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विमर्श- तीसरी सत्ता का संघर्ष

एक और वर्ग है जो न स्त्री है और न पुरुष है, लेकिन हमेशा से समाज का अभिन्न हिस्सा रहा है। जिसे समाज ‘तीसरी दुनिया’, ‘थर्ड जेंडर’, ‘किन्नर’, ‘हिजड़ा’ आदि के रूप में जानता और पहचानता है। पहले इन्हें ख्वाजासरा कहा जाता था और ये महलों के रनिवास में रहते थे।

Author December 31, 2017 05:07 am
तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीक के तौर पर किया गया है।

कहा जाता है कि भारतीय समाज और संस्कृति की एक प्रमुख विशेषता ‘समन्वयशीलता’ है, पर यह कटु सत्य है कि यह बात सभी संदर्भों में समान रूप से लागू नहीं होती। बहुवर्गीय सामाजिक संरचना के आवरण के पीछे मूल संरचना में हमारा समाज दो वर्गों में बंटा हुआ है। स्त्री और पुरुष दो वर्ग ही मुख्यधारा में हैं। जन्म से ही इनका वर्ग निर्धारण हो जाता है। इन्हीं दोनों वर्गों के समानांतर एक और वर्ग है जो न स्त्री है और न पुरुष है, लेकिन हमेशा से समाज का अभिन्न हिस्सा रहा है। जिसे समाज ‘तीसरी दुनिया’, ‘थर्ड जेंडर’, ‘किन्नर’, ‘हिजड़ा’ आदि के रूप में जानता और पहचानता है। पहले इन्हें ख्वाजासरा कहा जाता था और ये महलों के रनिवास में रहते थे। रामायण और महाभारत सहित तमाम प्राचीन ग्रंथों और पौराणिक कथाओं में इसके प्रमाण मौजूद हैं। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में भी इनका उल्लेख मिलता है। लोक/ मिथकों में उल्लेख है कि ‘जब राम पैदा हुए थे तब भी हिजड़ों ने बधाई बजाई थी और जब कृष्ण पैदा हुए थे तब भी बजाई थी। द्वारिका में कोई भी खुशी मनाई जाती थी, तो उसमें इनकी उपस्थिति रहती थी।

इस संदर्भ में सबसे अधिक हैरान करने वाली बात यह है कि यह वर्ग हमेशा से समाज में विद्यमान तो रहा है, लेकिन किसी भी काल में इनके अधिकारों की बात कभी नहीं उठाई गई। इनके लिए शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार जैसी सुविधाओं की बात करना बेमानी है। सुविधाओं और अधिकारों के लिहाज से इस बहुवर्गीय सामाजिक ढांचे में ये कहीं भी फिट नहीं बैठते हैं। इनका कोई गोत्र नहीं होता, कोई जाति नहीं होती, कोई धर्म नहीं होता, यहां तक कि इनके पास सामाजिक मान्यता प्राप्त पहचान का कोई भी चिह्न नहीं होता है। हमारी सामाजिक व्यवस्था, जिसमें ‘शिक्षा है सबका अधिकार’ नारा दिया जाता है, वहां भी इनके लिए किसी विशेष शिक्षा की व्यवस्था नहीं है। अगर ये समाज के ‘विशेष श्रेणी’ हैं, तो जिस तरह विकलांगों के लिए विद्यालय/ विश्वविद्यालय हैं, इनके लिए भी होने चाहिए और अगर इन्हें ‘विशेष श्रेणी’ नहीं माना जा रहा है, तो सामान्य नागरिक की तरह इन्हें भी शिक्षा नीति में स्थान मिलना चाहिए। किसी भी प्रकार के रोजगार में अब तक इनके लिए कोई ठोस नीति नहीं दिखाई देती है।

हालांकि राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (नाल्सा) बनाम भारत संघ और अन्य के मामले में उच्चतम न्यायालय द्वारा इस समुदाय को ‘तृतीय लिंग’ (थर्ड जेंडर) के रूप में पहचान देने के साथ ही उन्हें सभी विधिक और संवैधानिक अधिकार प्रदान करने का निर्देश केंद्र और राज्य सरकार को देो के बाद इनकी पहचान निश्चित करने की दिशा में पहला कदम उठाया गया है। 15 अप्रैल, 2014 को न्यायमूर्ति केएस राधाकृष्णन और न्यायमूर्ति एके सीकरी की खंडपीठ द्वारा यह निर्णय दिया गया। यह फैसला एक तरह से इस वर्ग के हित में है, क्योंकि यह उनकी पहचान सुनिश्चित करता है, पर एक वर्ग ऐसा भी है, जो ‘तीसरे लिंग’ की इस पहचान को स्वीकार नहीं करना चाहता। समाज और घर परिवार भले जनन अंगों से विकारग्रस्त व्यक्ति को हिजड़ा या किन्नर कह कर ‘थर्ड जेंडर’ वर्ग में नामांकित करते हैं, पर वास्तविकता इससे कहीं इतर है। प्रत्येक किन्नर भीतर से आत्मिक, मानसिक और अनुभूति के स्तर पर या तो स्त्री होता है या पुरुष। समस्या इस बात की है कि वह अपनी जननेंद्रियों से हीन होने के कारण समाज और परिवार द्वारा तिरष्कृत होता रहता है। सामाजिक स्तर पर व्यावहारिक रूप से इस ऐतिहासिक और साहसिक फैसले को क्रियान्वित होने में समय लग सकता है। क्योंकि हमारे समाज का बड़ा हिस्सा पूर्वाग्रहों से ग्रस्त है। यहां हरेक सक्षम वर्ग द्वारा इन्हें हमेशा बड़ी हिकारत से देखा गया है। यही कारण है कि समाज में इस वर्ग के संघर्ष का कोई अंत नहीं रहा है।

