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नाद का आनंद

इन्हीं के सम्मिश्रण से चराचर का उद्भव हुआ। इस सृष्टि के अभ्युदय के इस सिद्धांत से सभी सहमत हैं, चाहे वे ब्रह्मज्ञानी हों या वैज्ञानिक। सृष्टि की खोज करने वाले विद्वानों के मतानुसार ‘शब्द’ का आरंभ जिस रूप में हुआ, उसी स्थिति में वह अनंतकाल तक बना रहेगा।
Author July 23, 2017 04:25 am
प्रतीकात्मक चित्र।

ब्रह्मांडीय चेतना के उद्गम स्रोत की खोज करते हुए वैदिक ऋषियों ने निष्कर्ष निकाला कि ब्रह्मांड की समस्त गतिविधियों का शक्ति स्रोत ‘शब्द’ है। अचिंत्य, अगम्य, अगोचर, अनंत परब्रह्म को जागतिक चेतना के साथ अपना स्वरूप निर्धारित करते हुए ‘शब्द-ब्रह्म’ के रूप में प्रकट होना पड़ा। सृष्टि से पहले यहां कुछ नहीं था। कुछ से सब कुछ को उत्पन्न होने का प्रथम चरण ‘शब्द-ब्रह्म’ था। उसी को ‘नाद-ब्रह्म’ कहते हैं। उसकी सर्वोच्चता का आदि-अवतरण इसी प्रकार होता है। उसके अस्तित्व और प्रभाव का परिचय प्राप्त करना सर्वप्रथम शब्द के रूप में ही संभव हो सका। सृष्टि से पहले शून्य था, जिसमें गूंजे ‘ब्रह्मनाद’ से हलचलें उत्पन्न हुर्इं, जो सघन होकर पदार्थ में परिवर्तित हुई। पदार्थ से पंचतत्त्व और पंचमहाभूत बने। इन्हीं के सम्मिश्रण से चराचर का उद्भव हुआ। इस सृष्टि के अभ्युदय के इस सिद्धांत से सभी सहमत हैं, चाहे वे ब्रह्मज्ञानी हों या वैज्ञानिक। सृष्टि की खोज करने वाले विद्वानों के मतानुसार ‘शब्द’ का आरंभ जिस रूप में हुआ, उसी स्थिति में वह अनंतकाल तक बना रहेगा। भारतीय ज्ञान परंपरा में ‘ओउम’ को आदिशब्द माना गया है। यह कांस्य पात्र पर हथौड़ा पड़ने से उत्पन्न झनझनाहट या थरथराहट की तरह का प्रवाह है। आत्मज्ञानियों ने ब्रह्मनाद को ‘ॐ’ यानी ओंकार की अवधारणा से समझने का प्रयास किया है। ॐ, नाद, नादब्रह्म, शब्दनाद, ब्रह्मनाद, ब्रह्मतत्व आदि की विस्तार से व्याख्या हमें वैदिक वांग्मय में मिलती है। भारतीय दर्शन और अध्यात्म की कोई भी धारा रही हो, सभी ने ‘शब्द’ की महिमा को स्वीकार किया है- चाहे वह वैदिक परंपरा हो, बौद्ध और जैन दर्शन हो, नाथ-सिद्ध हों, कबीर हों या अन्य कोई। हठयोग प्रदीपिका के अनुसार ‘जिस प्रकार पुष्पों का मकरंद पीने वाला भ्रमर अन्य गंधों को नहीं चाहता, उसी प्रकार नाद में रस लेने वाला चित्त, विषय-सुखों की आकांक्षा नहीं करता। विषय रूपी बगीचे में मदोनमत्त हाथी की तरह विचरण करने वाले मन को नाद रूपी अंकुश से नियंत्रण में लाया जाता है।’

नाद की महिमा के क्रम में ही संगीत का जन्म होता है। संगीत रत्नाकर में नाद-ब्रह्म की गरिमा पर प्रकाश डालते हुए कहा गया है कि ‘नाद-ब्रह्म समस्त प्राणियों में चैतन्य और आनंदमय है। उसकी उपासना करने से ब्रह्मा, विष्णु, महेश तीनों की सम्मिलित उपासना हो जाती है। वे तीनों नाद-ब्रह्म के साथ बंधे हुए हैं।’ महायोग विज्ञान के अनुसार ‘आदि में बादल के गरजने-बरसने, झरनों के झरने, भेरी बजने जैसे शब्द होते हैं। मध्य में मर्दल, शंख, घंटा, मृदंग जैसे, और अंत में किंकिणि, बंशी, वीणा, भ्रमर-गुंजन जैसे शब्द सुनाई पड़ते हैं।’ शास्त्रीय संगीत हो या लोक संगीत, ध्वनि का आरोह और अवरोह महत्त्वपूर्ण है, जिसके मिश्रण और समन्वय से ‘नाद के आनंद’ की अनुभूति होती है। भारतीय मिथकों का शिव-डमरू लास्य और ह्रास दोनों का प्रतीक है। वीणा के कारण सरस्वती ज्ञान की देवी प्रतिष्ठित हुई। वीणा के बल पर ही देवर्षि नारद ब्रह्मांडीय सूचना-ज्ञानी हुए। रावण-हत्था द्वारा शिव-साधना ने लंकापति रावण को शिव का परम भक्त बनाया। भगवान कृष्ण की बांसुरी ने जड़-चेतन सभी को रिझाया। भारतीय इतिहास का कोई कालखंड ऐसा नहीं, जिसमें संगीत की महिमा न रही हो।
आनंद की पहली सीढ़ी सुख है, जिसका सरल-सा अर्थ शारीरिक और मानसिक रूप से निरोगी काया से है, जिसके माध्यम से सभी कारज पूरे किए जा सकते हैं। लोकप्रिय प्रसंगानुसार एक व्यक्ति ने ईश्वर से बहुत सारी कामनाएं की। ईश्वर ने कहा, ‘मैंने तुम्हें स्वस्थ शरीर दिया है, जिसके माध्यम से तुम दुनिया की किसी भी वस्तु को प्राप्त कर सकते हो।’

