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नए पाठ का मानस

‘तेहिं कीन्ह प्रकट पाखंड’ (लंकाकांड) जैसी पंक्ति में रावण की माया और बाजार के पाखंड में एक साम्यता दिखती है। राम-रावण युद्ध में रावण ‘मल्टी-पर्सनॉल्टी’ में तब्दील हो जाता है।

हिंदू धर्म ग्रंथ में रामायण को बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है।

नेहा मिश्रा

‘यह वो समय है/ जब शेष हो चुका है पुराना/ और नया आने को शेष है’ -अरुण कमल।
‘पाठ’ के बारे में उम्बर्तो इको का कहना है, ‘किसी भी कृति का पाठ जब हम करते हैं तो, तब तक वह पाठ नहीं कहलाएगा जब तक उसके परंपरित पाठ में हम कुछ नया न जोड़ दें।’ इस दृष्टि से यह समय भारतीय मेधा की एक अनुपम रचना ‘रामचरितमानस’ के नए पाठ का भी है, जिसमें बहुत-सी व्याख्याएं संभव हो सकती हैं। यह ध्यान रखना भी जरूरी है कि जिस समय में हम यह पाठ कर रहे हैं, उस समय ने वर्तमान युग की संस्कृति, उसके चिंतन और सौंदर्यशास्त्र को चिह्नित करने के साथ-साथ जिस नए सत्य का ईजाद किया है, उसे ‘पोस्ट ट्रुथ’ (उत्तर-सत्य) की संज्ञा दी गई है। यानी अब तमाम सत्य सापेक्ष हैं तथा निरपेक्षता महज भ्रम है। साहित्य अब एक सांस्कृतिक पाठ के रूप में मौजूद है। संदर्भों से जोड़ कर पाठक आज एक पाठ का अनंत अर्थ कर रहा है। इस दृष्टि से रामचरितमानस के कई सारे पाठकीय सच हमारे सामने उपस्थित होंगे।
बौद्रिला के ‘वस्तुओं की छलना’ और रामचरितमानस में राम का माया से बने मृग के पीछे भागने में एक संगति दिखाई देती है। इस माया रूपी मृग के पीछे भागने का परिणाम सीता रूपी सत्त्व को खो देने के रूप में सामने आता है। ऐसी ही ‘छलना’ का मार्मिक बिंब ‘विनयपत्रिका’ में भी देखने को मिलता है-‘ज्यों गच-कांच विलोकि से, जड़ छांह आपने तन की/ टूटत अति आतुर अहार बस छति बिसार आनन की।’
आज का मनुष्य वस्तुओं से घिरा हुआ है। आज बाजार अपनी शक्ति को बरकरार रखने के लिए विज्ञान के छल-बल का सहारा ले रहा है। ‘तेहिं कीन्ह प्रकट पाखंड’ (लंकाकांड) जैसी पंक्ति में रावण की माया और बाजार के पाखंड में एक साम्यता दिखती है। राम-रावण युद्ध में रावण ‘मल्टी-पर्सनॉल्टी’ में तब्दील हो जाता है। बाजार का बहुविध रूप भी आज के समय का सच है। ‘अब बहु भए दसकंधर’ (लंकाकांड) में बाजार के इस विस्तार की व्याप्ति देखी जा सकती है, जहां बाजार दिन-प्रतिदिन हमारी अंतहीन आवश्यकताओं को पैदा कर रहा है।

ज्ञान और सत्ता के पारस्परिक अंतरसंबंधों की दृष्टि से भी रामचरितमानस का पाठ दिलचस्प होगा। ‘हमें पूछिहैं कौन’, ‘भरतहिं होइ न राजमद’, ‘पंडित सोई जो गाल बजावा’ में सत्तापक्ष की वाचालता व पीड़ित वर्ग की खामोशी को देखा-सुना जा सकता है। एक स्थान पर तुलसी लिखते हैं-‘रावन रथी बिरथ रघुबीरा, देखि विभीषन भयउ अधीरा’। यह पंक्ति फूको के शक्ति-संरचना संबंधी उस विचार से अपना सामीप्य बिठा लेती है, जहां वे कहते हैं कि समाज में जो दमनकारी शक्तियां हैं, उनका विरोध उसी संरचना-तंत्र के भीतर से होता है। राम-रावण संघर्ष को इस रूप में भी देखा जाना चाहिए। इस संघर्ष में राम अपनी गहरी असहायता के बीच तत्काल शक्ति-स्रोत का सृजन कर लेते हैं- ‘सौरज धीरज तेहिं रथ चाका/ सत्य सील दृढ़ ध्वजा पताका।’ तत्काल शक्ति-स्रोत का यह सृजन हमें आधुनिक मुक्तिबोध के यहां भी देखने को मिलता है, जहां वे अपनी समस्त निर्बलता, असमर्थता के समानांतर शक्ति का सृजन यह कहते हुए करते हैं कि ‘तुम्हारे पास, हमारे पास/ सिर्फ एक चीज है/ ईमान का डंडा है/ बुद्धि का बल्लम है/ अभय की गेंती है/ हृदय की तगारी है- तसला है/ नए-नए बनाने के लिए भवन/ आत्मा के मनुष्य के।’