इनके साथ सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह है कि समाज के साथ ही इनके स्वयं के परिवार वालों द्वारा भी इन्हें त्याग दिया जाता है। जन्म से लेकर पूरा जीवन ये समाज में रहते हुए भी समाज से इतर बहिष्कृत होकर जीवन यापन करते हैं। मूलभूत सुविधाओं और आवश्यक आवश्यकताओं के लिए भी इन्हें भीषण संघर्ष करना पड़ता है। ये नाच-गा कर, बधाई बजा कर अपना पालन-पोषण करते हैं, शुभ अवसरों पर इनके द्वारा नेग लेने की परंपरा वर्षों से चली आ रही है। यह अपनी दुआओं से समाज की झोली तो भर देते हैं, पर इसके बदले इन्हें कभी दुआएं नहीं मिलती। ये जन्म से ही समाज द्वारा तिरस्कृत होने को अभिशप्त हैं। यह पाया गया है कि समाज की अथाह घृणा को सहने के बाद भी यह वर्ग सामान्य वर्ग से कहीं अधिक संवेदनशील होता है। इसी कारण लोग पलट-पलट कर इनके पास जाते हैं और अपनी मुरादें पूरी होने का आशीर्वाद मांगते हैं। क्योंकि समाज में यह मान्यता सदियों से चली आ रही है कि किन्नरों की दुआ का असर जरूर होता है और इससे धन, संतान, स्वास्थ्य आदि की मनोवांछित इच्छाएं फलीभूत होती हैं। इसके बाद भी सभ्य समाज इनके प्रति पूर्वाग्रहग्रस्त बना रहता है।

यह भी देखा गया है कि सामाजिक-राजनीतिक-सांस्कृतिक-आर्थिक आदि के चर्चित/ विवादित मुद्दे या आंदोलन साहित्य में आकर विमर्श का रूप ले लिया करते हैं। पर इस वर्ग के साथ यह बहुत बड़ी विडंबना रही है कि सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक मुद्दों के साथ ही कला और साहित्य में भी इस वर्ग की घोर उपेक्षा की गई है। जहां इनका उल्लेख हुआ भी है, वहां बहुत हल्के व्यंग्य आदि के साथ हुआ है। आज जिस विमर्शीय समय में हम रह रहे हैं वहां कुछ भी स्थिर नहीं है, न वाद न विवाद और न ही संवाद। एक ऐसे समय में, जब हाशिए के विषय मुख्यधारा में आ चुके हैं और खुल कर उनके अधिकारों पर बात हो रही है, उनकी पड़ताल की जा रही है और विविध दृष्टियों से उन पर चर्चा/ विमर्श भी किया जा रहा है, तब भी ‘तीसरे लिंग’ पर उतनी बात नहीं हो रही है, जितनी अब तक हो जानी चाहिए थी। साहित्य में भी उंगलियों पर गिनने लायक प्रयास ही हुए हैं।

फिर भी यह संतोषजनक है कि यह विषय वर्तमान साहित्य में अपनी पैठ बना चुका है। यह अल्पसंख्यक अस्मिताओं पर विमर्श का दौर है। दशकों पहले से दलित विमर्श, स्त्री विमर्श और आदिवासी विमर्श से आच्छादित साहित्य का फलक आज तीसरी सत्ता पर कलम उठाने के लिए बाध्य हो गया है। बाध्यता इस बात की कही जा सकती है कि साहित्य को समाज का दर्पण कहा जाता है, वह सामाजिकता से इतर हो ही नहीं सकता। उसकी सदा से सामाजिक संबद्धताएं और सरोकार रहे हैं। साहित्य का उद्देश्य सामाजिक व्यवस्था में परिवर्तन करना भले न हो, फिर भी वह संकीर्ण मानसिकता को बदलने में सहायक की भूमिका निभाता ही है। समय-समय पर होने वाले आंदोलनों को साहित्य ने मजबूत जमीन प्रदान की है। प्रेमचंद ने साहित्य को यों ही जलती हुई मशाल नहीं कहा है। ‘मशाल’ शब्द जितना ‘रोशनी’ से संबंधित है, उससे कहीं ज्यादा ‘आग’ के अर्थ का द्योतक है। वही आग और रोशनी आज किन्नर विमर्श के रूप में सामने है। यह साहित्य की संबद्धता ही है, जो इधर कुछेक वर्षों में इस विषय पर गंभीर चर्चाएं हुई हैं। वर्तमान समय में कई भाषाओं की विविध विधाओं में इस विषय पर लेखन हो रहा है। हिजड़ों को केंद्र में रख कर कई उल्लेखनीय कहानियां और उपन्यास लिखे गए हैं।

 

 

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