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तीरंदाज: अज्ञान का विज्ञान

वैज्ञानिक तथ्यों को वैज्ञानिक तरीके से काटा नहीं जा सकता था, इसलिए सिगरेट निमार्ताओं ने कुछ अलग ही सोचा।

Author January 15, 2017 4:17 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर

अश्विनी भटनागर

अज्ञान का विज्ञान आ गया है। इसे अग्नोटोलॉजी कहते हैं। इस विद्या का विषय क्षेत्र वह सब कुछ है, जिससे पुख्ता सबूतों की विश्वनीयता पर सवालिया निशान लगा कर उनकी वैधता कम की जाती है या फिर उनको शक के दायरे में इस तरह बांधा जाता है कि आम लोग उनको अस्वीकार कर देते हैं। दूसरे शब्दों में, अग्नोटोलॉजी गुमराह करने के तरीकों की विद्या है और छल-कपट, अर्धसत्य या सरासर झूठ उसके उपयोगी संसाधन हैं।  ज्ञान को पीछे धकेल कर अज्ञान को प्रचलित और प्रसारित करना हमारे वर्तमान का सच होता जा रहा है। लगभग हर क्षेत्र में निहित स्वार्थ अपने फायदे के लिए अज्ञान के अंधेरे को और गहराने में लगे हैं। हमारी रोजमर्रा की जिंदगी में अज्ञान का छल इस सलीके से घोला जा रहा है कि असत्य सत्य से ज्यादा विश्वसनीय होता जा रहा है। हालात यहां तक पहुंच गए हैं कि सूचना और जानकारी के इस युग में अतथ्य का बोलबाला है और झूठ इस कदर चलायमान हो गया है कि उसका पकड़ा जाना लगभग असंभव है।

अज्ञान का वाणिज्य बड़ा धंधा है। अज्ञान में ही सबका स्वार्थ है। बड़ी कंपनियां हों, सरकारें हों या फिर राजनीति, सबकी जड़ें तब तक मजबूत हैं जब तक आम लोग अज्ञान के चक्रव्यूह में फंसे हैं। ज्ञान या फिर सामान्य जानकारी भी इनकी सेहत के लिए हानिकारक है। दरअसल, हर मौके पर नए अज्ञान का निर्माण वर्तमान व्यवस्थाओं के लिए जरूरी है। अतथ्य उनकी जीवन घुट््टी है। बीबीसी फ्यूचर के एक लेख में अज्ञान के विज्ञान के जन्म की रोचक कहानी छपी है। 1969 में अमेरिका की तंबाकू लॉबी बड़ी परेशान थी। एक के बाद एक रिसर्च पेपर्स आ रहे थे, जिनमें तंबाकू खाने या पीने से कैंसर होने का सीधा संबंध स्थापित हो रहा था। इससे सिगरेट बनाने वाले खासकर चिंतित थे। उनको डर था कि उनका धंधा पूरी तरह चौपट हो जाएगा। कैंसर से बचने के लिए लोग सिगरेट पीना छोड़ देंगे।

वैज्ञानिक तथ्यों को वैज्ञानिक तरीके से काटा नहीं जा सकता था, इसलिए सिगरेट निमार्ताओं ने कुछ अलग ही सोचा। उन्होंने सच के चारों ओर शक का घेरा डालना शुरू कर दिया। एक गोपनीय मेमो जारी किया गया- ‘‘हम तथ्यों को अपने तथ्यों से नहीं काट सकते, पर उन पर सवाल जरूर उठा सकते हैं, हमें विवाद पैदा करना होगा। तथ्यों पर शक की अंगुली उठानी होगी।’’विवाद की प्रक्रिया सरल है। जब भी कोई तथ्यपरक बात हो तो कुछ लोग माने-बेमाने आरोप लगाने लगें। शोर-शराबा करें, जिसका उद्देश्य केवल मुद्दे से ध्यान हटाना हो। इससे लोग बहक जाएंगे और उनका आचरण वही बना रहेगा, जैसा सिगरेट उत्पादक चाहते हैं। यानी सही जानकारी दब जाएगी और ऊहापोह के कुहासे का लाभ उत्पादक उठाते रहेंगे। सिगरेट लॉबी की इस रणनीति को स्टैंडफोर्ड यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर रॉबर्ट प्रॉक्टर ने पकड़ा और उसका अध्यन करना शुरू किया। जल्द ही उनकी समझ में आ गया कि एक साधारण-सा मेमो अपने पैर हर क्षेत्र में पसार चुका है और उसके इर्द गिर्द एक पूरी विधा पनप रही है। उन्होंने इस विधा को अग्नोलोटोलॉजी नाम दिया।

