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प्रसंग: राष्ट्रगान से बाहर होता राष्ट्र

खेद की बात है कि हम औपचारिकता के निर्वाह में राष्ट्रगान तो गा लेते हैं, मगर अपने सारे अवयवों और उपादानों के साथ राष्ट्रबोध से वंचित रह जाते हैं।

मुंबई के एक स्कूल में राष्ट्रगान के दौरान झंडा फहराती स्टूडेंट (Express photo by Amit Chakravarty)

हमें यह कतई नहीं भूलना चाहिए कि लोकतंत्र की अवधारणा का जन्म ही व्यक्ति सत्ता के निषेध और सामूहिक सत्ता की गरिमा की अभ्यर्थना से हुआ है। सामूहिक अस्तित्व की अभ्यर्थना ही राष्ट्र की अभ्यर्थना है, लोकतंत्र की अभ्यर्थना है।

आजादी के आंदोलन के दौरान स्वतंत्रता की अभीप्सा से उत्क्रांत भारतीय चेतना की बिल्कुल नई, मौलिक और ठोस उपलब्धि राष्ट्र की परिकल्पना है। राष्ट्र के स्वरूप से प्रेम और राष्ट्र की अस्मिता के प्रति पूजा का यह भाव भारतीय इतिहास की महत्तम उपलब्धि है। बहुसंख्य देवताओं के इस देश में राष्ट्र देवता की उपस्थिति अनेक अर्थों में बेहद मूल्यवान है। यह देवता चेतना के सूक्ष्म धरातल पर अवलंबित न होकर हमारे प्रत्यक्ष बोध पर आधारित है। वह इतना ठोस और प्रत्यक्ष है कि हम अपने हर व्यवहार में उससे अनायास जुड़े हैं। वह हमारे बीच पहली बार एक ऐसे देवता के रूप में है, जिसके अस्तित्व में हमारा अस्तित्व घटक के रूप में मौजूद है। हर देशवासी देश की अस्मिता के तत्त्व में मौजूद है। ‘राष्ट्र देवता’ की अस्मिता में राष्ट्र के हर नागरिक की- प्रथम से लेकर अंतिम नागरिक तक की अस्मिता समाहित है। अपने ही अस्तित्व के पुंजीभूत विग्रह से मिला हुआ यह देवता अन्यतम है।

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हमारी परंपरा में कुल देवता और ग्राम देवता पहले से मौजूद थे। राष्ट्र देवता के रूप में उनका उन्नयन भारतीय जाति के चिंतन के विस्तार और उत्कर्ष का साक्ष्य बन जाता है। ऐतिहासिक रूप से राष्ट्रदेव की धारणा हमारी गौरवपूर्ण उपलब्धि बन जाती है। राष्ट्रपूजा और राष्ट्रप्रेम की आस्था के पीछे और कुछ नहीं, भारतीय जाति की सामूहिक उन्नति, उत्कर्ष, समृद्धि और सामूहिक मजबूती की अदम्य अभिलाषा ही जाग्रत होकर सजीव हो उठी थी। राष्ट्र की देवता के रूप में अधिष्ठापना भारतीय जनमानस की सामूहिक अस्मिता की पहचान की उद्घोषणा से अलग नहीं है। इसी उद्घोषणा का संपूर्ण उद्घोष भारतीय अस्मिता को वैश्विक धरातल पर प्रतिष्ठित करने वाले रवींद्रनाथ ठाकुर के राष्ट्रगान में व्यक्त है।

रवींद्रनाथ ठाकुर के राष्ट्रगान में हमारी आस्था का केंद्र राष्ट्र अपने सारे अवयवों और उपादानों के साथ अपनी समूची आंतरिक समृद्धि में उपस्थित है। इसमें बंकिमचंद्र के ‘वंदे मारतम्’ की समूची गरिमा भी गुंजित है। इसमें जयशंकर प्रसाद के ‘अरुण यह मधुमय देश हमारा’ की असीमता का गौरवबोध भी समाहित है। हमारे राष्ट्रगान में राष्ट्रबोध और राष्ट्रभक्ति का अपूर्व सामासिक संयोजन चामत्कारिक रूप से घटित हो सका है। हम कह सकते हैं कि स्वाधीनता आंदोलन के समूचे सर्वथा मौलिक मूल्यबोध को राष्ट्रगान अकेले पूरी तरह से व्यक्त करने में सफल सिद्ध हो सका है।

भारत को जन-गण का नहीं बल्कि जन-गण-मन का अधिनायक कह कर कवि ने सबसे कम शब्दों में अपूर्व रीति से बहुत बड़ी बात कहने में सफलता सिद्ध की है। अभी तक अधिनायक जन समूहों पर शासन करने वाले होते रहे हैं। मगर अभी-अभी जो भारत नाम का देवता हमारे बीच अधिष्ठित हुआ है, वह समस्त देशवासियों के हृदय पर प्यार पूर्ण शासन करने वाला है। उसका शासन प्यार का अनुशासन है। उसे सबने अपना हृदय दे रखा है।

