समान समझा और संपत्ति में इनको बराबरी का हिस्सा दिया जाता है। बेटियां अगर पिता का घर छोड़तीं, तो दहेज के साथ नहीं, बल्कि वर पक्ष की ओर से दिए जाने वाले ‘वधू संस्कार’ के साथ; जिसे मुख्यधारा के विद्वानों ने अपने नजरिए से समझ कर ‘वधू मूल्य’ करार दिया और जिसे मूल्य नहीं, कीमत के रूप में समझाया गया है- यह समझे बगैर कि जो समाज फल-सब्जियों की कीमत नहीं लगाता, वह बेटी की कीमत कैसे लगा सकता है! प्रकृति के साथ आदिवासी का व्यवहार मानवीय होता है। इसमें वे अपने पूर्वजों की आत्माओं का वास देखते हैं और इस नाते वे प्रकृति को पूजते हैं। उनके इस मानवीय संस्कार को कई प्रगतिशील बुद्धिजीवियों ने अंधविश्वास कहा और माओवादियों ने आदिवासियों को बंदूक की नोक पर इन सांस्कृतिक मूल्यों से दूर किया। प्रकृति के प्रति यह निर्भरता उनके धर्म के रूप में सामने आती है। इस धर्म में पूरे ब्रह्मांड के प्रकृति तत्त्व शामिल हैं। यही वजह है कि बिरसा मुंडा आदि के प्रसिद्ध विद्रोहों में ब्रिटिश नीतियों, महाजनों द्वारा जमीन और फसलों की लूट के साथ-साथ प्रकृति से जुड़े सांस्कृतिक मूल्यों के अपमान के प्रति विरोध के स्वर भी देखने को मिलते हैं।

देश के सामंती समाज ने आदिवासियों को कभी सम्मान से नहीं देखा। उन पर कई बार कहर ढाए। यहां के प्रगतिशील और मानवाधिकारों की बढ़-चढ़ कर दुहाई देने वाले समाज भी इन्हें काफी हद तक हिकारत से ही देखते रहे हैं। मुख्यधारा का समाज आदिवासियों पर दया दिखाने, इनकी पहाड़-सी आपदाओं से सहानुभूति दिखाने को तो तैयार है, मगर इनके नाम पर आबंटित सरकारी धन को गैर-सरकारी संगठनों के सहारे या सीधे भ्रष्टाचार आदि के रास्ते लूट लेने को भी अपना कर्तव्य समझता है।

आजादी के बाद से आदिवासियों के नाम पर उठाए गए इन कदमों का एक प्रत्यक्ष प्रभाव यह देखने को मिलता है कि आदिवासियों को मुख्यधारा में शामिल करने के नाम पर उनकी सदियों से निर्मित पूरी सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था ढाह दी गई है। उस ‘आदिम’ व्यवस्था में आदिवासी समाज अपने ढंग से अपने पर्याप्त-अपर्याप्त उपलब्ध संसाधनों के सहारे खुशी से जीवन यापन कर लेता था। रुखा-सूखा खा लेता था और ढोल-मांदल की धुन पर अपनी प्रेयसी के संग नाच-गा लेता था। मगर इस नई सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था से बढ़ते परिचय के साथ उसके ढोल-मांदल तो हाथ से छूटे ही, उसकी प्रेयसी और उसके खेत-खलिहान भी उसके हाथ से निकलते चले गए। जो आदिवासी समाज बलात्कार-छेड़छाड़ का नाम नहीं जानता था, इस नई ‘सभ्य’ व्यवस्था से परिचय के बाद उसने अपनी बहनों-प्रेयसियों को सामूहिक रूप से नुचते-लुटते देखा।

आजादी के बाद से अब तक कोई पांच करोड़ आदिवासी विस्थापित हो चुके हैं। आदिवासियों के लिए ही बने अलग झारखंड राज्य में इसके बनने के बाद प्रतिवर्ष एक लाख के हिसाब से लगभग सोलह लाख आदिवासी विस्थापित हो चुके हैं। आधे विस्थापित गायब हो चुके हैं- झारखंड से ही नहीं, शायद इस धरती से ही। लाखों आदिवासी महिलाएं बलात्कार के बाद हत्या की शिकार हो चुकी हैं। लाखों लड़कियां भुखमरी के कारण शहरों में नौकरानियां बनने और वेश्यालयों में बिकने को मजबूर हो रही हैं। विस्थापन के बाद मिले मुआवजे को स्थानीय ‘दिकू’ लोगों ने लूट लिया। निरक्षर आदिवासी न मुआवजे को बचा कर उसका कोई बेहतर इस्तेमाल कर सका और न विकास परियाजनाओं-कारखानों में नौकरी पा सका। सभी नौकरियां बाहरी गैर-आदिवासी लोग लूट ले गए। आदिवासियों के पहाड़-खेत-खलिहान बाहरी लोगों के रईसी जीवन के साधनों में तब्दील हो गए। जंगल उजड़ गए, झरने सूख गए और नदियां जहरीली हो गर्इं। आदिवासी को मिला बेचारगी, भुखमरी, प्रदूषण से भरा जीवन और नक्सलवाद-माओवाद के भरोसे सरकारी और गैर-सरकारी संगठित लूट से बचने का भरोसा। इस भरोसे में आदिवासियों का जीवन लगातार अधिक उलझता चला गया। माओवादी आंदोलन कालांतर में एक तरफ आदिवासियों को आगे बढ़ने से रोकने की वजह बन गया तो, दूसरी तरफ भ्रष्ट सरकारी व्यवस्था द्वारा आदिवासियों को सताने का एक बहाना भी बन गया। आदिवासी दोनों तरफ से मारे जाने लगे।