संगीत प्रेम का प्रतीक है और प्रेम आनंद का स्रोत। यहां संगीत के प्रयोग का एक दृष्टांत दिया जाना उचित होगा। उपवन में नाना प्रकार के पुष्प-बीज बोए गए, जो अंकुरित होकर पौधों में विकसित हुए। कलियां खिलीं। कारावास में सजा काट रहे एक हत्यारे को रोज सुबह-शाम उस उपवन में घुमाया गया। उसे जिधर ले जाया जाता, वहां के फूल मुरझा जाते। फिर उसके स्थान पर उपवन में मधुर संगीत बजाया गया। जितनी दूर तक उसकी ध्वनि सुनाई दी, वहां अच्छे फूल खिलने लगे। संगीत चिकित्सा वैज्ञानिक शोध का क्षेत्र है जो नैदानिक चिकित्सा और जैव-संगीत शास्त्र, संगीत ध्वनिकी, संगीत सिद्धांत, मनो-ध्वनिकी और तुलनात्मक संगीत शास्त्र की प्रक्रिया के बीच पारस्परिक संबंध का अध्ययन करता है। यह एक अंतर्वैयक्तिक प्रक्रिया है, जिसमें एक प्रशिक्षित संगीत चिकित्सक अपने मरीजों के स्वास्थ्य में सुधार या उनके स्वास्थ्य को बनाए रखने में मदद के लिए संगीत और उसके शारीरिक, भावनात्मक, मानसिक, सामाजिक, सौंदर्यात्मक और आध्यात्मिक पहलुओं का उपयोग करता है। संगीत-चिकित्सा के लिए संगीतानुभव (गायन, गीत-लेखन, संगीत श्रवण और संगीत चर्चा, संगीत संचालन) के उपयोग द्वारा, मुख्य रूप से मरीजों की क्रियाशीलता और विविध क्षेत्रों (संज्ञानात्मक कार्य, संचालन कौशल, भावनात्मक और प्रभावी विकास, व्यवहार और सामाजिक कौशल) में जीवन की गुणवत्ता को सुस्पष्ट स्तर तक विकसित करने में मदद करते हैं। तुर्की-फारसी मनोवैज्ञानिक और संगीत सैद्धांतिक अल-फराबी ने, जिन्हें यूरोप में ‘अलफराबियस’ के नाम से जाना जाता है, अपने निबंध ‘मीनिंग आॅफ द इंटेलेक्ट’ में संगीत चिकित्सा का वर्णन किया है, जहां उन्होंने आत्मा पर संगीत के उपचारात्मक प्रभाव की चर्चा की है। रॉबर्ट बर्टन ने अपनी कृति ‘द एनॉटोमी आॅफ मेलेंकॅली’ में लिखा है कि संगीत और नृत्य मानसिक रोगों के उपचार के लिए काफी महत्त्वपूर्ण हैं, खासकर विषाद-रोग में इसे एक सार्थक उपचार का माना जाता है।

आरोह-अवरोह के लिए मुख्य स्वरों की संख्या सात ही है और इन स्वरों के तीन सप्तक। दुनिया भर के संगीत पर यह स्वर-सिद्धांत लागू होता है। यह भी सच है कि मन का प्रभाव तन पर पड़ता है। संगीत का मानसिक स्वास्थ्य पर कुछ लाभ प्रकट हैं। ऋषभ स्वर निम्न रक्तचाप को बढ़ा कर और मध्यम स्वर उच्च को निम्न कर संतुलित करने में सहायक होते हैं। पंचम स्वर रक्तचाप को सामान्य बनाए रखता है और धैवत उसे बढ़ने से रोकता है।विभिन्न अनुसंधानों से पता चलता है कि राग बागेश्वरी, भीम पलासी, दरबारी, भूपाली और तोड़ी रक्तचाप को बढ़ने से रोक कर सामान्य बनाने में सहायक हैं। राग जोगिया और आनंद भैरव को सुबह सुनने से उच्च रक्तचाप सामान्य होता है। राग भैरव और राग ललित का आलाप कम रक्तचाप को बढ़ा कर सामान्य स्थिति में लाता है। ऐसा ही मालकौंस और आसावरी में है। अगर राग अहीर भैरव, भैरवी, बहार और मल्हार को सुबह सुना जाए तो रक्तचाप सदा सामान्य बना रहेगा। प्रात:कालिक राग भैरवी रोज सुनने से उच्च रक्तचाप से मुक्ति मिल सकती है। साथ ही यह राग सिजोफ्रेनिया, अनिद्रा और मिर्गी जैसे मानसिक विकारों पर नियंत्रण करने में बहुत उपयोगी बताया गया है। मिर्गी के रोगियों को राग सारंग भोर में सुनना चाहिए। राग शिवरंजिनी चित्त को एकाग्र कर मानसिक कार्यों में सहायक होता है। इसीलिए यह राग बुद्धिजीवियों द्वारा काफी पसंद किया जाता है।

 

 

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