फूको का मानना है कि मानव-स्वभाव परिस्थितियों के अधीन होता है। परिस्थितियां अच्छी-बुरी होती हैं, व्यक्ति नहीं। कैकेयी रामचरितमानस की विवादित पात्र हैं। उनके बारे में यह सामान्यीकरण किया जाता है कि वे खलचरित्र हैं। सामान्यीकरण से बच कर हम देखें तो एक ओर चित्रकूट प्रसंग में जब कैकेयी राम-लक्ष्मण-सीता से मिलती हैं तो उनका मन पश्चात्ताप से भर जाता है, ‘लख सिय सहित सरल दोउ भाई, कुटिल रानी पछितानी अघाई’, तो दूसरी ओर कैकेयी के चरित्र को इन कथनों के आलोक में भी देखा जाना चाहिए- ‘पुनि अस कबहुं कहसि घर फोरी, तब धरि जीभि कढ़ावहु तोरी’ या ‘प्रान ते अधिक राम प्रिय मोरे, तिन्हके तिलक छोभु कस तोरे।’ खलपात्रों की गिनती में मंथरा भी शामिल है, लेकिन अपनी स्वामिनी के प्रति उसकी कल्याण-कामना कैकेयी को मुग्ध कर देती है और कैकेयी का यह कथन ‘तोहि सम हित न मोर संसारा’, मंथरा के चरित्र को नया अर्थ देता है। ऐसी स्थिति में इन पात्रों को या अन्य किन्हीं भी पात्रों को नए कोणों से देखे जाने की ताकीद की जानी चाहिए।
जिनकी स्थिति केंद्र से हटे हुए ‘अन्य’ की थी, उनकी संस्कृति, उनके साहित्यिक विमर्श और उनकी अस्मिता पर ध्यान क्यों नहीं जाना चाहिए! चित्रकूट प्रसंग में निम्न समझे जाने वाले केवट को गुरु वशिष्ठ द्वारा गले लगाना, शबरी के जूठे बेरों को राम द्वारा प्रेमपूर्वक ग्रहण करना, कोल-किरातों के प्रति भरत का आश्वस्ति-भाव कि राम के प्रियजन यही उपेक्षित और निम्न समझे जाने वाले लोग हैं जो राम का पता बता सकते हैं, आदि ऐसे अनेक प्रसंग हैं जो रामचरितमानस में उपेक्षितों-वंचितों के प्रति उदात्त भाव को प्रदर्शित करते हैं। ‘हाशिए के विमर्शों’ की मूल आपत्ति ‘सहानुभूति’ व ‘स्वानुभूति’ के स्तर पर है। इस पर सबसे ज्यादा आपत्ति इन विमर्शकारों ने की है। इस कृति को दलित व स्त्री विरोधी कृति कहा है।