आदिवासी समाज को कुछ राहत मिली संविधान प्रदत्त प्रावधानों से। मीणा-मुंडा-संथाल जैसे कुछेक आदिवासी समुदाय आरक्षण का लाभ लेकर अपने अस्तित्व को बेहतर बनाने में कामयाब रहे हैं। मगर सही वितरण और अनदेखी के कारण आरक्षण का लाभ जिन कुछ समुदायों को मिला है, उनमें भी कुछ इलाकों और विशेष परिवारों को ही इसका बेजा लाभ मिला है। ऐसे गांव या परिवार आदिवासियों में नव-सामंत बन कर उभरे हैं। इनमें अफसर और उनके माफिया परिवार सबसे ऊपर हैं। यह वर्ग अपने समाज के संघर्षों का हिस्सेदार नहीं बनता, जबकि उसके वोट के दम पर अपने निजी हितों की पूर्ति करने में सदैव आगे रहता है। आरक्षण के लाभ पिछड़े आदिवासी समुदायों तक पहुंचाने के लिए सरकारों ने कोई विशेष कदम अभी नहीं उठाए हैं, जबकि दूसरी तरफ मुख्यधारा के समाज का आरक्षण-विरोधी वर्ग कुछ संपन्न आदिवासी वर्गों की तरक्की को प्रचारित करके आरक्षण व्यवस्था पर तरह-तरह के सवाल उठाने में लगा है। आरक्षण का लूट की हद तक लाभ लेने वाले अभिजात्य आदिवासी अपने समुदायों की पिछड़ी जनता को यह नहीं समझने दे रहे हैं कि उन्हीं के कारण ये सवाल उठ रहे हैं। आदिवासी भाषाओं का लगातार लुप्त होते जाना सरकारों, मुख्यधारा के समाज और आभिजात्य आदिवासियों के लिए कोई मुद्दा ही नहीं है।

आदिवासियों विमर्श इन्हीं हालात की उपज है। यह सरकारी सर्वेक्षणों की नाकामियों को दुरुस्त करता आगे बढ़ा है। जंगल में बसे छोटे-छोटे गांवों के कई लेखक अपने समाज के बदलते रूपों को मुख्यधारा के समाज और हुक्मरानों के सम्मुख रख रहे हैं। कई गैर-आदिवासी साहित्यकार भी इस दिशा में सक्रिय हैं। यहां एक रोचक बात यह देखने को मिलती है कि गैर-आदिवासियों के आदिवासी केंद्रित लेखन को तो उनकी बड़ी बौद्धिक जिम्मेदारी समझा गया है, मगर खुद आदिवासियों द्वारा अपने हालात पर लेखन को जातिवादी किस्म का कार्य कह कर उपेक्षित करने की कोशिशें हुई हैं।

आदिवासी विमर्श बाकी की बर्बादी का आकांक्षी या इतिहास के पन्नों से बदला लेने के सपनों का विमर्श नहीं है। यह संपूर्ण दुनिया को लोकतांत्रिक मानवीय मूल्यों के साथ और सारी प्रकृति को उसकी संपूर्ण सृजनात्मकता के साथ बचाने की वैचारिक जद्दोजहद है। यह मनुष्य के हर कदम में सार्थकता देखता है और प्रकृति के हर कण में जीवन तत्त्व खोजता है। इसीलिए यह विमर्श हर किसी के लिखे को महत्त्व देता है। उसे परखता; उससे सहमत-असहमत होता है, मगर किसी मानवपक्ष को दुत्कारता नहीं है। ऐसे में यह जरूरी है कि आदिवासियों के लेखन और विचारों को भी साहित्य विमर्श में सम्मानजनक और जिम्मेदार स्थान प्राप्त हो। आदिवासी कम बोलते हैं- थोड़ा लिखते हैं, मगर इतने में अपने को सहज रूप में अभिव्यक्त कर देते हैं। इनके लिखे साहित्य में शिल्प की बारीक कारीगरियां देखने को नहीं मिलतीं, मगर हालात की अभिव्यक्ति आला दर्जे की वास्तविक और भावपूर्ण देखने को मिलती है।

 

 

 

नोटबंदी: सुप्रीम कोर्ट का सरकार की नीति में हस्तक्षेप करने से इंकार; नहीं बढ़ाई पुराने नोटों के इस्तेमाल की समयसीमा

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App