दरअसल, राष्ट्रगान में ‘भारत भाग्यविधाता’ संबोधन पद नहीं है। संबोधन पद सिर्फ भारत है। यहां भारत का कोई भाग्यविधाता नहीं है। भारत ही सबका भाग्यविधाता है। समस्त भारतवासियों का अलग-अलग भाग्य नहीं है। बल्कि समस्त देशवासियों के भाग्य का निर्माण करने वाला, उनके भविष्य को बनाने वाला स्वयं भारत है। राष्ट्र से ही समस्त राष्ट्रवासियों का भाग्य जुड़ा हुआ है। बड़ी ही सादी, पर आलंकारिक शैली में कवि ने भारत राष्ट्र को संबोधित किया है। सामासिक भाषा में इतने विपुल अर्थ विस्तार का संयोजन कविता के क्षेत्र में यहां एक दुर्लभ घटना की तरह शोभित है। विराम और समास चिह्नों के साथ अगर कविता का आलेखन हो तो प्रारंभिक राष्ट्रगान की पंक्तियों का पाठ कुछ इस तरह का होगा-‘जन (के) गण (के) मन (का) अधिनायक/ जय हे, भारत! भाग्यविधाता’

इसे दुर्भाग्य या जो भी कहें, मगर हमेशा हमारे बीच कुछ अपने को महत्तम समझने वाले लोगों की बुद्धि में अपनी राष्ट्रीय उपलबिधयों की हेयता को प्रमाणित करने की सूझ कौंध जाती है। राष्ट्रगान में भी कौंधी। उन्होंने राष्ट्रगान में ‘भारत भाग्यविधाता’ पद को संबोधन समझ कर उसकी खोज शुरू कर दी। इस तलाश की मुकम्मल अभिव्यक्ति रघुवीर सहाय की कविता की पंक्तियों में व्यक्त है- ‘राष्ट्रगान में भला कौन वह भारत भाग्यविधाता/ पहन सुथन्ना जिसके हरिचरना गुन गाता।’

राष्ट्रगान में भारत के भाग्यविधाता की खोज छिद्रान्वेषी दंभी बुद्धिजीविता ने शुरू की और उपाधिधर्मी साहित्यिक अनुसंधानों की तरह जार्ज पंचम को खोज भी लिया। तब से अब तक एक वर्ग का दुष्प्रचार राष्ट्रगान के साथ चस्पां कर दिया गया कि यह कविता जार्ज पंचम के स्वागत के लिए जार्ज पंचम को संबोधित स्वागत गान है। राष्ट्रगान को स्वागतगान में बदलने वाली सूझ पर हमें गर्व करना चाहिए या ग्लानि में लज्जित होना चाहिए, यह तो भारतीय गणतंत्र के भावी उत्तराधिकारियों के गौरव पर निर्भर है। मगर हमें यह कतई नहीं भूलना चाहिए कि लोकतंत्र की अवधारणा का जन्म ही व्यक्ति सत्ता के निषेध और सामूहिक सत्ता की गरिमा की अभ्यर्थना से हुआ है। सामूहिक अस्तित्व की अभ्यर्थना ही राष्ट्र की अभ्यर्थना है, लोकतंत्र की अभ्यर्थना है। हम यह गर्व के साथ कहना चाहते हैं कि रवींद्रनाथ ठाकुर राष्ट्र और लोकतंत्र की गरिमा की अर्चना के आधुनिक भक्त कवि हैं।

हमारे राष्ट्रगान में हमारे राष्ट्र का ठोस और चाक्षुष स्वरूप भी मूर्तिमान है और उसका तरल आत्मिक स्वरूप भी उसमें बिंबित है। ‘पंजाब-सिंध-गुजरात-मराठा’ में उसकी ठोस संरचना व्यक्त है और ‘विंध्य-हिमाचल-यमुना-गंगा’ में उसकी सांस्कृतिक आत्मचेतना बिंबित है। इस विशाल देश की असीम जनभावना की भक्ति को, देशभक्ति को कवि ने ‘तव शुभ नामे जागे’ कह कर जो मार्मिक उद्घाटन किया है, वह अन्यतम है। हृदयहारी है। देश के समस्त देशवासियों का जागरण देश के नाम के साथ होने का बोध देशभक्ति के अपूर्व भाव की अनूठी अभिव्यक्ति है। देश के नाम से जाग कर अपनी सारी दिनचर्या को देशसेवा के लिए अर्पित करके फिर देश देवता से ही अपनी अभ्युन्नति के लिए आशीष मांगने का समुज्ज्वल भावबोध भगवद्भक्ति और देशभक्ति में अभेद की प्रतिष्ठा करता है।

भगवद्भक्ति की भिन्न प्रणालियों और भिन्न बोधों के बीच देशभक्ति की सर्वथा नई प्रणाली और नए बोध को जोड़ने के कारण भक्ति के इतिहास में यह एक नए अध्याय का आविर्भाव है। इस अध्याय का हमारा राष्ट्रगान मंगलाचरण है। इस अध्याय का पाठ हमारे राष्ट्र और हमारे लोकतंत्र के वर्तमान और भावी गौरव का आधार है।

खेद की बात है कि हम औपचारिकता के निर्वाह में राष्ट्रगान तो गा लेते हैं, मगर अपने सारे अवयवों और उपादानों के साथ राष्ट्रबोध से वंचित रह जाते हैं। हमारे राष्ट्रगान में राष्ट्र अनुपस्थित होता जा रहा है। राष्ट्रबोध के माध्यम से राष्ट्रभक्ति का सही पाठ हमारे राष्ट्रगान में संरक्षित है। भारतीय जन-मन में जय हे भारत! की गूंज ही भारत की अक्षुण्ण अभ्युन्नति की एकमात्र मंत्रशक्ति है। व्यक्ति की जयगाथा नहीं, दल की जयगाथा नहीं, देश की जयगाथा, देश के अंतिम व्यक्ति की जयगाथा का अनुष्ठान ही देशभक्ति है।

 

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