इस तरह के तथ्य भी खोजे जा रहे हैं कि इसमें ब्राह्मणवाद की पर्याप्त भूमिका है। इस तरह से तुलसी साहित्य को जातिवादी, ब्राह्मणवादी साबित करने के प्रमाण जुटाए जाते रहे हैं। प्रमाण जुटाने के पीछे नीयत क्या है? क्या वे उसे समझना चाहते हैं या निरस्त करना चाहते हैं? और ऐसा करके क्या किसी दूसरी ज्ञान-परंपरा को हमारे सामने लाना चाहते हैं? यह कितना आश्चर्यजनक और महत्त्वपूर्ण है कि जिस रामचरितमानस को वे दलित विरोधी ग्रंथ कहते हैं, उसमें रामभक्ति के सर्वोच्च अधिकारी काकभुशुंडि हैं जो शूद्र-ब्राह्मण के कर्मफल-परिणाम और जात्यांतर के चक्र में लय हैं। इसी तरह रामचरितमानस में पितृसत्ता को चुनौती देते ढेर सारे पद हैं। सीता साधिकार स्वेच्छया, वन-गमन का चुनाव करती हैं। मंदोदरी एक ‘बहस करने वाली’ स्त्री है और कैकेयी जैसी अधिकार-सजग तो भला कौन होगी। कौसल्या का यह कथन- ‘जौं केवल पितु आयस ताता। तौ जनि जाहु जानि बड़ि माता’ पितृसत्ता के समक्ष एक चुनौती ही है।

लेकिन कई ऐसे प्रसंग हैं जो भाषाई दृष्टि से विमर्श का मुद््दा बनते हैं। मसलन ‘काने खोरे कूबरे’ को ‘कुटिल कुचाली’ कहना और उसमें भी अगर वह स्त्री हो और वह भी दासी तो वह समाज के लिए हानिकारक होगी। इस दृष्टि से रामचरितमानस विकलांग, स्त्री के प्रति अत्यंत असहिष्णु है। असहिष्णु इस अर्थ में क्योंकि उसकी ‘जिमि सुतंत्र भएं बिगरहिं नारी’ जैसी घोषणाएं स्त्री-स्वातंत्र्य को पचा नहीं पातीं।गौर किया जाना चाहिए कि रामचरितमानस पर लिखते समय कुछ आलोचक अवांतर पाठों के माध्यम से अपने विचारों को पुष्ट करते हैं। दलित आलोचक धर्मवीर ने तुलसी साहित्य की कटु आलोचना करते हुए लिखा है: ‘एक व्यक्ति ने दलित संदर्भ से मुझसे कहा- राम ने निषादराज को गले लगाया था। लेकिन मेरा पूछना दूसरा था। मैंने उससे पूछा था कि यह रघुकुल कब से चला आ रहा था? यदि निषादराज अपने पुरखों का अयोध्या का राज्य वापस मांगते तब क्या राम उन्हें गले लगाते?’

लेकिन प्रश्न है कि यह पाठ रामचरितमानस का अवांतर पाठ है, जो कथा रामचरितमानस में है ही नहीं, उस काल्पनिक कथा को वहां उपस्थित करके रचना को खारिज करना कहीं से न्यायपूर्ण नहीं है। धर्मवीर, प्रेमचंद संबंधी अपनी आलोचना में भी कई दफे इस तरह के अवांतर पाठों का प्रयोग कर चुके हैं। बार्थ की मान्यता है कि कोई भी रचना शून्य में जन्म नहीं लेती। वह पूर्ववर्तियों की लेखन-परंपरा की एक कड़ी मात्र होती है। यह रचना ‘नानापुराण निगमागम’ व ‘क्वचिदन्तोंऽपि’ का संगम है। रामचरितमानस में नैरेटर बदलते रहते हैं- मनोहर श्याम जोशी व उदय प्रकाश की कहानियों जैसा। रामचरितमानस अंतत: काव्य है, लेकिन आज उसे बड़े नाटक के रूप में देखा जा रहा है। ‘बायनरी अपोजीशन’ की दृष्टि से रामचरितमानस की अभिव्यक्ति-शैली पर विचार किया जा सकता है। मसलन, रावण का राम के प्रत्येक कार्य और अवस्था में विपक्ष में रहना, मंदोदरी और रावण के विलोम विचार, उत्तरकांड में रामराज्य व कलियुग का एक ही साथ वर्णन। रामचरितमानस में ऐसे प्रयोग संरचनात्मक और अर्थगत तनावों को जन्म देते हैं। निष्कर्षत: हम कह सकते हैं कि विमर्शों ने (दलित, स्त्री, विकलांग आदि) ने रामचरितमानस को प्रश्नांकित किया है। रामचरितमानस या किसी भी कृति के परंपरित पाठ की अर्थधुरियां टूटेंगी और जब-जब हम इन नए दरीचों से पाठ को देखने की कोशिश करेंगे तब-तब उनमें से अनगिनत व्याख्या-किरणें निकलेंगी जो अर्थ को स्थिर करने के किसी भी मंतव्य को साकार नहीं होने देंगी।

 

 

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