प्रॉक्टर ने अपने शोध में देखा कि हर क्षेत्र में निहित स्वार्थ जानबूझ कर एक षड्यंत्र के तहत वाजिब और ठोस मुद्दों को बहस में फंसा रहे हैं, जिससे जन चेतना भ्रमित रहे और उनकी स्वार्थ सिद्धि होती रहे। जलवायु परिवर्तन (क्लाइमेट चेंज) इस बहसबाजी की सबसे बड़ी मिसाल है। मौसम कैसे बदल रहा है और उसके क्या दुष्परिणाम हैं, यह हर व्यक्ति के सामने है। वह उसको प्रति दिन भुगतता है, पर फिर भी उसकी प्रामाणिकता पर भ्रमित है। तथ्यों का पहाड़ उसके सामने खड़ा है, पर बहस के चलते वह अपने को पूरी तरह से संबद्ध नहीं कर पा रहा है। विस्मित है। कन्फ्यूज्ड है। अज्ञान की विद्या के छल में फंस गया है।
अक्सर इन शोर-शराबे वाली बहसों को बैलेंस्ड डिबेट का नाम दिया जाता है।

गंभीर चिंतकों और शोधकर्ताओं को मीडिया में बुलाया जाता है और फिर उनको अपने पूरे तथ्य जनता के सामने रखने नहीं दिए जाते। दूसरा पक्ष बीच में ही उन पर टूट पड़ता है और विषय को किसी और दिशा में ले जाता है। बात यह कह कर खत्म कर दी जाती है कि बहस जारी रहेगी और अभी अंतिम निर्णय नहीं लिया जा सकता है। इस तरह के डिबेट संशय फैलाने का कारगर हथकंडा हैं। कॉरपोरेट दुनिया के विज्ञान से राजनीतिक हलके भी प्रभावित हुए हैं। चुनावी वादे इसी प्रक्रिया के तहत आते हैं। अमेरिका में हुए राष्ट्रपति चुनाव में डोनाल्ड टंÑप अच्छी तरह से जानते थे कि वे ऐसे कई वादे कर रहे हैं, जो या तो सारासर झूठ या फिर असंवैधानिक हैं। पर उन्होंने इसकी परवाह नहीं की। वे लोगों के अज्ञान को जान रहे थे और उसी अज्ञान को आगे बढ़ा रहे थे। उनका फायदा इसी में था। और अगर किसी ने उनको पकड़ा भी तो उन्होंने उसको यह कह कर उड़ा दिया कि वह व्यक्ति अमेरिका को फिर से महान नहीं देखना चाहता है।

ट्रंप अकेले नहीं हैं। दुनिया भर के राजनेता अपनी-अपनी भ्रम फैलाने की फैक्ट्री खोले बैठे हैं। अज्ञान उनका प्रोडक्ट है। छल उनका मार्केटिंग प्लान है। और उनका झूठ न पकड़ा जाए इसलिए हर मुद्दे को बहस में फंसाते रहते हैं। पिछले कुछ सालों से चल रहे टीवी डिबेट्स इस स्ट्रेटेजी का जीता-जागता प्रमाण हैं। दलों के नेता/ प्रवक्ता जानते हैं कि आम लोग ज्यादातर मुद्दों के विशेषज्ञ नहीं हैं। उनकी जानकारी सतही है। वे इसका फायदा उठाते हैं और कुतर्कों से लोगों को असमंजस में डाल देते हैं। इस संदर्भ में राजनीतिक पहाड़ा बहुत सरल है- जो जितना असमंजस फैलाएगा, वह उतने ही वोट पाएगा।

प्रॉक्टर का मानना है कि हम पूर्ण अज्ञानता के युग में जी रहे हैं। इंटरनेट की वजह से हर व्यक्ति अपने को एक्सपर्ट मानने लगा है, जबकि वास्तिविकता यह है कि इंटरनेट का शोर हर तथ्य को अपने में गायब कर देता है। इस सागर से असली मोती ढूढ़ कर लाना टेढ़ी खीर है। विडंबना यह है कि इस तथ्य को हम स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है कि नेट पर सब कुछ है फिर भी कुछ नहीं है। वास्तव में इंटरनेट से अज्ञान बढ़ा है। इसकी वजह से हमारे पास सूचनाएं बहुत हैं, पर उन सबका योग ज्ञान नहीं है। उनसे तथ्यपरक फैसले नहीं हो पाते हैं। अगर देखा जाए तो ट्विटर या फेसबुक की भीड़ चुनावी रैली की भीड़ से अलग नहीं है। वही शोर, वही उन्माद है। शायद नेट जैसी तथाकथित सुविधाओं का प्रयोग भी अतथ्य प्रसारित करने के लिए किया जा रहा है। मकड़जाल बढ़ता ही जा रहा है। इससे निजात की फिलहाल कोई सूरत बनते नहीं दिखती है।

 

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